Sunday, August 2, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अनेकसंशयोच्छेदी परोक्षार्थस्य दर्शकम्।

सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः।।

अर्थात् --

     अनेक सन्देहों को दूर करने वाला और छिपे हुए अर्थोंको दिखानेवाला शास्त्र, सबका नेत्र है; जिसके पास ज्ञानदायक यह नेत्र स्वरूप शास्त्र नहीं है वह अन्धा जैसा ही है ।

Meaning --

   The shastra is the eye of all which  clarify many doubts and shows the meaning behind. People who don't have this eye like shastra which give knowledge are as blind.


Friday, July 31, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 आरभेत हि कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः ।

कर्माण्यारभमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते।।

अर्थात् --

    कार्यों को धीरे धीरे और वारवार कीजिये। क्योंकि कर्मों को आरम्भ करने वाले व्यक्ति को श्री अर्थात् धन सेवा करता है।

Meaning --

     Do the work slowly again and again. As the person who has started the work is served by wealth.

Thursday, July 30, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 

कर्णामृतं सूक्तिरसं विमुच्य दोषेषु यत्नः सुमहान् खलानाम्। 

निरीक्षते  केलिवनं प्रविश्य क्रमेलकः कण्टकजालमेव।। 

अर्थात् --

 कान के लिए अमृत स्वरूप सूक्ति(/उत्तम वाक्यों जैसे)  रसको छोड़कर बड़े बड़े दुर्जनों का प्रयास दोष निकालने में रहता है। आमोददायक वन में प्रवेश कर ऊँट काण्टेवाले पौधों को ही निरीक्षण करता है। 

Meaning --

          Wicked people always try to find fault leaving the essence of good sayings which are nectar for ear. Just like a camel looks only the thorny bushes entering into a sportive place .

Wednesday, July 29, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

दीर्घप्रयासेन कृतं हि वस्तु निमेषमात्रेण भजेद् विनाशम्।
कर्तुं कुलालस्य तु वर्षमेकं भेत्तुं हि दण्डस्य मुहूर्तमात्रम्।।

अर्थात् -
     बहुत प्रयास से निर्मित वस्तु क्षण मात्र से विनाश को प्राप्त होता है। कुम्हार का (मटका) बनाने के लिए एक साल, (उसको) तोड़ने के लिए दण्ड का मुहूर्त मात्र ही होता है। 
Meaning --
      A thing made after long endeavor gets vanish for just a moment. Just like one year of a potter for making pot is only one moment to destroy it. 

Friday, July 24, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 स्वायत्तमेकांतगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमनज्ञतायाः। 

 विशेषतः सर्वविदांसमाजे विभृषणं मौनमपण्डितानाम्‌ ।।

अर्थात् -

        पूर्णतया स्वाधीन रहनेवाली गुण विधाता द्वारा निर्मित मूर्खता /अज्ञानता का ढक्कन स्वरूप है। मौन विशेष रूप से विद्वत्समाज में मूर्खो के लिए आभूषण स्वरूप ही होता है ।


Meaning --

  Absolute self-dependent is the lid over ignorance made by almighty . Especially in the world of learned people silence works as ornament for foolish. 

Friday, July 3, 2026

NCERT SANSKRIT SHEMUSHI CLASS-10 CHAPTER- 9 BHUKAMPAVIBHEESIKA

 


          २००१ ख्रीष्टाब्द में गणतंत्र दिवस पर्व पर जब समग्र भारतराष्ट्र नृत्य गीत वाद्ययंत्रों के उल्लास में मग्न था तब अचानक ही गुर्जर राज्य चारों ओर से बेचैन, अस्तव्यस्त, विकलक्रन्दन और विपत्ति ग्रस्त हो गया। भूकम्प का भयानक घटणा (प्रलय) समग्र गुर्जरक्षेत्र को विशेषरूप से कच्छजनपद को विनाश के बाद बची हुई वस्तुओं में परिवर्तन किया। भूकम्प का केन्द्रस्वरूप भुजनगर तो मिट्टी के खिलौने के समान टुकडेे होगए। बहुमंजिले मकान क्षण में ही धराशायी होगए(जमीन में मिलगए)। बिजली के खम्बे उखड गये। घरों के सीढीओं के रास्ते बिखर गये। भूमि दो खण्डो में विभाजित हो गई। भूमि के गर्तों से ऊपर निकलती हुई जिनको हटाना कठिन है - ऐसी जलधाराओं से विशाल बाढ का दृश्य उपस्थित हो गया। हजारों संख्या में प्राणियाँ क्षण में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। विनष्ट मकानों में  हजारों पीडिता सहायता के लिए करुण क्रन्दन करते हैं। हे विधाता! भूख से दुर्बल कण्ठवाले मृतप्राय कुछ शिशु भगवत् कृपा से ही दो तीन दिन जीवन धारण किया था।
           यह था कच्छ भूकम्प का अतीव भयावह दृश्य। २००५ ख्रीष्टाब्द में भी कश्मीर प्रान्त में और पाकिस्तान देश में धरती का विशाल कम्पन हुआ।  जिस कारण से लाखों लोग असमय मृत्यु को प्राप्त हुए। पृथ्वी किस कारण से प्रकम्पित होता है- इस विषय में वैज्ञानिकों ने कहते हैं कि धरती के गर्भ के भीतर उपस्थित विशाल प्रस्तर जब संघर्षण(घिसने) के कारण टूटते हैँ तब अत्यधिक मात्रा में प्रस्तरों का अपने स्थान से हटना, और हटने से कम्पन होता है॥ वह भयावह कम्पन ही पृथ्वी के उपरि भाग पर भी आकर महाकम्पन उत्पन्न करती है  जिसे महाविनाश का दृश्य समुपस्थित होता है।
          ज्वालामुखपर्वतों का विस्फोट से भी भूकम्प होता है -ऐसे भूकम्पविशेषज्ञ कहते हैं। पृथ्वी के गर्भ में स्थित अग्नि जब भूमि को खोदने से प्राप्त वस्तु, मिट्टी,प्रस्तर आदि संग्रह को उबालती है तब वो सब ही लावारस को प्राप्त हो कर धरती अथवा पर्वत को फाडकर बाहर निकलता है। तब आकाश धुएँ और राख से ढक जाता है।सेल्सियश-ताप-मात्रा की एकसौ आठ(१०८) अङ्क को प्राप्त यह लावारस जब नदीवेग (नदी के धारा जैसी) से प्रवाहित होता है तब समीप के गाँव अथवा सहर उसके पेट में क्षण में ही समा जाती हैं। 
     और वेचारे (विवश) प्राणी मरते हैं। ज्वाला को प्रकट करते हुए ये पर्वत भी भीषण भूकम्प उत्पन्न करती हैं।
     यद्यपि भूकम्प भाग्य का प्रकोप है, उसको शान्त करने का कोई भी स्थिर उपाय नहीं दिखरहा है। आज भी प्रकृति के सामने विज्ञान से गर्व करने वाला मनुष्य वामन सदृश ही है तथापि भूकम्परहस्य को जानने वाले कहते हैं की बहु मंजिले मकानों का निर्माण नहीं करना चाहीए। नदी किनारे बान्ध बनाकर बृहत् मात्रा में नदी जल को भी एक जगह पर इकट्ठा नहीं करना चाहीए। अन्यथा असन्तुलन के कारण भूकम्प सम्भव है। वस्तुतः(फलस्वरूप) पृथ्वीजलअग्नीवायुआकाश इन पञ्चतत्वों का शान्त होना ही भूभाग का  योगक्षेम के  लिए उचित है॥ उन अशान्त पञ्चतत्त्व निश्चित रूप से महाविनाश को उपस्थापित करते हैं। 
अभ्यासः

१.  अधोलिखितानां प्रश्नानां उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत  -
क)    समस्तराष्ट्रं  नृत्य-गीतवादित्राणाम्  उल्लासे मग्नम् आसीत्।
ख) भूकम्पस्य केन्द्रबिन्दुः कच्छजनपदः आसीत्।
ग) पृथिव्याः स्खलनात् कम्पनं जायते।
घ) समग्रं विश्वम् विपन्नैः आतंकितः दृश्यते।
ङ) ज्वालामुखपर्वतानां विस्फोटैरपि भूकम्पो जायते।
च) बहुभूमिकानि भवनानि धराशायीनि जायन्ते।
२.  
क) भूकम्पविभीषिका विशेषेण कच्छजनपदं केषु परिवर्तितवती?
ख) के कथयन्ति यत् पृथिव्याः अन्तर्गर्भे, पाषाणशिलानां संघर्षणेन कम्पनं जायते?
ग)  विवशाः प्राणिनः कुत्र पिपीलिका इव निहन्यन्ते?
घ) किदृशी भयावहघटना गढ़वाल  क्षेत्रे घटिता?
ङ) तदिदानीं किं विचारणीयम् तिष्ठति?
४.  
क) समग्रं भारतम् उल्लासे मग्नः अस्ति। 
ख) भूकम्पविभीषिका कच्छजनपदं विनष्टं कृतवती।
ग) क्षणेनैव प्राणिनः गृहविहीनाः अभवन्।
घ) शान्तानि पञ्चतत्त्वानि भूतलस्य योगक्षेमाभ्यां भवन्ति।
ङ)  मानवाः पृच्छन्ति यत् बहुभूमिकभवननिर्माणं करणीयम्    न वा?
च) नदीवेगेन ग्रामाः तदुदरे समाविशेत्।
५.
(अ )   परसवर्णसन्धिनियमानुसारम्  -
  क)  किञ्च  -   किम्   +    च
   ख)   नगरन्तु   -   नगरम्    +   तु
   ग)   विपन्नञ्च   -    विपन्नम्   +   च
  घ)    किन्नु    -    किम्   +   नु
   ङ)   भुजनगरन्तु    -   भुजनगरम्   +   तु
   च)    सञ्चयः    -   सम्    +    चयः
(आ)  विसर्गसन्धिनियमानुसारम्   -
    क)   शिशवस्तु    -   शिशवः   +   तु
   ख)    विस्फोटैरपि     -     विस्फोटैः    +   अपि
   ग)   सहस्रशोऽन्ये   -     सहस्रशः     +   अन्ये
   घ)    विचित्रोऽयम्   -    विचित्रः   +   अयम्
   ङ)   भूकम्पो जायते   -   भूकम्पः   +   जायते
   च)    वामनकल्प एव   -   वामनकल्पः   +     एव
६.   (अ)    विलोमपदानां  संयोगं कुरुत   -
                                      क                                     ख
                             सम्पन्नम्                            विपन्नम्
                           ध्वस्तभवनेषु                         नवनिर्मितभवनेषु
                        निस्सरन्तीभिः                               प्रविशन्तीभिः
                                निर्माय                            विनाश्य
                                क्षणेनैव                          सुचिरेणैव
(आ)   समानार्थकपदानां संयोगं कुरुत  - 
                                क                                    ख
                            पर्याकुलम्                       व्याकुलम्
                       विशीर्णाः                                    नष्टाः
                                    उद्गिरन्तः                   प्रकटयन्तः
                                     विदार्य                                      संत्रोट्य
                                 प्रकुपिताम्                       क्रोधयुक्ताम्
     


 ७.  (अ)    प्रकृति-प्रत्यययोः विभागं कुरुत  -
        परिवर्तितवती   -    परि    +   वृत्    +क्तवतु   +   ङीप्  (स्त्री)
       धृतवान्            -      धृ   +    क्तवतु
                 हसन्   -   हस्  +   शतृन्
       विशीर्णा   -    वि    +   शृ  +     क्त    +टाप्
    प्रचलन्ती    -      प्र   +   चल्    +    शतृ    +   ङीप्  (स्त्री)
    हतः     -    हन्            +          क्त
    (आ)   समस्तपदानि लिखत  -
     महत् च तत्  कम्पनं  -   महत्कम्पनं
   दारुणा च सा विभीषिका   -   दारुण-विभीषिका
     ध्वस्तेषु च तेषु भवनेषु   -   ध्वस्तभवनेषु
   प्राक्तने च तस्मिन् युगे    -     प्राक्तनयुगे
    महत् च तत् राष्ट्रं  तस्मिन्   -   महद्राष्ट्रे









   

Tuesday, June 30, 2026

NCERT SANSKRIT SHARADA CLASS - 9 CHAPTER - 1 सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्

अनुवाद -

      संस्कृत-भाषा भारतीयों का एकता साधन करती है, भारतीयत्व सम्पादन करती है, ज्ञानसमूहों का प्रकाश/आलोक दिखाती है और सर्वदा आनन्द के परम्परा को उत्पन्न करती है।

     संस्कृत सभी लोगों के मन को शुद्ध करता है, सभी के वचनों को परिष्कार करता है, सन्मार्ग का प्रेरणा देता है,  सद्गुणों का समूहों को ही उत्पादन करता है।

     संस्कृत विश्वबन्धुत्व का विस्तार करता है, सभी प्राणियों के ऐक्य को समझाता है , चारों ओर शान्ति प्रतिष्ठा करता है और प्रसिद्ध पाञ्च शील/स्वभाव का रीति भी है।

    संस्कृत त्याग, हर्ष और सेवा का व्रत है , प्रपञ्च/संसार का मङ्गल ही करना चाहिए - ऐसा ज्ञान और विज्ञान से संयुक्त विचार है तथा भोग और मोक्ष का मार्ग को प्राप्त/उदय कराता है।

    धर्म के, कामनाओं का,अर्थ का और मोक्ष का भी साधन संस्कृत से मिलता है। इहलोक और परलोक में संस्कृत से उन्नति मिलती है। भक्ति आचरण करने के लिए, ज्ञान प्राप्ति के लिए और कर्म करने के लिए संस्कृत साधन है। इसलिए संस्कृत सत्य, शिव(/कल्याणकारी) और सुन्दर है।

  ललित शब्द संस्कृत रूपी वन में पेड़ सदृश हैं। यह मनोहर मधुर रस की धारागृह है। विश्व प्राणियों के मन को चमत्कार प्राप्त होता है। भारतीय पूर्वजों के कीर्ति समूहों का द्योतक है संस्कृत।


अभ्यासाद् जायते सिद्धिः -


२.  एकपदेन उत्तरं लिखत -

क)  संस्कृतं कस्याः साधकम्?             भारतीयैकतायाः

ख)  सर्वदा संस्कृतं कस्य संदोहदम्?       आनन्दस्य 

ग)   संस्कृतं कस्य प्रेरणादायकम्?          सत्पथस्य

घ)   संस्कृतं कासां परिष्कारकम्?           सर्ववाणीनाम्

च)   कस्य विस्तारकं संस्कृतम्?           विश्वबन्धुत्वस्य


३.      अधोलिखितप्रश्‍नानां उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —

(क)   सर्वतः कस्याः संस्थापकं संस्कृतम्?

उत्तरम् -  सर्वतः शान्त्त्याः  संस्थापकं संस्कृतम्।

(ख) कीदृशं व्रतं  संस्कृतम्?

उत्तरम् -  त्यागसन्तोषसेवायाः च  व्रतं  संस्कृतम्?

(ग) कयोः सम्मेलनम्  संस्कृतम्?

उत्तरम् -   ज्ञानविज्ञानयोः  सम्मेलनम्  संस्कृतम्।

(घ) संस्कृतं कस्य चमत्कारकम्?

उत्तरम् - संस्कृतं  विश्वचेतस्य चमत्कारकम्।

(ङ) केषां यशः स्मारकं संस्कृतम्?

उत्तरम् -  पूर्वजानां  यशः स्मारकं संस्कृतम्।

४.   रिक्‍तस्थानानि पूरयन्तु — 

यथा—..सर्वभूतैकता...-कारकं संस्कृतम्।

(क) ....भारतीयत्व  सम्पादकं संस्कृतम्।

(ख) ...ज्ञानपुञ्जप्रभा.... दर्शकं संस्कृतम्।

(ग) ...सर्वमस्तिष्क...संस्कारकं संस्कृतम्।

(घ) कर्मदं.....ज्ञानदं.... भक्‍तिदं संस्कृतम्।

(ङ) सत्यनिष्‍ठं ....शिवं सुन्दरं... संस्कृतम्।

(च) शब्दलालित्य ...लीलावनं... संस्कृतम्।


५.  मञ्जूषाया: पदान‍ि उपयुज्‍य षड् वाक्यानि रचयत —

क)   संस्कृत-भाषा भारतीयानां एकता साधयति।/अङगुलीनां एकता हेतोः मुष्टिः संभवति।

ख)   विश्वस्य सर्वतः संस्कृत भाषा शान्तिं संस्थापयति।/ सर्वतः प्रासादानां विस्तारेण हरितबृक्षाः क्रीडाप्रान्तराश्च नष्टाः जायन्ते।

ग)     सत्पथे प्रेरयितुं संस्कृत-भाषा शिक्षयति।/अस्मान् सत्पथे प्रेरयितुं अस्माकं परिवारस्यावदानं श्रेष्ठमस्ति।

घ)   स्वामी विवेकानन्दो तथा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आदीनां पूर्वजानां कार्याणि विश्वकल्याणाय उद्दिष्टानि।

ङ)    जीवने समृद्धिनिमित्तं त्यागस्य अत्यावश्यकमस्ति।

च)     'लौहपुरुषः' इत्युपाधिः सर्दार वल्लभभाई पटेल महोदयस्य सेवाव्रतस्य परिचायिका अस्ति।


६.   अधोलिखितानां समस्तपदानां उदाहरणानुसारं विग्रहं  कुरुत —

क)।  ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम्   -  ज्ञानपुञ्जप्रभायाः दर्शकम्

ख)   सर्ववाणीपरिष्कारकम्    -   सर्ववाण्याः परिष्कारकम् 

ग)    विश्वबन्धुत्वविस्तारकम्   -  विश्वबन्धुत्वस्य विस्तारकम्    

घ)।  सर्वभूतैकताकारकम्     -   सर्वभूतैकतायाः कारकम्

ङ)   शान्तिसंस्थापकम्         -    शान्त्याः संस्थापकम्

च)   ज्ञानविज्ञानसम्मेलनम्   -  ज्ञानविज्ञानयोः सम्मेलनम्

७.   प्रदत्तमञ्जूषातः पर्यायपदानि चित्वा रिक्‍तस्थाने लिखत

क) (क) विद्वांसः .तेजोराशयः.. भवन्ति ।

(ख) सूर्यस्य....किरणः..सर्वेषां प्राणीनां कृते हितकरः भवति ।

(ग) ईश्‍वरं स्मृत्वा ...उल्लासः..उपजायते।

(घ) विद्यायाः ...मानम्.... अजरं भवति ।

(ङ) प्रकृतेः शोभा .... अनुपमा... विद्यते।

(च) यत्र....जगत्.... एकनीडं भवति ।

८.  अधोलिखितानां मेलनं कुरुत —

(क) भारतीयैकतायाः                 -    २. साधकम्         

(ख) सत्पथे                              -    ४. प्रेरणादायकम् 

(ग) त्यागसन्तोषसेवारूपम्          -    ५. व्रतम्            

(घ) ज्ञानपुञ्जप्रभायाः                -     ३. दर्शकम् 

(ङ) विश्‍वबन्धुत्वस्य                    -    १.  विस्तारकम्



समाप्तम्               

Wednesday, June 3, 2026

सुभाषितम्( THOUGHT OF THE DAY)

दुर्लभान्यपि कार्याणि सिध्यन्ति प्रोद्यमेन ही। 

शिलापि तनुतां याति प्रपातेनार्णसो मुहुः।। 

अर्थात्,

   कठिन से कठिनतर कार्य भी उद्यम/प्रयास से निश्चितरूप से सिद्धिप्रद/सफल होते हैं। क्योंकि जल बार-बार गिरने से पत्थर भी क्षीण/छोटा हो जाता है।

Meaning -

Difficult actions certainly get success due to continuous effort. Just as regular flow of water even shorten the stone.

Monday, June 1, 2026

सुभाषितम्( THOUGHT OF THE DAY)

 

सा विद्या या मदं हन्ति सा श्रीर्यार्थिषु वर्षति।

धर्मानुसारिणी या च सा बुद्धिरभिधीयते॥

अर्थात्,

            विद्या वह है, जो अहंकार को नष्ट करे। लक्ष्मी वह है जो याचकों पर वरषे । बुद्धि वह कही जाती है जो धर्मानुसारिणी हो।

Meaning -

           Wisdom is that which keeps pride away. Lakshmi/ wealth is that which showers upon the supplicants. And intellect is said to be that which follows 'Dharma'.

Sunday, May 31, 2026

ANKA GANANAM( COUNTING OF NUMBERS)

ब्रम्हेकम् (१)  

                       पक्षद्वयम् (२) 

त्रिसन्ध्यम् (३) 

                        चतुर्वेदम् (४)

पञ्चामृतं (५)

                        षड् ऋतवः (६)

सप्त वासराः (७)

                         अष्ट प्रहराः (८)

नव रसाः (९)

                           दश अवताराः (१०) ।।



Sunday, May 24, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अनादानमदत्त स्यास्तेयव्रतमुदीदितम्। 

बाह्याः प्राणा नृणामर्थो हरता तं हता ही ते।। 

अर्थात्, 

न दी गई वस्तु को न लेना अस्तेय विद्या(/चोरी न करने का नियम) कहा गया है। धन मनुष्यों का   बाहरी प्राण है। जिसने उन धन को ले लिया उसने उन प्राणों को ही हरण कर लिया ।

Friday, May 22, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 उपायेषु स्थितस्यापि नश्यन्त्यर्थाः प्रमाद्यतः।

अर्थात्, 

           युक्तिपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्ति के कार्य भी असावधानता के कारण नष्ट हो जाते हैं। 

Saturday, May 9, 2026

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 CHAPTER -.8 VASTRA VIKRAYAH

वस्त्र विक्रयः

अष्टम पाठः

(तब अनुचर के साथ विदेशी गौरांग का प्रवेश होता है। वह राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र दिखाकर सेठ और जुलाहको डांटता है ।)
वैदेशिक गौरांगः - जुलाहा! राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र देखो। तुम विक्रेता नहीं हो।
तन्तुवायः - तब मैं इस वस्त्र का क्या करुंगा ?
वै गोराङ्गः - इस वस्त्र को मुझे देदो, मैं इसे वेचुंगा, यह पचास मुद्रा लो/ग्रहण करो।(पचास मुद्रा देता है)
तन्तुवायः - (आश्चर्य के साथ देखकर) क्या यह उचित है? इससे कैसे मेरे परिवार का पालन-पोषण होगा? छह महीने से कैसे भी रातदिन परिश्रम से यह वस्त्र वना है।
वै गोराङ्गः - यह मुद्रा लो, मैं कुछ नहीं जानता हूं। चूप रहो, जाओ। और दूसरा वस्त्र वना कर मेरे पास ही लाओ। तुम्हारे परिवार की रक्षा के लिए मुझसे कोई प्रतिज्ञा नहीं किया गया है। कैसे रक्षा होनी चाहिए यह तुम जानो अभी जाओ।
(वह मुद्रा नहीं लेता है इसलिए दूसरा जुलाहा वस्त्र बेचने के लिए प्रवेश कर वस्त्र खरीदने के लिए सेठ को दिखलाता है ।) 

तन्तुवायः -- सेठ्! वस्त्र लो। 
श्रेष्ठिन् - ( नेत्रपटल से सूचित कर) ये खरीदेगा। मैं खरीदने के लिए समर्थ नहीं हूँ। 
तन्तुवायः - कैसे?
श्रेष्ठी - इस के पास राजा के प्रमाणपत्र है ये ही खरीदेगा। दूसरा नहीं। 
वै. गौराङ्गः - इधर आओ।(जुलाहा को बुलाता है, प्रमाणपत्र दिखाता है, वस्त्र लेता है। ) ये चालीस मुद्रा लो। 
(मुद्रा देता है) 
तन्तुवायः - महाराज! क्या यह उचित है? क्या यह न्याय है? 
वै.गौराङ्गः - जाओ जाओ। मैं न्याय अथवा अन्याय जानता नहीं हूं। जो मुझसे निश्चय किया गया और दिया गया वही मूल्य ही है ।
(उभय उसके द्वारा दिए गए मूल्य को ग्रहण करते हैं।)

उभौ तन्तुवायौ - इसके बाद वस्त्र निर्माण नहीं करेंगे।(यह कहकर चले जाते हैं।)
वै.गौराङ्गः - (अनुचर को उद्देश्य कर) देखो। इनसे बहुत मुद्रा ले लेंगे। इन् वस्त्र द्वय का सौ न्दर्य अवर्णनीय है।यह वस्त्र अत्यधिक महीन है। देखो, इसके पांच छह परत ढका हुआ होने पर भी शरीर वस्त्र रहित प्रतीत होता है। आः कैसे इनके सामने हमारे देशीय वस्त्रों का विक्रय होगा, इस प्रकार हमारे देशीय व्यापार समाप्त हुआ। (फिर सोच कर)
श्लोकः -
इसी सूक्ष्म वस्त्र का निर्माण के रीति को समूल नष्ट करने में मैं समर्थ हूँ। इसलिए यहाँ उन वस्त्र वनानेवाले कारीगरों को पिटाई /अत्याचार रूप दण्ड देकर वस्त्र वनाने से मुक्त करूंगा/रोकुंगा। उस अधिक वाणिज्य योग्य अत्यधिक उन्नत कुशलता/ निपुणता नीचे जाना चाहिए। इस देश का उन्नति लोककथा माध्यम से ही समाहित होता है।
दौवारिकः - जय हो जय हो देव!
वै.गौराङ्गः - दौवारिक! शीघ्र ही तीन चार जुलाहों को लेकर आओ।
दौवारिकः - प्रभु जो आदेश करते हैं। (बाहर जा कर तीन जुलाहों को साथ लाकर प्रवेश करता है।)
वै. गौरांगः - (जुलाहों को उद्देश्य कर) तुम लोगों ने निर्माण किया हुआ वस्त्रों को मुझे देदो।
तन्तुवायाः - हम अनुचित मूल्य के कारण वस्त्र नहीं बनाते हैं।
वै.गौराङ्गः - ठीक् है सुन्दर वस्त्र बना कर मुझे दो, उचित मूल्य होगा। ये मुद्राएं लो। (पन्द्रह मुद्राएं देता है। वो नहीं लेते हैं। बलपूर्वक उनके वस्त्र में बांध कर हाथ में गर्दन पकड़ कर बाहर निकाल देता है।)
तन्तुवायाः - (द्वार पर रह कर) महाराज! हम सौ मूल्य के वस्त्र को पचास मुद्राओं से नहीं बनाएंगे।
वै.गौराङ्गः - (आक्षेप करते हुए) ये कौन शोर कर रहे हैं? (द्वार पर जाकर गुस्से से, उनको डण्डे से मारता है।) जाओ दूसरा सुन्दर वस्त्र बनाकर लाओ।(मुद्रा फेंक कर वे चले जाते हैं)
वै.गौराङ्गः - (अनुचर को लक्ष्य  कर) हे हे अन्य तीन चार जुलाहों को लाओ।(वह बाहर जा कर चार जुलाहों को लाकर )
महाराज! ये आगये।
वै.गौराङ्गः - (जुलाहों को लक्ष्य कर) बनाया गया रेशमी वस्त्रों को मुझे देदो।
तन्तुवायाः - हम वस्त्र नहीं बना रहे हैं।
वै.गौराङ्गः - यह झूठ है। तुम लोग वस्त्रों को बनाकर सेठ लोगों के पास बेचते हो।(सभी को कोड़े से मारने के लिए डांटता है।)
सर्वे - हम नहीं बना रहे हैं।(बंधे हुए जोडो हस्तोंवाले (वे सब) कांपते हैं।)
(सब निकल गये)



अभ्यासः

१. प्रश्नानामुत्तराणि संस्कृतभाषया देयानि -
क) अयं पाठः 'भारतविजयनाटकम्'इति ग्रन्थात् संकलितः पं. मथुराप्रसाद दीक्षितः च तस्य प्रणेता।
ख) वै.गौराङ्गः राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्रं संदर्श्य श्रेष्ठीनौ तन्तुवायञ्च भर्त्सयति।
ग) षड्भिर्मासैः कथमपि रात्रिन्दिवं परिश्रम्य तन्तुवायेन पटः निष्पादितः।
घ) यन्मया निश्चीयते दीयते च तदेव मूल्यं इति कथनं वै.गौराङ्गस्यास्ति।
ङ) तन्तुवायाः कोशेयपटस्य निर्माणमकुर्वन्।
च)। यूयं निर्मितान् पटान् मह्यं दत्त इति वै.गौराङ्गः तन्तुवायान् प्रति कथयति।
छ) गौराङ्गः तन्तुवायान् हठात् तेषां बसने निवध्य गलहस्तेन निष्कासयति।
ज) वैदेशिक गौरांगः तन्तुवायान् कशया ताड़यितुं भर्त्सयति।
२.
क) कथमेतेन मम कुटुम्बस्य भरणपोषणे भविष्यतः।
ख) अनिर्वचनीयं एतत् पटयोः सौन्दर्यम्।
ग) कथमेतत्समक्षमस्मद्देशीयानां पटानां विक्रयो भविष्यति।
घ) शोभनं पटं निर्माय मह्यं दत्त, योग्यं मूल्यं भविष्यति।
ङ) यूयं पटान् निर्माय श्रेष्ठिनां सविधे विक्रीणीध्वे। 
३.  सप्रसङ्गम् व्याख्यायन्ताम् -
   क) युष्मत्कुटुम्बरक्षायै  ...….......... जानीहि व्रजाधुना।
        वाक्यमेतत् महामहोपाध्याय पंडित मथुरा प्रसाद दीक्षितकृतं "भारतविजयनाटकम्" इति ग्रन्थात् संकलितो 'वस्त्रविक्रयः' इति पाठादानीतम्। अस्मिन् वाक्ये वै. गौराङ्गः तन्तुवायान् प्रति कथयति यत् युष्मत् परिवाररक्षार्थं अहं काऽपि प्रतिज्ञा न कृतवान्। तेषां रक्षा कथं भवेत् तत् त्वमेव ज्ञास्यसि। संप्रति गच्छ। 
भारतवर्षे वेदेशिक शासनसमये वस्त्रक्रयविक्रयश्च कथं अचलत् तेन च तन्तूवायानां कुटुम्बरक्षा कथं अभवत् तस्मिन् विषये अत्र वर्णितमस्ति। यदा तन्तुवायः वस्त्रविक्रयार्थं श्रेष्ठिनौ पटं दर्शयति स्म तौ अपि च तं एकशतमुद्रा दातुं निश्चितवन्तौ तदा वै.गौराङ्गः अनुचरेण सह तत्र संप्राप्तः। सः तान् राजमुद्राङ्कितप्रमाणपत्रं प्रदर्शयति येन तन्तुवायः स्वयं मूल्य निर्धारणं कृत्वा कुत्रचिदपि पटं विक्रेतुम् असमर्थः।  पटं निर्माय सः वै.गौराङ्गमेव समर्पयिष्यति। वै.गौराङ्गः तस्य पटं नीत्वा तं पञ्चाशत् मुद्राः अददात् । परन्तु तत् मूल्यं  अनुचितम् अथ च ताभिः मुद्राभिः तस्य परिवारस्य पालनपोषणञ्च कथं भविष्यति इति एतत् कारणात् सः अस्वीकृतवान्। अपि च षड्भिर्मासैः कथमपि रात्रिन्दिवं परिश्रम्य तत्पटः निष्पादितः।
परन्तु वै.गौराङ्गः तस्य वचः अश्रुत्वा बाध्यतापूर्वकं तं उपरोक्तवाक्यमकथयत् यत् इमा मुद्रा गृह्णीष्व। अहं किमपि न जानामि। मौनम् तिष्ठ,गच्छ। अपरं पटं निर्माय मत् समीप एव आनय। युष्मत् कुटुम्बरक्षायै अहं प्रतिज्ञा न कृतवान्। कथं रक्षा भवेत् तत् त्वम् जानीहि, अधुना गच्छ।

ख)  अनिर्वचनीयमेतत्पटयोः......................अङ्गम्। 
        एषा उक्तिः महामहोपाध्याय पं मथुरा प्रसाद दीक्षितेन कृतं "महाविजयनाटकम्" इति ग्रन्थात् संकलितो 'वस्त्रविक्रयः' इति पाठादानीता। अत्र वै. गौराङ्गः अनुचरमुद्दिश्य  वस्त्रस्य प्रशंसा करोति।
 ग)। न वयमयोग्यमूल्यत्वात् पटं निर्मामः।

४.  सन्धि विच्छेदं कुरुत -
      क)  विंशत्यधिकम्  - विंशति + अधिकम्
      ख)  मुद्राङ्कितम्    - मुद्रा।   + अङ्कितम् 
      ग)।  विधेरुन्मूलनम्।  -  विधेः  +। उन्मूलनम् 
      घ)।  मोचयिष्याम्यतः। -  मोचयिष्यामि + अतः 
      ङ)   सामर्षम्   -   स+।  आमर्षम् 
५.  श्लोकस्य स्वमातृभाषया अनुवादः -
    
      इसी सूक्ष्म वस्त्र का निर्माण के रीति को समूल नष्ट करने में मैं समर्थ हूँ। इसलिए यहाँ उन वस्त्र वनानेवाले कारीगरों को पिटाई /अत्याचार रूप दण्ड देकर  वस्त्र वनाने से मुक्त करूंगा/रोकुंगा। उस अधिक वाणिज्य योग्य अत्यधिक उन्नत कुशलता/ निपुणता नीचे जाना चाहिए। इस देश का उन्नति लोककथा माध्यम से ही समाहित होता है।
६.  प्रकृति प्रत्यय
 क)  विक्रेतुम्  -  वि + क्री + तुमुन् 
 ख)  अनिर्वचनीयम् -  नञ् + निर् + वच् + अनीयर्
 ग)।  विचिन्त्य।   वि + चिन्त् + ल्यप् 
 घ)   गत्वा   -  गम्  + क्त्वाच्
 ङ)। निवध्य -  नि + हन् + यत्
 च)  निर्माय।  -  निर् + मा + ल्यप् 
 छ)   अभिलक्ष्य-  अभि + लक्ष्+  ल्यप् 





Thursday, May 7, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रिया।

चित्ते वाचि क्रियायां च साधूनामेकरूपता।।

अर्थात्,

   जैसा मन वैसे ही वाणी, जैसी वाणी वैसे ही कार्य होता है। सज्जनों के मन, वाणी और कार्य में समानता होती है।

Meaning --

As the mind so is the speech and as the speech so is the action. There is equality in thought, speech and actions of noble people. 

Wednesday, May 6, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 न च शत्रुरवज्ञेयो दुर्बलोऽपि बलीयसा।

अल्पोऽपि हि दहत्यग्निर्विषमल्पं हिनस्ति च।।

अर्थात्,

  बलवान व्यक्ति को  शत्रु का उपेक्षा दुर्बल होने पर भी नहीं करनी चाहिए। क्योंकि थोड़ी सी भी अग्नि जला देती है और थोड़ा-सा विष भी मार डालता है।

Meaning --

A powerful man should not ignore the enemies even the weak one. Because a little bit of fire also burns and even a small amount of poison kills.


Tuesday, May 5, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अति सर्वनाश हेतुर्ह्यतोऽत्यन्तं विवर्जयेत्। 

अर्थात्, 

 अति सर्वनाश का कारण है। इसलिए अत्यधिक का परित्याग करना चाहिए। 

Meaning --

 Excess is the cause of destruction. Hence one should forbid it in every respect.

Monday, May 4, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 उच्चासनगतो नीचो नीचः एव न चोत्तमः।

प्रासादशिखरस्थोपि काकः न गरुडायते।।

अर्थात्,

   ऊँचे पद पर आसीन होने पर भी नीच नीच ही रहता है,उत्तम नहीं बन पाता। जैसे महल के शिखर पर बैठा हुआ कौवा कभी गरूड नहीं बनता है। 

Meaning --

  A despicable /mean person remains mean even though he holds a high position ; but can't be perfect. Just like the crow sitting on the top of the  palace cannot be a vulture .


Sunday, May 3, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अक्रमेणानुपायेन कर्मारम्भो न सिध्यति।

अर्थात्,

विना क्रम के और विना युक्ति के शुरु किया गया काम सफल नहीं होता है।

Meaning --

  The work started without any arrangement and planning doesn't succeed. 

Friday, May 1, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 सुजनो न कुप्यत्येव अथ कुप्यति विप्रियं न चिन्तयति।

अथ चिन्तयति न जल्पति अथ जल्पति लज्जितो भवति।।

अर्थात्,

   सज्जन क्रोध नहीं करता है यदि कभी क्रोध करता है तब अनिष्ट नहीं सोचता है और यदि सोचता है तब अप्रिय नहीं बोलता है और यदि बोलता है तब लज्जित होता है।

Meaning --

A wise man doesn't get angry and if ever he would do so then he won't think about to blame. If he thinks to do so then he would not talk unpleasant. And if he tells so then he would be  ashamed. 

  

Thursday, April 30, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 उक्त्वानृतं भवेद्यत्र प्राणीनां प्राणरक्षणम्।

अनृतं तत्र सत्यं स्यात्सत्यमप्यनृतं भवेत्।।

अर्थात्, 

  झूठ बोलने से जहाँ प्राणियों की प्राणरक्षा हो सकती हो वहाँ झूठ भी सच है और सच भी झूठ होता है। 

Meaning --

Where telling a lie can save the life of people, there the lie would be true and true becomes lie. 

Wednesday, April 29, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अपि शाकं पचानस्य सुखं वै मघवन् गृहे।

अर्जितं स्वेन वीर्येण न व्यपाश्रित्य कश्चन।।

अर्थात्,

  हे इन्द्र! किसी दूसरे का सहारा न लेकर वरं अपने पराक्रम से ही अर्जित शाक को पकाने वाले के घर में सुख होता है।

O lndra! Happiness remains there in the house of one who consumes food earned through his own valour without taking any other's help.


Tuesday, April 28, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 आनन्दवाष्परोमाञ्चौ यस्य स्वेच्छावशंबदौ।

किं तस्य साधनैरनैः किङ्कराः सर्वपार्थिवाः।।

अर्थात्,

आनन्द के अश्रु तथा रोमाञ्च जिसके इच्छा के अधीन है ,उसे अन्य साधनों की क्या प्रयोजन? सभी राजा उसके नौकर हैं।

   Meaning -

  When the tears of joy and horripilation/goosebumps are subject to/obedient to one's own  wish/desire, then what other means/instruments does he require? Thus all kings are his slaves/servants.

Monday, April 27, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 न गणस्याग्रतो गच्छेत्सिद्धे कार्ये समम्फलम्।

यदि कार्य विपत्तिः स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते।। 

अर्थात्, 

जनसमूह का मुखिया वनकर न जाएं , क्योंकी कार्य सिद्ध होने पर सव बराबर के फल के हिस्सेदार होंगे। यदि काम विगड़ गया तब मुखिया ही मार खाते हैं।

Meaning -

  One should not lead the gathering.as a chief Because the fruit of the action will be shared equally amongst all if the succeeds. But the leader is beaten up if it fails.

   

Sunday, April 26, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 पित्रा पुत्रो वयःस्थोपि सततं वाच्य एव तु।

यथा स्याद् गुणसंयुक्तः प्राप्नुयात् च महद् यशः।।

अर्थात्,

    पुत्र वयस्क होने पर भी पिता सर्वदा कहता/समझाता रहना चाहिए जिससे वह गुणी बने और अधिक यश प्राप्त  कर सकें।

Meaning -

   The father should keep advising the son even after growing up so that the latter can become moral and more famous.


Saturday, April 25, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 असत्यवचनं प्राज्ञः प्रमादेनापि न वदेत्।

श्रेयांसि येन भज्यन्ते वात्ययेव महाद्रुमाः।।

अर्थात्,

 बुद्धिमान् व्यक्ति कभी गलती से भी असत्य भाषण नहीं वोलना चाहिये क्योंकि उससे कल्याण वैसे टूट जाते हैं (/नष्ट हो जाते हैं) जैसे आंधी से महावृक्ष।

Meaning -

      A wise man should never tell a lie even by mistake. Because this breaks the good fortune just like the storm uproots the big trees.

Thursday, April 23, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 पीत्वा रसं तु कटुकं मधुरं समानं 

माधुर्यमेव जनयेन्मधुमक्षिकासौ।

सन्तस्तथैव समसज्जनदुर्जनानां

श्रुत्वा वचः मधुरसूक्तरसं सृजन्ति।।

अर्थात्,

  मधुर रस के साथ कड़ुवे रस को भी पान कर यह मधुमक्खी मधुर रस को ही निष्पन्न करती है; वेसे ही विद्वान व्यक्ति सज्जनों के साथ दुर्जनों का भी वचन सुनकर मधुर तथा उत्तम वचन रूपी रस का निर्माण करते हैं।

Meaning -

    The honey bee consumes sweet juices as well as bitter one but produce only honey which is sweet in nature . Like that, wise people create only sweet and noble talks, what type of talks they listen from good and bad persons .

Wednesday, April 22, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 संपदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च भीरूत्वम्।

तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम्।।

अर्थात्,

    जिसे संपत्ति आने पर अधिक प्रसन्नता और संकट आने पर दुःख न हो तथा युद्ध में जिसे भय न हो, त्रिभुवन में श्रेष्ठ ऐसे पुत्र को विरल ही कोई माता जन्म देती है।

Meaning -

It's rare for any mother to  give birth to a child who is best amongst the three worlds  who neither becomes happy when  wealth arrives nor is frustrated in difficult times and is not afraid of war .


     

Wednesday, April 1, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 घृष्टं घृष्टं पुनरपि पुनश्चन्दनं चारुगन्धं,

छिन्नः छिन्नः पुनरपि पुनः स्वादुमानिक्षुदण्डः।

दग्धं दग्धं पुनरपि पुनः काञ्चनं कान्तवर्णं,

प्राणान्तेऽपि प्रकृति विकृतिर्जायते नोत्तमानाम्।।

अर्थात्,

      चन्दन काष्ठ को वारवार घिसने से उसमें से सुमधुर वास उत्पन्न होता है। गन्ना वारवार चर्वित होने पर स्वादुयुक्त होता है। सुवर्ण आग में जलने से कमनीय वर्ण धारण करता है। उसी प्रकार प्राण जाते समय सज्जनों के स्वभाव परिवर्तित नहीं होते हैं। 

Tuesday, March 31, 2026

सुभाषितम(THOUGHT OF THE DAY)

 यथा कालकृतोद्योगात् कृषिः फलवती भवेत्।

तद्वन्नीतिरीयं देव चिरात् फलति न क्षणात्।।

अर्थात्,

   समय के अनुसार परिश्रम करने से जैसे कृषि कार्य भविष्यत में/कुछ समय बाद सफल होता है; वैसे ही नीतिवाक्यों को उचित समय में पालन करने से उसका लाभ उसी समय नहीं वरं भविष्यत में मिलता है।

Meaning -

    As farming would be fruitful after some days if working hard according to the nature/time. In the same way if one follows the noble thoughts in one's life will get success one day but not all of a sudden.

Saturday, March 28, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते।

आचारः प्रथमो धर्मों धर्मस्य प्रभुरच्युतः।।

अर्थात्,

      सभी शास्त्रों में सदाचार मुख्यतः वर्णित हुआ है। सदाचार ही उत्तम धर्म है। धर्म का प्रभु स्वयं भगवान् नारायण हैं।


Friday, March 27, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 

धर्मेण हन्यते व्याधिर्हन्यते वै तथा ग्रहाः।

धर्मेण हन्यते शत्रुर्यतो धर्मस्ततो जयः॥

अर्थात्,

      धर्म के बल पर व्याधि, ग्रहदोष और शत्रु नष्ट हो जाते हैं। इसलिए धर्म ही जय का कारण है॥

Meaning -

      Dharma is the only reason of victory. Because of Dharma, all diseases, the karmic influences of planets and the enemies get destroyed.

Sunday, March 22, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 इदमेव ही पाण्डित्यं चातुर्यमिदमेव ही।

इदमेव सुबुद्धित्वं आयादल्पतरो व्ययः।।

अर्थात्,

   अपने आय से भी कम् खर्च करना ही मनुष्य का पाण्डित्य,चतुरता और बुद्धिमता का परिचायक है।

Meaning -

    One's income should be more than what he spends and that indicates his knowledge, cleverness and intelligence.

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्। 

मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ।।

अर्थात्, 

        उद्योगी /परिश्रमी का दारिद्र्य नहीं रहता है। जप करने से पाप दूर होता है। शान्त व्यक्ति का किसी के साथ झगड़ा नहीं होता है। सर्वदा सतर्क रहने वाले व्यक्ति को कभी भय नहीं रहता है। 

Meaning -

 The rich never face poverty. Recitation of prayer or mantras keep sins away. People who choose peace do not get into fights. And those who always stay prepared never get scared .

Thursday, March 19, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 यथा देशस्तथा भाषा यथा राजा तथा प्रजाः। 

यथा भूमिस्तथा तोयं यथा बीजं तथाऽङ्कुरः।।

अर्थात्, 

      देश के अनुसार भाषा, जैसे राजा वेसे ही प्रजा, मिट्टी के अनुरूप जल और बीज के अनुरूप अङ्कुर निकलता है। 

Meaning -

     One should speak the language according to the country, the citizen should behave  as per the king, the water follows the soil's nature and sprouts emerge according to the seed's nature. 

Wednesday, March 18, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं विषयेष्वसक्तम्।

शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः।।

अर्थात्,

        उत्साही, आलस्यरहित, कार्य करने के उपायों को जाननेवाले तथा वुरे विषयों से अनासक्त, वीर उपकार को जाननेवाले और उत्तम मित्रता रखने वाले  मनुष्य के घर लक्ष्मी स्वयं जाती हैं स्थिर रहने के लिए।



Tuesday, February 3, 2026

सुभाषितम्( THOUGHT OF THE DAY)

 सुखार्थी च त्यजेद् विद्या विद्यार्थी च त्यजेत् सुखम्।

सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः  सुखम्।।

अर्थात्,

       सुख के ईच्छा‌ रखने वाले को विद्या छोडना पडता है और विद्या के अभिलाषि को सुख त्याग करना पडता है। सुखाभिलाषी का विद्या कहां होता है और विद्यार्थिओं का सुख कहां?

Meaning --

         Education is difficult for those who are tempted by happiness and the one who desires knowledge would sacrifice happiness. There is no knowledge for those who desire pleasure no pleasure for pupils who seek knowledge.

Monday, February 2, 2026

सुभाषितम् (THOUGHT OF THE DAY)

 युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्त स्वप्नाववोधस्य योगो भवति दुःखहा।।

अर्थात्,

           जो नियमित आहार विहार करता है, जो कार्य में नियत चेष्टा करता है, जिसका निद्रा और जागरण नियत हो, उसका दुःख निवारण कारक योग सिद्ध होता है।

Meaning --

     One who maintains proper diet and healthy lifestyle, who practices regularly in the work, whose sleep and wakefulness is in control, his trial of getting relieved from suffering would be a success.

Wednesday, January 28, 2026

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 CHAPTER-4 VEERAH SARVADAMANAH




दुष्यन्तः - (शुभ शकुन का अभिनय करते हुए) 
शकुन्तलाप्राप्ति रूप अपनी अभिलाषा केलिये तो मैं आशा ही नहीं करता हूँ, है बाहु! तब तू व्यर्थ ही क्यों  फडक रहे हो, क्योंकि जिस कल्याणकारी वस्तु का पहले तिरस्कार कर दिया जाता है वह पुनः दुःख में ही परिवर्तित हो जाती है । अर्थात्‌ वह पुनः बडी कठिनाई से प्राप्त होती है ।
(नेपथ्य से)
 चञ्चलता मत करो। अपना स्वभाव ही कहाँ जाता है।
दुष्यन्तः -- (कान लगाकर) यह स्थान अविनय (उदण्डता) के योग्य नहीं है । तो फिर किसके द्वारा कौन मना किया जा रहा है? (आवाज की ओर देखकर)
(विस्मय के साथ)
 अरे, दो तपस्वि के द्वारा पीछा किया जाता हुआ असाधारण शक्तिसम्पन्न यह बालक कौन है ।
      जिसने अभी माताके आधे ही स्तन का दूध पी पाया है और (खींचने में) रगड से जिसके कन्धों पर के बाल इधर-उधर बिखर गये हैं, एसे सिंह शिशु को खेलने के लिये बलपूर्वक खींच रहा है॥२॥
बालः -   हे सिंह! अपना मुँह खोलो, मैं तुम्हारा दान्त गिनुंगा।
प्रथम तापसी--अरे नटखट! हमारी सन्तान के तुल्य (पले हुये) प्राणियों को तुम क्यों तंग कर रहा है। ओः! तुम्हारा क्रोध तो बढता जा रहा है। ऋषियोंने ठीक् ही तुम्हारा नाम सर्वदमन रखा है ।
राजा- मेरा हृदय इस बालक पर निजी पुत्रके समान क्यों स्नेह कर रहा है ? अवश्य ही पुत्र न होनेके कारण मेरे मन में इसके प्रति यह वात्सल्य प्रेम जाग रहा है।)
दूसरी तापसी-- यह सिंहनी अवश्य तुझ पर आक्रमण कर देगी यदि तुम इसके बच्चे को नहीं छोडता है।
बालं-- (मुस्कराकर) ओह, तब तो मैं बडा डर गया हूं ।
(उसे चिढने के लिये अपना अधरोष्ठ दिखाता है)
प्रथमा - वत्स! इस सिंह शावक को छोड दो, मैं तुम्हें दूसरा खिलौना दूँगी।
बालः - कहाँ है? वह खिलौना मुझे दो।( कहकर हाथ फैलाता है)
द्वितीया - सुव्रते! इसको कहने मात्र से रोकने के लिए समर्थ नहीं होगी। तुम जाओ। मेरे कुटीर में मिट्टी की मयूर है। वह इसको दे दो।
बालः -  तब तक मैं इस्से ही खेलूँगा।(तपस्वी को देख कर हँसता है)
तपस्वी - ठीक् है। यह मुझको नहीं मान रहा हैैै।(राजा को देखकर) महाशय! इसके द्वारा वाध्य किया जाता हुआ सिंहशिशु को मुक्त करो।
दुष्यन्तः - आकार के समान इसकी चेष्टा ही कहता है। (मन ही मन)
  किसी भी बंश की अंकुर स्वरूप इसके द्वारा स्पर्ष किए गए मेरे अंगप्रत्यङ्गों में एसा सुख अनुभूत हो रहा है; जिस भाग्यवान् की गोद से यह उत्पन्न हुआ है, उसके मन में किस प्रकार का आनन्द उत्पन्न न करता होगा। 
राजा - (बालक को प्यार करते हुए) इसका वंश क्या है?  
तपस्वी - पुरुवंश।
राजा -  (मन में ) कैसे इसका और मेरा एक ही वंश है?(प्रवेश कर के)
तपस्वी - वत्स! पक्षी की सुन्दरता को देखो।
बालः - मेरी माता कहाँ है? 
राजा  -  (मन में) क्या इसके माता के नाम शकुन्तला है? 
बालः -  यह मोर मुझे अच्छा लग रहा है। (खिलौना लेता है) 

                अभ्यासः

१.  संस्कृतभाषया उतरत --
  क)  कवेः कालिदासस्य "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" इति पुस्तकाद् गृहीतोऽयं पाठः।
  ख) बालः मातुः अर्धपीतस्तनं आमर्दक्लिष्टकेशरं च सिंहशिशुं कर्षति स्म। 
 ग)  तापसी बालाय क्रीडार्थं शकुन्तक्रीडनकं दत्तवती। 
घ)   क्रीडापरस्य बालस्य मातुः शकुन्तला नामधेयम्। 
ङ)  बालाय मयूरः रोचते।
२.  रिक्तस्थानानां पूर्तीः करणीया --
  क) अपत्यनिर्विशेषाणि सत्त्वानि विप्रकरोषि।
  ख)। पुत्रे स्निह्यति मे मनः।
   ग) यद्यस्याः पुत्रकं न मुञ्चसि।
   घ) अपरं क्रीडनकं ते दास्यामि।
ङ)। आकारसदृशं चेष्टितमेवास्य कथयति।

३. निम्नाङ्कितेषु सन्धिच्छेदो विधेयः -
     क) गत एवात्मनः -- गतः+ एव+ आत्मनः
    ख) औरस इव   -- औरसः+इव
    ग) दन्तांस्ते    -- दन्तान्+ ते
    घ) यद्यस्याः - यदि + अस्याः 
    ङ) शकुन्तलेत्यस्य - शकुन्तला + इति + अस्य 
    च) खल्वयम् - खलु + अयम्
    छ) बालेऽस्मिन् - बाले + अस्मिन् 
    ज) भीतोऽस्मि - भीतः + अस्मि
    झ) कस्यापि - कस्य + अपि 
    ञ) एकान्वयः - एकः + अन्वयः 
     ट) एवास्य - एव + अस्य
     ठ) तमस्योपहर - तम् + अस्य + उपहर
     ड) मैवम् - मा + एवम् 
     ढ) इत्यधरम् - इति + अधरम्
     ण) ममाम्वा - मम + अम्वा 
     त) अनेनैव - अनेन + एव 
४.  अधोलिखितेषु विग्रहं कृत्वा समासनाम लिखत -
 

सविस्मयम् - विस्मयेन सह , तम् - बहुव्रीहिः 
अबालसत्वः - बालस्य सत्त्वं  -  षष्ठी तत् पुरुषः 
                   बालसत्त्वं इव सत्त्वं यस्य सः बहुव्रीहिः 
                   न बालसत्त्वं - नञ् तत्पुरुषः 
 सिंहशिशुम् - सिंहस्य शिशुः, तम् - षष्ठी तत्पुरुषः 
अनपत्यता - अविद्यमानं अपत्यं यस्य सः - बहुव्रीहिः 
सस्मितम् - स्मितेन सह  -  बहुव्रीहिः 
मृत्तिकामयूरः - मृत्तिका मयूरः - कर्मधारयः 
बालमृगेन्द्रम्  - बालः मृगेन्द्रः,तम् - कर्मधारयः 
एकान्वयः -  एकः अन्वयः - कर्मधारयः 
आकारसदृशम् - आकारेण सदृशं - तृतीया तत्पुरुषः ऐ
बालस्पर्शं - बालस्य स्पर्शं - षष्ठी तत्पुरुषः 

५. अधोलिखितानां पदानां संस्कृतवाक्येषु प्रयोगः करणीयः -
     सबिस्मयम्  --कोणार्कमन्दिरस्य कलाकृतिं जना सबिस्मयं दर्शनम् कुर्वन्ति। 
कर्षति - कुठारः वृहत् काष्ठखण्डं रस्सिमाध्यमेन कर्षति।
स्निह्यति - पिता पुत्रं स्निह्यति।
केसरिणी - सखा रविवासरे केसरिणीं द्रष्टुम् नगरस्थं कृत्रिमकाननं गमिष्यति।
उटजे -  वनवासिनः उटजे तिष्ठन्ति।
व्यपदेशः - भगवतः श्रीरामचन्द्रस्य व्यपदेशः रघुः इत्यस्ति।
प्रेक्षस्व - सखि! तब कृते आनीयतां एतदुपहारम् प्रेक्षस्व। 
ममाम्वा - ममाम्वा स्वादिष्टं अवलेहं( pickle) निर्माति। 
६  प्रकृतिप्रत्ययपरिचयो देयः -
  सूचयित्वा -  सूच् + णिच्+ क्त्वाच्
प्रक्रीडितुम् - प्र + क्रीड् + तुमुन्
अवलोक्य - अव + लुक् + ल्यप्
अनुबध्यमानः - अनु + बध्+ शानच्
निष्क्रान्ता - निस् + क्रम् + क्त, स्त्रीयां टाप् 
उपलभ्यः - उप+ लभ् + ल्यप्
उपलालयन् - उप + लल् + शतृन् 








Tuesday, January 27, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 मयूखैर्जगतःस्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रविः।

स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम्।।

ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता है। इसलिए इस समय मीठा, ठंडा द्रव पदार्थ, चिकने खानपान हितकारी है। 

Saturday, January 10, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 वसन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृद्भाभिरीरितः।                                                                                              कायाग्निं बाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून्।।                                                                                          तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत्।                                                                           गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत्।।

अर्थात् --


वसन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से पिघल कर अर्थात् द्रव वन कर शरीर की अग्नि को कम् करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है। इसलिए कफ को निकालने के लिए वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन  क्रियाएँ करनी चाहिए। गुरु, अम्ल, स्निग्ध, मधुर वस्तुओंका सेवन और दिन में सोना त्याग करना चाहिए। 

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अनेकसंशयोच्छेदी परोक्षार्थस्य दर्शकम्। सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः।। अर्थात् --      अनेक सन्देहों को दूर करने वाला और छिप...