अनादानमदत्त स्यास्तेयव्रतमुदीदितम्।
बाह्याः प्राणा नृणामर्थो हरता तं हता ही ते।।
अर्थात्,
न दी गई वस्तु को न लेना अस्तेय विद्या(/चोरी न करने का नियम) कहा गया है। धन मनुष्यों का बाहरी प्राण है। जिसने उन धन को ले लिया उसने उन प्राणों को ही हरण कर लिया ।
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