अल्पज्ञ एव पुरुषः प्रलपत्यजस्रं
पाण्डित्यसम्भृतमतिस्तु मितप्रभाषी।
कांस्यं यथा ही कुरुते अतितरां निनादं
तद्वत् सुवर्णमिह नैव करोति नादम्।।
अर्थात् --
अल्प ज्ञानयुक्त पुरुष निरन्तर बोलता है परन्तु निश्चित बुद्धि वाला व्यक्ति अल्पभाषी होता है। जैसे कांसे का वर्तन अत्यधिक आवाज करता है , उसी प्रकार यहाँ स्वर्ण शब्द नहीं करता है।
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