Friday, August 7, 2026

NCERT SANSKRIT BHASHWATI CLASS - 12 CHAPTER - 1 ANUSHASANAM

हिन्दी अनुवाद --

वेद पढ़ा कर आचार्य शिष्य को उपदेश देते हैं। सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। अपने अध्ययन से आलस्य मत करो। आचार्य के लिए प्रिय धन को लाकर वंश परम्परा को मत तोड़ो। सत्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए। धर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए।कुशल (अर्थात् आत्मरक्षा में उपयोगी) कर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। ऐश्वर्य देने वाले माङ्गलिक कर्मों से प्रमाद नहीं करना चाहिए। स्वाध्याय और प्रवचन से प्रमाद नहीं करना चाहिए। देवकार्य और पितृकार्य से आलस्य नहीं करना चाहिए। माता देवता है। पिता देवता है। आचार्य देवता है। अतिथि देवता है। जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हीं का सेवन करना चाहिये - दूसरों का नहीं। जो हमारे (अर्थात् हम गुरुजनोंके) जो शुभ आचरण हैं तुम्हें उन्हीं की उपासना करनी चाहिए, दूसरे प्रकार के कर्मों की नहीं। यदि तुम्हें कर्म अथवा आचार के विषय में कोई सन्देह हो, तो वहां जो विचारशील, कर्म में नियुक्त, आयुक्त (स्वेच्छा से कर्मपरायण), अरूक्ष (सरलमति) एवं धर्माभिलाषी ब्राह्मण होते हैं,उस प्रसङ्ग में वो जैसा व्यवहार करें; तुम वैसा ही व्यवहार करो। यह आदेश (/विधि) है। यह उपदेश है। यह ज्ञान का सार है। यह शिक्षा है। इसी प्रकार तुम्हें उपासना करनी चाहिए। ऐसा ही आचरण करनी चाहिए।


अभ्यासः

१. एकपदेन उत्तरत -

क)   शिक्षावल्लीतः

ख)   प्रमदः

ग)   अन्तेवासिनम् 

घ)     प्रमदः

ङ)  सुचरितानि 

२. पूर्णवाक्येन उत्तरत -

क)    आचार्यस्य अनवद्यानि कर्माणि सेवितव्यानि।

ख)।   शिष्यः धनमाहृत्य प्रजातन्तुं न व्यवच्छिन्द्यात्।

ग)।    शिष्याः कर्मविचिकित्सा विषये ब्राह्मणानामिव वर्तेरन्।

घ)।  स्वाध्याय - प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्।

ङ)।   ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः, युक्ता आयुक्ताः, अलूक्षाः धर्मकामाश्च स्युः।

३. रिक्तस्थानपूर्तिं कुरुत -

क) वेदमनूच्याचार्यो अन्तेवासिनम् अनुशास्ति। ख) सत्यं वद धर्मं चर। ग) यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि। घ) यथा ते तत्र वर्तेरन् तथा तत्र वर्तेथाः। ङ) एषा वेदोपनिषत्। ४. मातृभाषया व्याख्यायेताम् -- क) "देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्" - यह वाक्य तैतिरीय उपनिषद के ग्यारहवेँ अनुवाक् (शिक्षावल्ली) से संकलित 'अनुशासनम्' पाठ से उद्धृत है। उपनिषद का अर्थ ज्ञानार्जन के लिए गुरु के समीप वैठना। गुरु - शिष्य परम्परा के अनुसार अध्ययन के उपरान्त आचार्य शिष्य को जीवनोपयोगी उपदेश देते हैं। सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। अपने अध्ययन से आलस्य मत करो। आचार्य के लिए प्रिय धन को लाकर वंश परम्परा को मत तोड़ो। सत्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए। धर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। कुशल (अर्थात् आत्मरक्षा में उपयोगी) कर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। ऐश्वर्य देने वाले माङ्गलिक कर्मों से प्रमाद नहीं करना चाहिए। स्वाध्याय और प्रवचन से प्रमाद नहीं करना चाहिए।

तत्पश्चात उपरोक्त वाक्य में गुरु यह उपदेश देते हैं की देवकार्य और पितृकार्य से आलस्य नहीं करना चाहिए। देवता सम्बन्धीय यागयज्ञादि और पितृ सम्बन्धीय श्राद्धादि कर्म अवश्य करनी चाहिए।

ख) "यानि अनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि।" --यह वाक्य तैतिरीय उपनिषद के ग्यारहवेँ अनुवाक् (शिक्षावल्ली) से संकलित 'अनुशासनम्' पाठ से उद्धृत है। उपनिषद का अर्थ ज्ञानार्जन के लिए गुरु के समीप वैठना। गुरु - शिष्य परम्परा के अनुसार अध्ययन के उपरान्त आचार्य शिष्य को जीवनोपयोगी उपदेश देते हैं।

सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। अपने अध्ययन से आलस्य मत करो। आचार्य के लिए प्रिय धन को लाकर वंश परम्परा को मत तोड़ो। सत्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए। धर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। कुशल (अर्थात् आत्मरक्षा में उपयोगी) कर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। ऐश्वर्य देने वाले माङ्गलिक कर्मों से प्रमाद नहीं करना चाहिए। स्वाध्याय और प्रवचन से प्रमाद नहीं करना चाहिए।देवकार्य और पितृकार्य से आलस्य नहीं करना चाहिए। माता देवता है। पिता देवता है। आचार्य देवता है। अतिथि देवता है।

उपरोक्त वाक्य में गुरु यह उपदेश देते हैं की जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हीं का सेवन करना चाहिए। ५. अधोनिर्दिष्टपदानां समानार्थक पदानि कोष्ठकात् चित्वा लिखत -- क) अनूच्य - संबोध्य ख) संविदा - सद्भावनया ग) ह्रिया - लज्जया घ) अलूक्षा - अरूक्षा ङ) उपास्यम् - अनुपालनीयम् ६. विपरीतार्थकपदैः योजयत --

क) सत्यम् - असत्यम्

ख) धर्मम् - अधर्मम्

ग) श्रद्धया - अश्रद्धया

घ) अवद्यानि - अनवद्यानि

ङ) लूक्षा - अलूक्षा

७. अधोनिर्दिष्टेषु पदेषु प्रकृति-प्रत्यय विभागं कुरुत -

१) प्रमदितव्यम् - प्र + मद् + तव्य

२) अनवद्यम् - अन + वद् + यत्

३) उपास्यम् - उप + आस् + यत्

४) अनुशासनम् - अनु + शास् + ल्यूट्



समाप्तम्



Sunday, August 2, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अनेकसंशयोच्छेदी परोक्षार्थस्य दर्शकम्।

सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः।।

अर्थात् --

     अनेक सन्देहों को दूर करने वाला और छिपे हुए अर्थोंको दिखानेवाला शास्त्र, सबका नेत्र है; जिसके पास ज्ञानदायक यह नेत्र स्वरूप शास्त्र नहीं है वह अन्धा जैसा ही है ।

Meaning --

   The shastra is the eye of all which  clarify many doubts and shows the meaning behind. People who don't have this eye like shastra which give knowledge are as blind.


Friday, July 31, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 आरभेत हि कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः ।

कर्माण्यारभमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते।।

अर्थात् --

    कार्यों को धीरे धीरे और वारवार कीजिये। क्योंकि कर्मों को आरम्भ करने वाले व्यक्ति को श्री अर्थात् धन सेवा करता है।

Meaning --

     Do the work slowly again and again. As the person who has started the work is served by wealth.

Thursday, July 30, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 

कर्णामृतं सूक्तिरसं विमुच्य दोषेषु यत्नः सुमहान् खलानाम्। 

निरीक्षते  केलिवनं प्रविश्य क्रमेलकः कण्टकजालमेव।। 

अर्थात् --

 कान के लिए अमृत स्वरूप सूक्ति(/उत्तम वाक्यों जैसे)  रसको छोड़कर बड़े बड़े दुर्जनों का प्रयास दोष निकालने में रहता है। आमोददायक वन में प्रवेश कर ऊँट काण्टेवाले पौधों को ही निरीक्षण करता है। 

Meaning --

          Wicked people always try to find fault leaving the essence of good sayings which are nectar for ear. Just like a camel looks only the thorny bushes entering into a sportive place .

Wednesday, July 29, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

दीर्घप्रयासेन कृतं हि वस्तु निमेषमात्रेण भजेद् विनाशम्।
कर्तुं कुलालस्य तु वर्षमेकं भेत्तुं हि दण्डस्य मुहूर्तमात्रम्।।

अर्थात् -
     बहुत प्रयास से निर्मित वस्तु क्षण मात्र से विनाश को प्राप्त होता है। कुम्हार का (मटका) बनाने के लिए एक साल, (उसको) तोड़ने के लिए दण्ड का मुहूर्त मात्र ही होता है। 
Meaning --
      A thing made after long endeavor gets vanish for just a moment. Just like one year of a potter for making pot is only one moment to destroy it. 

Friday, July 24, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 स्वायत्तमेकांतगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमनज्ञतायाः। 

 विशेषतः सर्वविदांसमाजे विभृषणं मौनमपण्डितानाम्‌ ।।

अर्थात् -

        पूर्णतया स्वाधीन रहनेवाली गुण विधाता द्वारा निर्मित मूर्खता /अज्ञानता का ढक्कन स्वरूप है। मौन विशेष रूप से विद्वत्समाज में मूर्खो के लिए आभूषण स्वरूप ही होता है ।


Meaning --

  Absolute self-dependent is the lid over ignorance made by almighty . Especially in the world of learned people silence works as ornament for foolish. 

Friday, July 3, 2026

NCERT SANSKRIT SHEMUSHI CLASS-10 CHAPTER- 9 BHUKAMPAVIBHEESIKA

 


          २००१ ख्रीष्टाब्द में गणतंत्र दिवस पर्व पर जब समग्र भारतराष्ट्र नृत्य गीत वाद्ययंत्रों के उल्लास में मग्न था तब अचानक ही गुर्जर राज्य चारों ओर से बेचैन, अस्तव्यस्त, विकलक्रन्दन और विपत्ति ग्रस्त हो गया। भूकम्प का भयानक घटणा (प्रलय) समग्र गुर्जरक्षेत्र को विशेषरूप से कच्छजनपद को विनाश के बाद बची हुई वस्तुओं में परिवर्तन किया। भूकम्प का केन्द्रस्वरूप भुजनगर तो मिट्टी के खिलौने के समान टुकडेे होगए। बहुमंजिले मकान क्षण में ही धराशायी होगए(जमीन में मिलगए)। बिजली के खम्बे उखड गये। घरों के सीढीओं के रास्ते बिखर गये। भूमि दो खण्डो में विभाजित हो गई। भूमि के गर्तों से ऊपर निकलती हुई जिनको हटाना कठिन है - ऐसी जलधाराओं से विशाल बाढ का दृश्य उपस्थित हो गया। हजारों संख्या में प्राणियाँ क्षण में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। विनष्ट मकानों में  हजारों पीडिता सहायता के लिए करुण क्रन्दन करते हैं। हे विधाता! भूख से दुर्बल कण्ठवाले मृतप्राय कुछ शिशु भगवत् कृपा से ही दो तीन दिन जीवन धारण किया था।
           यह था कच्छ भूकम्प का अतीव भयावह दृश्य। २००५ ख्रीष्टाब्द में भी कश्मीर प्रान्त में और पाकिस्तान देश में धरती का विशाल कम्पन हुआ।  जिस कारण से लाखों लोग असमय मृत्यु को प्राप्त हुए। पृथ्वी किस कारण से प्रकम्पित होता है- इस विषय में वैज्ञानिकों ने कहते हैं कि धरती के गर्भ के भीतर उपस्थित विशाल प्रस्तर जब संघर्षण(घिसने) के कारण टूटते हैँ तब अत्यधिक मात्रा में प्रस्तरों का अपने स्थान से हटना, और हटने से कम्पन होता है॥ वह भयावह कम्पन ही पृथ्वी के उपरि भाग पर भी आकर महाकम्पन उत्पन्न करती है  जिसे महाविनाश का दृश्य समुपस्थित होता है।
          ज्वालामुखपर्वतों का विस्फोट से भी भूकम्प होता है -ऐसे भूकम्पविशेषज्ञ कहते हैं। पृथ्वी के गर्भ में स्थित अग्नि जब भूमि को खोदने से प्राप्त वस्तु, मिट्टी,प्रस्तर आदि संग्रह को उबालती है तब वो सब ही लावारस को प्राप्त हो कर धरती अथवा पर्वत को फाडकर बाहर निकलता है। तब आकाश धुएँ और राख से ढक जाता है।सेल्सियश-ताप-मात्रा की एकसौ आठ(१०८) अङ्क को प्राप्त यह लावारस जब नदीवेग (नदी के धारा जैसी) से प्रवाहित होता है तब समीप के गाँव अथवा सहर उसके पेट में क्षण में ही समा जाती हैं। 
     और वेचारे (विवश) प्राणी मरते हैं। ज्वाला को प्रकट करते हुए ये पर्वत भी भीषण भूकम्प उत्पन्न करती हैं।
     यद्यपि भूकम्प भाग्य का प्रकोप है, उसको शान्त करने का कोई भी स्थिर उपाय नहीं दिखरहा है। आज भी प्रकृति के सामने विज्ञान से गर्व करने वाला मनुष्य वामन सदृश ही है तथापि भूकम्परहस्य को जानने वाले कहते हैं की बहु मंजिले मकानों का निर्माण नहीं करना चाहीए। नदी किनारे बान्ध बनाकर बृहत् मात्रा में नदी जल को भी एक जगह पर इकट्ठा नहीं करना चाहीए। अन्यथा असन्तुलन के कारण भूकम्प सम्भव है। वस्तुतः(फलस्वरूप) पृथ्वीजलअग्नीवायुआकाश इन पञ्चतत्वों का शान्त होना ही भूभाग का  योगक्षेम के  लिए उचित है॥ उन अशान्त पञ्चतत्त्व निश्चित रूप से महाविनाश को उपस्थापित करते हैं। 
अभ्यासः

१.  अधोलिखितानां प्रश्नानां उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत  -
क)    समस्तराष्ट्रं  नृत्य-गीतवादित्राणाम्  उल्लासे मग्नम् आसीत्।
ख) भूकम्पस्य केन्द्रबिन्दुः कच्छजनपदः आसीत्।
ग) पृथिव्याः स्खलनात् कम्पनं जायते।
घ) समग्रं विश्वम् विपन्नैः आतंकितः दृश्यते।
ङ) ज्वालामुखपर्वतानां विस्फोटैरपि भूकम्पो जायते।
च) बहुभूमिकानि भवनानि धराशायीनि जायन्ते।
२.  
क) भूकम्पविभीषिका विशेषेण कच्छजनपदं केषु परिवर्तितवती?
ख) के कथयन्ति यत् पृथिव्याः अन्तर्गर्भे, पाषाणशिलानां संघर्षणेन कम्पनं जायते?
ग)  विवशाः प्राणिनः कुत्र पिपीलिका इव निहन्यन्ते?
घ) किदृशी भयावहघटना गढ़वाल  क्षेत्रे घटिता?
ङ) तदिदानीं किं विचारणीयम् तिष्ठति?
४.  
क) समग्रं भारतम् उल्लासे मग्नः अस्ति। 
ख) भूकम्पविभीषिका कच्छजनपदं विनष्टं कृतवती।
ग) क्षणेनैव प्राणिनः गृहविहीनाः अभवन्।
घ) शान्तानि पञ्चतत्त्वानि भूतलस्य योगक्षेमाभ्यां भवन्ति।
ङ)  मानवाः पृच्छन्ति यत् बहुभूमिकभवननिर्माणं करणीयम्    न वा?
च) नदीवेगेन ग्रामाः तदुदरे समाविशेत्।
५.
(अ )   परसवर्णसन्धिनियमानुसारम्  -
  क)  किञ्च  -   किम्   +    च
   ख)   नगरन्तु   -   नगरम्    +   तु
   ग)   विपन्नञ्च   -    विपन्नम्   +   च
  घ)    किन्नु    -    किम्   +   नु
   ङ)   भुजनगरन्तु    -   भुजनगरम्   +   तु
   च)    सञ्चयः    -   सम्    +    चयः
(आ)  विसर्गसन्धिनियमानुसारम्   -
    क)   शिशवस्तु    -   शिशवः   +   तु
   ख)    विस्फोटैरपि     -     विस्फोटैः    +   अपि
   ग)   सहस्रशोऽन्ये   -     सहस्रशः     +   अन्ये
   घ)    विचित्रोऽयम्   -    विचित्रः   +   अयम्
   ङ)   भूकम्पो जायते   -   भूकम्पः   +   जायते
   च)    वामनकल्प एव   -   वामनकल्पः   +     एव
६.   (अ)    विलोमपदानां  संयोगं कुरुत   -
                                      क                                     ख
                             सम्पन्नम्                            विपन्नम्
                           ध्वस्तभवनेषु                         नवनिर्मितभवनेषु
                        निस्सरन्तीभिः                               प्रविशन्तीभिः
                                निर्माय                            विनाश्य
                                क्षणेनैव                          सुचिरेणैव
(आ)   समानार्थकपदानां संयोगं कुरुत  - 
                                क                                    ख
                            पर्याकुलम्                       व्याकुलम्
                       विशीर्णाः                                    नष्टाः
                                    उद्गिरन्तः                   प्रकटयन्तः
                                     विदार्य                                      संत्रोट्य
                                 प्रकुपिताम्                       क्रोधयुक्ताम्
     


 ७.  (अ)    प्रकृति-प्रत्यययोः विभागं कुरुत  -
        परिवर्तितवती   -    परि    +   वृत्    +क्तवतु   +   ङीप्  (स्त्री)
       धृतवान्            -      धृ   +    क्तवतु
                 हसन्   -   हस्  +   शतृन्
       विशीर्णा   -    वि    +   शृ  +     क्त    +टाप्
    प्रचलन्ती    -      प्र   +   चल्    +    शतृ    +   ङीप्  (स्त्री)
    हतः     -    हन्            +          क्त
    (आ)   समस्तपदानि लिखत  -
     महत् च तत्  कम्पनं  -   महत्कम्पनं
   दारुणा च सा विभीषिका   -   दारुण-विभीषिका
     ध्वस्तेषु च तेषु भवनेषु   -   ध्वस्तभवनेषु
   प्राक्तने च तस्मिन् युगे    -     प्राक्तनयुगे
    महत् च तत् राष्ट्रं  तस्मिन्   -   महद्राष्ट्रे









   

NCERT SANSKRIT BHASHWATI CLASS - 12 CHAPTER - 1 ANUSHASANAM

हिन्दी अनुवाद -- वेद पढ़ा कर आचार्य शिष्य को उपदेश देते हैं। सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। अपने अध्ययन से आलस्य मत करो। आचार्य ...