घृष्टं घृष्टं पुनरपि पुनश्चन्दनं चारुगन्धं,
छिन्नः छिन्नः पुनरपि पुनः स्वादुमानिक्षुदण्डः।
दग्धं दग्धं पुनरपि पुनः काञ्चनं कान्तवर्णं,
प्राणान्तेऽपि प्रकृति विकृतिर्जायते नोत्तमानाम्।।
अर्थात्,
चन्दन काष्ठ को वारवार घिसने से उसमें से सुमधुर वास उत्पन्न होता है। गन्ना वारवार चर्वित होने पर स्वादुयुक्त होता है। सुवर्ण आग में जलने से कमनीय वर्ण धारण करता है। उसी प्रकार प्राण जाते समय सज्जनों के स्वभाव परिवर्तित नहीं होते हैं।