अति सर्वनाश हेतुर्ह्यतोऽत्यन्तं विवर्जयेत्।
अर्थात्,
अति सर्वनाश का कारण है। इसलिए अत्यधिक का परित्याग करना चाहिए।
Meaning --
Excess is the cause of destruction. Hence one should forbid it in every respect.
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अति सर्वनाश हेतुर्ह्यतोऽत्यन्तं विवर्जयेत्।
अर्थात्,
अति सर्वनाश का कारण है। इसलिए अत्यधिक का परित्याग करना चाहिए।
Meaning --
Excess is the cause of destruction. Hence one should forbid it in every respect.
उच्चासनगतो नीचो नीचः एव न चोत्तमः।
प्रासादशिखरस्थोपि काकः न गरुडायते।।
अर्थात्,
ऊँचे पद पर आसीन होने पर भी नीच नीच ही रहता है,उत्तम नहीं बन पाता। जैसे महल के शिखर पर बैठा हुआ कौवा कभी गरूड नहीं बनता है।
Meaning --
A despicable /mean person remains mean even though he holds a high position ; but can't be perfect. Just like the crow sitting on the top of the palace cannot be a vulture .
अक्रमेणानुपायेन कर्मारम्भो न सिध्यति।
अर्थात्,
विना क्रम के और विना युक्ति के शुरु किया गया काम सफल नहीं होता है।
Meaning --
The work started without any arrangement and planning doesn't succeed.
सुजनो न कुप्यत्येव अथ कुप्यति विप्रियं न चिन्तयति।
अथ चिन्तयति न जल्पति अथ जल्पति लज्जितो भवति।।
अर्थात्,
सज्जन क्रोध नहीं करता है यदि कभी क्रोध करता है तब अनिष्ट नहीं सोचता है और यदि सोचता है तब अप्रिय नहीं बोलता है और यदि बोलता है तब लज्जित होता है।
Meaning --
A wise man doesn't get angry and if ever he would do so then he won't think about to blame. If he thinks to do so then he would not talk unpleasant. And if he tells so then he would be ashamed.
उक्त्वानृतं भवेद्यत्र प्राणीनां प्राणरक्षणम्।
अनृतं तत्र सत्यं स्यात्सत्यमप्यनृतं भवेत्।।
अर्थात्,
झूठ बोलने से जहाँ प्राणियों की प्राणरक्षा हो सकती हो वहाँ झूठ भी सच है और सच भी झूठ होता है।
Meaning --
Where telling a lie can save the life of people, there the lie would be true and true becomes lie.
अपि शाकं पचानस्य सुखं वै मघवन् गृहे।
अर्जितं स्वेन वीर्येण न व्यपाश्रित्य कश्चन।।
अर्थात्,
हे इन्द्र! किसी दूसरे का सहारा न लेकर वरं अपने पराक्रम से ही अर्जित शाक को पकाने वाले के घर में सुख होता है।
O lndra! Happiness remains there in the house of one who consumes food earned through his own valour without taking any other's help.
आनन्दवाष्परोमाञ्चौ यस्य स्वेच्छावशंबदौ।
किं तस्य साथनैरनैः किङ्कराः सर्वपार्थिवाः।।
अर्थात्,
आनन्द के अश्रु तथा रोमाञ्च जिसके इच्छा के अधीन है ,उसे अन्य साधनों की क्या प्रयोजन? सभी राजा उसके नौकर हैं।
Meaning -
When the tears of joy and horripilation/goosebumps are subject to/obedient to one's own wish/desire, then what other means/instruments does he require? Thus all kings are his slaves/servants.
न गणस्याग्रतो गच्छेत्सिद्धे कार्ये समम्फलम्।
यदि कार्य विपत्तिः स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते।।
अर्थात्,
जनसमूह का मुखिया वनकर न जाएं , क्योंकी कार्य सिद्ध होने पर सव बराबर के फल के हिस्सेदार होंगे। यदि काम विगड़ गया तब मुखिया ही मार खाते हैं।
Meaning -
One should not lead the gathering.as a chief Because the fruit of the action will be shared equally amongst all if the succeeds. But the leader is beaten up if it fails.
पित्रा पुत्रो वयःस्थोपि सततं वाच्य एव तु।
यथा स्याद् गुणसंयुक्तः प्राप्नुयात् च महद् यशः।।
अर्थात्,
पुत्र वयस्क होने पर भी पिता सर्वदा कहता/समझाता रहना चाहिए जिससे वह गुणी बने और अधिक यश प्राप्त कर सकें।
Meaning -
The father should keep advising the son even after growing up so that the latter can become moral and more famous.
असत्यवचनं प्राज्ञः प्रमादेनापि न वदेत्।
श्रेयांसि येन भज्यन्ते वात्ययेव महाद्रुमाः।।
अर्थात्,
बुद्धिमान् व्यक्ति कभी गलती से भी असत्य भाषण नहीं वोलना चाहिये क्योंकि उससे कल्याण वैसे टूट जाते हैं (/नष्ट हो जाते हैं) जैसे आंधी से महावृक्ष।
Meaning -
A wise man should never tell a lie even by mistake. Because this breaks the good fortune just like the storm uproots the big trees.
पीत्वा रसं तु कटुकं मधुरं समानं
माधुर्यमेव जनयेन्मधुमक्षिकासौ।
सन्तस्तथैव समसज्जनदुर्जनानां
श्रुत्वा वचः मधुरसूक्तरसं सृजन्ति।।
अर्थात्,
मधुर रस के साथ कड़ुवे रस को भी पान कर यह मधुमक्खी मधुर रस को ही निष्पन्न करती है; वेसे ही विद्वान व्यक्ति सज्जनों के साथ दुर्जनों का भी वचन सुनकर मधुर तथा उत्तम वचन रूपी रस का निर्माण करते हैं।
Meaning -
The honey bee consumes sweet juices as well as bitter one but produce only honey which is sweet in nature . Like that, wise people create only sweet and noble talks, what type of talks they listen from good and bad persons .
संपदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च भीरूत्वम्।
तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम्।।
अर्थात्,
जिसे संपत्ति आने पर अधिक प्रसन्नता और संकट आने पर दुःख न हो तथा युद्ध में जिसे भय न हो, त्रिभुवन में श्रेष्ठ ऐसे पुत्र को विरल ही कोई माता जन्म देती है।
Meaning -
It's rare for any mother to give birth to a child who is best amongst the three worlds who neither becomes happy when wealth arrives nor is frustrated in difficult times and is not afraid of war .
घृष्टं घृष्टं पुनरपि पुनश्चन्दनं चारुगन्धं,
छिन्नः छिन्नः पुनरपि पुनः स्वादुमानिक्षुदण्डः।
दग्धं दग्धं पुनरपि पुनः काञ्चनं कान्तवर्णं,
प्राणान्तेऽपि प्रकृति विकृतिर्जायते नोत्तमानाम्।।
अर्थात्,
चन्दन काष्ठ को वारवार घिसने से उसमें से सुमधुर वास उत्पन्न होता है। गन्ना वारवार चर्वित होने पर स्वादुयुक्त होता है। सुवर्ण आग में जलने से कमनीय वर्ण धारण करता है। उसी प्रकार प्राण जाते समय सज्जनों के स्वभाव परिवर्तित नहीं होते हैं।
यथा कालकृतोद्योगात् कृषिः फलवती भवेत्।
तद्वन्नीतिरीयं देव चिरात् फलति न क्षणात्।।
अर्थात्,
समय के अनुसार परिश्रम करने से जैसे कृषि कार्य भविष्यत में/कुछ समय बाद सफल होता है; वैसे ही नीतिवाक्यों को उचित समय में पालन करने से उसका लाभ उसी समय नहीं वरं भविष्यत में मिलता है।
Meaning -
As farming would be fruitful after some days if working hard according to the nature/time. In the same way if one follows the noble thoughts in one's life will get success one day but not all of a sudden.
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते।
आचारः प्रथमो धर्मों धर्मस्य प्रभुरच्युतः।।
अर्थात्,
सभी शास्त्रों में सदाचार मुख्यतः वर्णित हुआ है। सदाचार ही उत्तम धर्म है। धर्म का प्रभु स्वयं भगवान् नारायण हैं।
धर्मेण हन्यते व्याधिर्हन्यते वै तथा ग्रहाः।
धर्मेण हन्यते शत्रुर्यतो धर्मस्ततो जयः॥
अर्थात्,
धर्म के बल पर व्याधि, ग्रहदोष और शत्रु नष्ट हो जाते हैं। इसलिए धर्म ही जय का कारण है॥
Meaning -
Dharma is the only reason of victory. Because of Dharma, all diseases, the karmic influences of planets and the enemies get destroyed.
इदमेव ही पाण्डित्यं चातुर्यमिदमेव ही।
इदमेव सुबुद्धित्वं आयादल्पतरो व्ययः।।
अर्थात्,
अपने आय से भी कम् खर्च करना ही मनुष्य का पाण्डित्य,चतुरता और बुद्धिमता का परिचायक है।
Meaning -
One's income should be more than what he spends and that indicates his knowledge, cleverness and intelligence.
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।
मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ।।
अर्थात्,
उद्योगी /परिश्रमी का दारिद्र्य नहीं रहता है। जप करने से पाप दूर होता है। शान्त व्यक्ति का किसी के साथ झगड़ा नहीं होता है। सर्वदा सतर्क रहने वाले व्यक्ति को कभी भय नहीं रहता है।
Meaning -
The rich never face poverty. Recitation of prayer or mantras keep sins away. People who choose peace do not get into fights. And those who always stay prepared never get scared .
यथा देशस्तथा भाषा यथा राजा तथा प्रजाः।
यथा भूमिस्तथा तोयं यथा बीजं तथाऽङ्कुरः।।
अर्थात्,
देश के अनुसार भाषा, जैसे राजा वेसे ही प्रजा, मिट्टी के अनुरूप जल और बीज के अनुरूप अङ्कुर निकलता है।
Meaning -
One should speak the language according to the country, the citizen should behave as per the king, the water follows the soil's nature and sprouts emerge according to the seed's nature.
उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं विषयेष्वसक्तम्।
शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः।।
अर्थात्,
उत्साही, आलस्यरहित, कार्य करने के उपायों को जाननेवाले तथा वुरे विषयों से अनासक्त, वीर उपकार को जाननेवाले और उत्तम मित्रता रखने वाले मनुष्य के घर लक्ष्मी स्वयं जाती हैं स्थिर रहने के लिए।
सुखार्थी च त्यजेद् विद्या विद्यार्थी च त्यजेत् सुखम्।
सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्।।
अर्थात्,
सुख के ईच्छा रखने वाले को विद्या छोडना पडता है और विद्या के अभिलाषि को सुख त्याग करना पडता है। सुखाभिलाषी का विद्या कहां होता है और विद्यार्थिओं का सुख कहां?
Meaning --
Education is difficult for those who are tempted by happiness and the one who desires knowledge would sacrifice happiness. There is no knowledge for those who desire pleasure no pleasure for pupils who seek knowledge.
युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्त स्वप्नाववोधस्य योगो भवति दुःखहा।।
अर्थात्,
जो नियमित आहार विहार करता है, जो कार्य में नियत चेष्टा करता है, जिसका निद्रा और जागरण नियत हो, उसका दुःख निवारण कारक योग सिद्ध होता है।
Meaning --
One who maintains proper diet and healthy lifestyle, who practices regularly in the work, whose sleep and wakefulness is in control, his trial of getting relieved from suffering would be a success.
मयूखैर्जगतःस्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रविः।
स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम्।।
ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता है। इसलिए इस समय मीठा, ठंडा द्रव पदार्थ, चिकने खानपान हितकारी है।
वसन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृद्भाभिरीरितः।
कायाग्निं बाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून्।।
तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत्।
गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत्।।
अर्थात् --
वसन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से पिघल कर अर्थात् द्रव वन कर शरीर की अग्नि को कम् करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है।
इसलिए कफ को निकालने के लिए वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन क्रियाएँ करनी चाहिए। गुरु, अम्ल, स्निग्ध, मधुर वस्तुओंका सेवन और दिन में सोना त्याग करना चाहिए।
अति सर्वनाश हेतुर्ह्यतोऽत्यन्तं विवर्जयेत्। अर्थात्, अति सर्वनाश का कारण है। इसलिए अत्यधिक का परित्याग करना चाहिए। Meaning -- Excess i...