Wednesday, January 28, 2026

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 CHAPTER-4 VEERAH SARVADAMANAH




दुष्यन्तः - (शुभ शकुन का अभिनय करते हुए) 
शकुन्तलाप्राप्ति रूप अपनी अभिलाषा केलिये तो मैं आशा ही नहीं करता हूँ, है बाहु! तब तू व्यर्थ ही क्यों  फडक रहे हो, क्योंकि जिस कल्याणकारी वस्तु का पहले तिरस्कार कर दिया जाता है वह पुनः दुःख में ही परिवर्तित हो जाती है । अर्थात्‌ वह पुनः बडी कठिनाई से प्राप्त होती है ।
(नेपथ्य से)
 चञ्चलता मत करो। अपना स्वभाव ही कहाँ जाता है।
दुष्यन्तः -- (कान लगाकर) यह स्थान अविनय (उदण्डता) के योग्य नहीं है । तो फिर किसके द्वारा कौन मना किया जा रहा है? (आवाज की ओर देखकर)
(विस्मय के साथ)
 अरे, दो तपस्वि के द्वारा पीछा किया जाता हुआ असाधारण शक्तिसम्पन्न यह बालक कौन है ।
      जिसने अभी माताके आधे ही स्तन का दूध पी पाया है और (खींचने में) रगड से जिसके कन्धों पर के बाल इधर-उधर बिखर गये हैं, एसे सिंह शिशु को खेलने के लिये बलपूर्वक खींच रहा है॥२॥
बालः -   हे सिंह! अपना मुँह खोलो, मैं तुम्हारा दान्त गिनुंगा।
प्रथम तापसी--अरे नटखट! हमारी सन्तान के तुल्य (पले हुये) प्राणियों को तुम क्यों तंग कर रहा है। ओः! तुम्हारा क्रोध तो बढता जा रहा है। ऋषियोंने ठीक् ही तुम्हारा नाम सर्वदमन रखा है ।
राजा- मेरा हृदय इस बालक पर निजी पुत्रके समान क्यों स्नेह कर रहा है ? अवश्य ही पुत्र न होनेके कारण मेरे मन में इसके प्रति यह वात्सल्य प्रेम जाग रहा है।)
दूसरी तापसी-- यह सिंहनी अवश्य तुझ पर आक्रमण कर देगी यदि तुम इसके बच्चे को नहीं छोडता है।
बालं-- (मुस्कराकर) ओह, तब तो मैं बडा डर गया हूं ।
(उसे चिढने के लिये अपना अधरोष्ठ दिखाता है)
प्रथमा - वत्स! इस सिंह शावक को छोड दो, मैं तुम्हें दूसरा खिलौना दूँगी।
बालः - कहाँ है? वह खिलौना मुझे दो।( कहकर हाथ फैलाता है)
द्वितीया - सुव्रते! इसको कहने मात्र से रोकने के लिए समर्थ नहीं होगी। तुम जाओ। मेरे कुटीर में मिट्टी की मयूर है। वह इसको दे दो।
बालः -  तब तक मैं इस्से ही खेलूँगा।(तपस्वी को देख कर हँसता है)
तपस्वी - ठीक् है। यह मुझको नहीं मान रहा हैैै।(राजा को देखकर) महाशय! इसके द्वारा वाध्य किया जाता हुआ सिंहशिशु को मुक्त करो।
दुष्यन्तः - आकार के समान इसकी चेष्टा ही कहता है। (मन ही मन)
  किसी भी बंश की अंकुर स्वरूप इसके द्वारा स्पर्ष किए गए मेरे अंगप्रत्यङ्गों में एसा सुख अनुभूत हो रहा है; जिस भाग्यवान् की गोद से यह उत्पन्न हुआ है, उसके मन में किस प्रकार का आनन्द उत्पन्न न करता होगा। 
राजा - (बालक को प्यार करते हुए) इसका वंश क्या है?  
तपस्वी - पुरुवंश।
राजा -  (मन में ) कैसे इसका और मेरा एक ही वंश है?(प्रवेश कर के)
तपस्वी - वत्स! पक्षी की सुन्दरता को देखो।
बालः - मेरी माता कहाँ है? 
राजा  -  (मन में) क्या इसके माता के नाम शकुन्तला है? 
बालः -  यह मोर मुझे अच्छा लग रहा है। (खिलौना लेता है) 

                अभ्यासः

१.  संस्कृतभाषया उतरत --
  क)  कवेः कालिदासस्य "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" इति पुस्तकाद् गृहीतोऽयं पाठः।
  ख) बालः मातुः अर्धपीतस्तनं आमर्दक्लिष्टकेशरं च सिंहशिशुं कर्षति स्म। 
 ग)  तापसी बालाय क्रीडार्थं शकुन्तक्रीडनकं दत्तवती। 
घ)   क्रीडापरस्य बालस्य मातुः शकुन्तला नामधेयम्। 
ङ)  बालाय मयूरः रोचते।
२.  रिक्तस्थानानां पूर्तीः करणीया --
  क) अपत्यनिर्विशेषाणि सत्त्वानि विप्रकरोषि।
  ख)। पुत्रे स्निह्यति मे मनः।
   ग) यद्यस्याः पुत्रकं न मुञ्चसि।
   घ) अपरं क्रीडनकं ते दास्यामि।
ङ)। आकारसदृशं चेष्टितमेवास्य कथयति।

३. निम्नाङ्कितेषु सन्धिच्छेदो विधेयः -
     क) गत एवात्मनः -- गतः+ एव+ आत्मनः
    ख) औरस इव   -- औरसः+इव
    ग) दन्तांस्ते    -- दन्तान्+ ते
    घ) यद्यस्याः - यदि + अस्याः 
    ङ) शकुन्तलेत्यस्य - शकुन्तला + इति + अस्य 
    च) खल्वयम् - खलु + अयम्
    छ) बालेऽस्मिन् - बाले + अस्मिन् 
    ज) भीतोऽस्मि - भीतः + अस्मि
    झ) कस्यापि - कस्य + अपि 
    ञ) एकान्वयः - एकः + अन्वयः 
     ट) एवास्य - एव + अस्य
     ठ) तमस्योपहर - तम् + अस्य + उपहर
     ड) मैवम् - मा + एवम् 
     ढ) इत्यधरम् - इति + अधरम्
     ण) ममाम्वा - मम + अम्वा 
     त) अनेनैव - अनेन + एव 
४.  अधोलिखितेषु विग्रहं कृत्वा समासनाम लिखत -
 

सविस्मयम् - विस्मयेन सह , तम् - बहुव्रीहिः 
अबालसत्वः - बालस्य सत्त्वं  -  षष्ठी तत् पुरुषः 
                   बालसत्त्वं इव सत्त्वं यस्य सः बहुव्रीहिः 
                   न बालसत्त्वं - नञ् तत्पुरुषः 
 सिंहशिशुम् - सिंहस्य शिशुः, तम् - षष्ठी तत्पुरुषः 
अनपत्यता - अविद्यमानं अपत्यं यस्य सः - बहुव्रीहिः 
सस्मितम् - स्मितेन सह  -  बहुव्रीहिः 
मृत्तिकामयूरः - मृत्तिका मयूरः - कर्मधारयः 
बालमृगेन्द्रम्  - बालः मृगेन्द्रः,तम् - कर्मधारयः 
एकान्वयः -  एकः अन्वयः - कर्मधारयः 
आकारसदृशम् - आकारेण सदृशं - तृतीया तत्पुरुषः ऐ
बालस्पर्शं - बालस्य स्पर्शं - षष्ठी तत्पुरुषः 

५. अधोलिखितानां पदानां संस्कृतवाक्येषु प्रयोगः करणीयः -
     सबिस्मयम्  --कोणार्कमन्दिरस्य कलाकृतिं जना सबिस्मयं दर्शनम् कुर्वन्ति। 
कर्षति - कुठारः वृहत् काष्ठखण्डं रस्सिमाध्यमेन कर्षति।
स्निह्यति - पिता पुत्रं स्निह्यति।
केसरिणी - सखा रविवासरे केसरिणीं द्रष्टुम् नगरस्थं कृत्रिमकाननं गमिष्यति।
उटजे -  वनवासिनः उटजे तिष्ठन्ति।
व्यपदेशः - भगवतः श्रीरामचन्द्रस्य व्यपदेशः रघुः इत्यस्ति।
प्रेक्षस्व - सखि! तब कृते आनीयतां एतदुपहारम् प्रेक्षस्व। 
ममाम्वा - ममाम्वा स्वादिष्टं अवलेहं( pickle) निर्माति। 
६  प्रकृतिप्रत्ययपरिचयो देयः -
  सूचयित्वा -  सूच् + णिच्+ क्त्वाच्
प्रक्रीडितुम् - प्र + क्रीड् + तुमुन्
अवलोक्य - अव + लुक् + ल्यप्
अनुबध्यमानः - अनु + बध्+ शानच्
निष्क्रान्ता - निस् + क्रम् + क्त, स्त्रीयां टाप् 
उपलभ्यः - उप+ लभ् + ल्यप्
उपलालयन् - उप + लल् + शतृन् 








Tuesday, January 27, 2026

सुभाषितम्(Noble Thoughts)

 मयूखैर्जगतःस्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रविः।

स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम्।।

ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता है। इसलिए इस समय मीठा, ठंडा द्रव पदार्थ, चिकने खानपान हितकारी है। 

Saturday, January 10, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 वसन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृद्भाभिरीरितः।

कायाग्निं बाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून्।।

तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत्।

गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत्।।

अर्थात् --

वसन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से पिघल कर अर्थात् द्रव वन कर शरीर की अग्नि को कम् करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है।

 इसलिए कफ को निकालने के लिए वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन  क्रियाएँ करनी चाहिए। गुरु, अम्ल, स्निग्ध, मधुर वस्तुओंका सेवन और दिन में सोना त्याग करना चाहिए। 

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 उद्योगे नास्ति दारिद्रयं जपतो नास्ति पातकम्।  मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ।। अर्थात्,          उद्योगी /परिश्रमी का दारिद्रय नह...