२००१ ख्रीष्टाब्द में गणतंत्र दिवस पर्व पर जब समग्र भारतराष्ट्र नृत्य गीत वाद्ययंत्रों के उल्लास में मग्न था तब अचानक ही गुर्जर राज्य चारों ओर से बेचैन, अस्तव्यस्त, विकलक्रन्दन और विपत्ति ग्रस्त हो गया। भूकम्प का भयानक घटणा (प्रलय) समग्र गुर्जरक्षेत्र को विशेषरूप से कच्छजनपद को विनाश के बाद बची हुई वस्तुओं में परिवर्तन किया। भूकम्प का केन्द्रस्वरूप भुजनगर तो मिट्टी के खिलौने के समान टुकडेे होगए। बहुमंजिले मकान क्षण में ही धराशायी होगए(जमीन में मिलगए)। बिजली के खम्बे उखड गये। घरों के सीढीओं के रास्ते बिखर गये। भूमि दो खण्डो में विभाजित हो गई। भूमि के गर्तों से ऊपर निकलती हुई जिनको हटाना कठिन है - ऐसी जलधाराओं से विशाल बाढ का दृश्य उपस्थित हो गया। हजारों संख्या में प्राणियाँ क्षण में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। विनष्ट मकानों में हजारों पीडिता सहायता के लिए करुण क्रन्दन करते हैं। हे विधाता! भूख से दुर्बल कण्ठवाले मृतप्राय कुछ शिशु भगवत् कृपा से ही दो तीन दिन जीवन धारण किया था।
यह था कच्छ भूकम्प का अतीव भयावह दृश्य। २००५ ख्रीष्टाब्द में भी कश्मीर प्रान्त में और पाकिस्तान देश में धरती का विशाल कम्पन हुआ। जिस कारण से लाखों लोग असमय मृत्यु को प्राप्त हुए। पृथ्वी किस कारण से प्रकम्पित होता है- इस विषय में वैज्ञानिकों ने कहते हैं कि धरती के गर्भ के भीतर उपस्थित विशाल प्रस्तर जब संघर्षण(घिसने) के कारण टूटते हैँ तब अत्यधिक मात्रा में प्रस्तरों का अपने स्थान से हटना, और हटने से कम्पन होता है॥ वह भयावह कम्पन ही पृथ्वी के उपरि भाग पर भी आकर महाकम्पन उत्पन्न करती है जिसे महाविनाश का दृश्य समुपस्थित होता है।
ज्वालामुखपर्वतों का विस्फोट से भी भूकम्प होता है -ऐसे भूकम्पविशेषज्ञ कहते हैं। पृथ्वी के गर्भ में स्थित अग्नि जब भूमि को खोदने से प्राप्त वस्तु, मिट्टी,प्रस्तर आदि संग्रह को उबालती है तब वो सब ही लावारस को प्राप्त हो कर धरती अथवा पर्वत को फाडकर बाहर निकलता है। तब आकाश धुएँ और राख से ढक जाता है।सेल्सियश-ताप-मात्रा की एकसौ आठ(१०८) अङ्क को प्राप्त यह लावारस जब नदीवेग (नदी के धारा जैसी) से प्रवाहित होता है तब समीप के गाँव अथवा सहर उसके पेट में क्षण में ही समा जाती हैं।
और वेचारे (विवश) प्राणी मरते हैं। ज्वाला को प्रकट करते हुए ये पर्वत भी भीषण भूकम्प उत्पन्न करती हैं।
यद्यपि भूकम्प भाग्य का प्रकोप है, उसको शान्त करने का कोई भी स्थिर उपाय नहीं दिखरहा है। आज भी प्रकृति के सामने विज्ञान से गर्व करने वाला मनुष्य वामन सदृश ही है तथापि भूकम्परहस्य को जानने वाले कहते हैं की बहु मंजिले मकानों का निर्माण नहीं करना चाहीए। नदी किनारे बान्ध बनाकर बृहत् मात्रा में नदी जल को भी एक जगह पर इकट्ठा नहीं करना चाहीए। अन्यथा असन्तुलन के कारण भूकम्प सम्भव है। वस्तुतः(फलस्वरूप) पृथ्वीजलअग्नीवायुआकाश इन पञ्चतत्वों का शान्त होना ही भूभाग का योगक्षेम के लिए उचित है॥ उन अशान्त पञ्चतत्त्व निश्चित रूप से महाविनाश को उपस्थापित करते हैं।
क) समस्तराष्ट्रं नृत्य-गीतवादित्राणाम् उल्लासे मग्नम् आसीत्।
ख) भूकम्पस्य केन्द्रबिन्दुः कच्छजनपदः आसीत्।
घ) समग्रं विश्वम् विपन्नैः आतंकितः दृश्यते।
ङ) ज्वालामुखपर्वतानां विस्फोटैरपि भूकम्पो जायते।
च) बहुभूमिकानि भवनानि धराशायीनि जायन्ते।
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