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Saturday, May 9, 2026

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 CHAPTER -.8 VASTRA VIKRAYAH

वस्त्र विक्रयः

अष्टम पाठः

(तब अनुचर के साथ विदेशी गौरांग का प्रवेश होता है। वह राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र दिखाकर सेठ और जुलाहको डांटता है ।)
वैदेशिक गौरांगः - जुलाहा! राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र देखो। तुम विक्रेता नहीं हो।
तन्तुवायः - तब मैं इस वस्त्र का क्या करुंगा ?
वै गोराङ्गः - इस वस्त्र को मुझे देदो, मैं इसे वेचुंगा, यह पचास मुद्रा लो/ग्रहण करो।(पचास मुद्रा देता है)
तन्तुवायः - (आश्चर्य के साथ देखकर) क्या यह उचित है? इससे कैसे मेरे परिवार का पालन-पोषण होगा? छह महीने से कैसे भी रातदिन परिश्रम से यह वस्त्र वना है।
वै गोराङ्गः - यह मुद्रा लो, मैं कुछ नहीं जानता हूं। चूप रहो, जाओ। और दूसरा वस्त्र वना कर मेरे पास ही लाओ। तुम्हारे परिवार की रक्षा के लिए मुझसे कोई प्रतिज्ञा नहीं किया गया है। कैसे रक्षा होनी चाहिए यह तुम जानो अभी जाओ।
(वह मुद्रा नहीं लेता है इसलिए दूसरा जुलाहा वस्त्र बेचने के लिए प्रवेश कर वस्त्र खरीदने के लिए सेठ को दिखलाता है ।) 

तन्तुवायः -- सेठ्! वस्त्र लो। 
श्रेष्ठिन् - ( नेत्रपटल से सूचित कर) ये खरीदेगा। मैं खरीदने के लिए समर्थ नहीं हूँ। 
तन्तुवायः - कैसे?
श्रेष्ठी - इस के पास राजा के प्रमाणपत्र है ये ही खरीदेगा। दूसरा नहीं। 
वै. गौराङ्गः - इधर आओ।(जुलाहा को बुलाता है, प्रमाणपत्र दिखाता है, वस्त्र लेता है। ) ये चालीस मुद्रा लो। 
(मुद्रा देता है) 
तन्तुवायः - महाराज! क्या यह उचित है? क्या यह न्याय है? 
वै.गौराङ्गः - जाओ जाओ। मैं न्याय अथवा अन्याय जानता नहीं हूं। जो मुझसे निश्चय किया गया और दिया गया वही मूल्य ही है ।
(उभय उसके द्वारा दिए गए मूल्य को ग्रहण करते हैं।)

उभौ तन्तुवायौ - इसके बाद वस्त्र निर्माण नहीं करेंगे।(यह कहकर चले जाते हैं।)
वै.गौराङ्गः - (अनुचर को उद्देश्य कर) देखो। इनसे बहुत मुद्रा ले लेंगे। इन् वस्त्र द्वय का सौ न्दर्य अवर्णनीय है।यह वस्त्र अत्यधिक महीन है। देखो, इसके पांच छह परत ढका हुआ होने पर भी शरीर वस्त्र रहित प्रतीत होता है। आः कैसे इनके सामने हमारे देशीय वस्त्रों का विक्रय होगा, इस प्रकार हमारे देशीय व्यापार समाप्त हुआ। (फिर सोच कर)
श्लोकः -
इसी सूक्ष्म वस्त्र का निर्माण के रीति को समूल नष्ट करने में मैं समर्थ हूँ। इसलिए यहाँ उन वस्त्र वनानेवाले कारीगरों को पिटाई /अत्याचार रूप दण्ड देकर वस्त्र वनाने से मुक्त करूंगा/रोकुंगा। उस अधिक वाणिज्य योग्य अत्यधिक उन्नत कुशलता/ निपुणता नीचे जाना चाहिए। इस देश का उन्नति लोककथा माध्यम से ही समाहित होता है।
दौवारिकः - जय हो जय हो देव!
वै.गौराङ्गः - दौवारिक! शीघ्र ही तीन चार जुलाहों को लेकर आओ।
दौवारिकः - प्रभु जो आदेश करते हैं। (बाहर जा कर तीन जुलाहों को साथ लाकर प्रवेश करता है।)
वै. गौरांगः - (जुलाहों को उद्देश्य कर) तुम लोगों ने निर्माण किया हुआ वस्त्रों को मुझे देदो।
तन्तुवायाः - हम अनुचित मूल्य के कारण वस्त्र नहीं बनाते हैं।
वै.गौराङ्गः - ठीक् है सुन्दर वस्त्र बना कर मुझे दो, उचित मूल्य होगा। ये मुद्राएं लो। (पन्द्रह मुद्राएं देता है। वो नहीं लेते हैं। बलपूर्वक उनके वस्त्र में बांध कर हाथ में गर्दन पकड़ कर बाहर निकाल देता है।)
तन्तुवायाः - (द्वार पर रह कर) महाराज! हम सौ मूल्य के वस्त्र को पचास मुद्राओं से नहीं बनाएंगे।
वै.गौराङ्गः - (आक्षेप करते हुए) ये कौन शोर कर रहे हैं? (द्वार पर जाकर गुस्से से, उनको डण्डे से मारता है।) जाओ दूसरा सुन्दर वस्त्र बनाकर लाओ।(मुद्रा फेंक कर वे चले जाते हैं)
वै.गौराङ्गः - (अनुचर को लक्ष्य  कर) हे हे अन्य तीन चार जुलाहों को लाओ।(वह बाहर जा कर चार जुलाहों को लाकर )
महाराज! ये आगये।
वै.गौराङ्गः - (जुलाहों को लक्ष्य कर) बनाया गया रेशमी वस्त्रों को मुझे देदो।
तन्तुवायाः - हम वस्त्र नहीं बना रहे हैं।
वै.गौराङ्गः - यह झूठ है। तुम लोग वस्त्रों को बनाकर सेठ लोगों के पास बेचते हो।(सभी को कोड़े से मारने के लिए डांटता है।)
सर्वे - हम नहीं बना रहे हैं।(बंधे हुए जोडो हस्तोंवाले (वे सब) कांपते हैं।)
(सब निकल गये)



अभ्यासः

१. प्रश्नानामुत्तराणि संस्कृतभाषया देयानि -
क) अयं पाठः 'भारतविजयनाटकम्'इति ग्रन्थात् संकलितः पं. मथुराप्रसाद दीक्षितः च तस्य प्रणेता।
ख) वै.गौराङ्गः राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्रं संदर्श्य श्रेष्ठीनौ तन्तुवायञ्च भर्त्सयति।
ग) षड्भिर्मासैः कथमपि रात्रिन्दिवं परिश्रम्य तन्तुवायेन पटः निष्पादितः।
घ) यन्मया निश्चीयते दीयते च तदेव मूल्यं इति कथनं वै.गौराङ्गस्यास्ति।
ङ) तन्तुवायाः कोशेयपटस्य निर्माणमकुर्वन्।
च)। यूयं निर्मितान् पटान् मह्यं दत्त इति वै.गौराङ्गः तन्तुवायान् प्रति कथयति।
छ) गौराङ्गः तन्तुवायान् हठात् तेषां बसने निवध्य गलहस्तेन निष्कासयति।
ज) वैदेशिक गौरांगः तन्तुवायान् कशया ताड़यितुं भर्त्सयति।
२.
क) कथमेतेन मम कुटुम्बस्य भरणपोषणे भविष्यतः।
ख) अनिर्वचनीयं एतत् पटयोः सौन्दर्यम्।
ग) कथमेतत्समक्षमस्मद्देशीयानां पटानां विक्रयो भविष्यति।
घ) शोभनं पटं निर्माय मह्यं दत्त, योग्यं मूल्यं भविष्यति।
ङ) यूयं पटान् निर्माय श्रेष्ठिनां सविधे विक्रीणीध्वे। 
३.  सप्रसङ्गम् व्याख्यायन्ताम् -
   क) युष्मत्कुटुम्बरक्षायै  ...….......... जानीहि व्रजाधुना।
        वाक्यमेतत् महामहोपाध्याय पंडित मथुरा प्रसाद दीक्षितकृतं "भारतविजयनाटकम्" इति ग्रन्थात् संकलितो 'वस्त्रविक्रयः' इति पाठादानीतम्। अस्मिन् वाक्ये वै. गौराङ्गः तन्तुवायान् प्रति कथयति यत् युष्मत् परिवाररक्षार्थं अहं काऽपि प्रतिज्ञा न कृतवान्। तेषां रक्षा कथं भवेत् तत् त्वमेव ज्ञास्यसि। संप्रति गच्छ। 
भारतवर्षे वेदेशिक शासनसमये वस्त्रक्रयविक्रयश्च कथं अचलत् तेन च तन्तूवायानां कुटुम्बरक्षा कथं अभवत् तस्मिन् विषये अत्र वर्णितमस्ति। यदा तन्तुवायः वस्त्रविक्रयार्थं श्रेष्ठिनौ पटं दर्शयति स्म तौ अपि च तं एकशतमुद्रा दातुं निश्चितवन्तौ तदा वै.गौराङ्गः अनुचरेण सह तत्र संप्राप्तः। सः तान् राजमुद्राङ्कितप्रमाणपत्रं प्रदर्शयति येन तन्तुवायः स्वयं मूल्य निर्धारणं कृत्वा कुत्रचिदपि पटं विक्रेतुम् असमर्थः।  पटं निर्माय सः वै.गौराङ्गमेव समर्पयिष्यति। वै.गौराङ्गः तस्य पटं नीत्वा तं पञ्चाशत् मुद्राः अददात् । परन्तु तत् मूल्यं  अनुचितम् अथ च ताभिः मुद्राभिः तस्य परिवारस्य पालनपोषणञ्च कथं भविष्यति इति एतत् कारणात् सः अस्वीकृतवान्। अपि च षड्भिर्मासैः कथमपि रात्रिन्दिवं परिश्रम्य तत्पटः निष्पादितः।
परन्तु वै.गौराङ्गः तस्य वचः अश्रुत्वा बाध्यतापूर्वकं तं उपरोक्तवाक्यमकथयत् यत् इमा मुद्रा गृह्णीष्व। अहं किमपि न जानामि। मौनम् तिष्ठ,गच्छ। अपरं पटं निर्माय मत् समीप एव आनय। युष्मत् कुटुम्बरक्षायै अहं प्रतिज्ञा न कृतवान्। कथं रक्षा भवेत् तत् त्वम् जानीहि, अधुना गच्छ।

ख)  अनिर्वचनीयमेतत्पटयोः......................अङ्गम्। 
        एषा उक्तिः महामहोपाध्याय पं मथुरा प्रसाद दीक्षितेन कृतं "महाविजयनाटकम्" इति ग्रन्थात् संकलितो 'वस्त्रविक्रयः' इति पाठादानीता। अत्र वै. गौराङ्गः अनुचरमुद्दिश्य  वस्त्रस्य प्रशंसा करोति।
 ग)। न वयमयोग्यमूल्यत्वात् पटं निर्मामः।

४.  सन्धि विच्छेदं कुरुत -
      क)  विंशत्यधिकम्  - विंशति + अधिकम्
      ख)  मुद्राङ्कितम्    - मुद्रा।   + अङ्कितम् 
      ग)।  विधेरुन्मूलनम्।  -  विधेः  +। उन्मूलनम् 
      घ)।  मोचयिष्याम्यतः। -  मोचयिष्यामि + अतः 
      ङ)   सामर्षम्   -   स+।  आमर्षम् 
५.  श्लोकस्य स्वमातृभाषया अनुवादः -
    
      इसी सूक्ष्म वस्त्र का निर्माण के रीति को समूल नष्ट करने में मैं समर्थ हूँ। इसलिए यहाँ उन वस्त्र वनानेवाले कारीगरों को पिटाई /अत्याचार रूप दण्ड देकर  वस्त्र वनाने से मुक्त करूंगा/रोकुंगा। उस अधिक वाणिज्य योग्य अत्यधिक उन्नत कुशलता/ निपुणता नीचे जाना चाहिए। इस देश का उन्नति लोककथा माध्यम से ही समाहित होता है।
६.  प्रकृति प्रत्यय
 क)  विक्रेतुम्  -  वि + क्री + तुमुन् 
 ख)  अनिर्वचनीयम् -  नञ् + निर् + वच् + अनीयर्
 ग)।  विचिन्त्य।   वि + चिन्त् + ल्यप् 
 घ)   गत्वा   -  गम्  + क्त्वाच्
 ङ)। निवध्य -  नि + हन् + यत्
 च)  निर्माय।  -  निर् + मा + ल्यप् 
 छ)   अभिलक्ष्य-  अभि + लक्ष्+  ल्यप् 





Thursday, July 31, 2025

NCERT SANSKRIT BHASHWATI Claas 11 Chapter - 2 सूक्तिसुधा

                                     सूक्तिसुधा   


१.   जिस देश में आदर सम्मान नहीं और न ही आजीविका का कोई साधन है, जहाँ कोई बन्धु-बान्धव,रिश्तेदार भी नहीं तथा किसी प्रकार की विद्या और गुणों की प्राप्ति की संभावना नहीं, ऐसे देश को छोड़ देना चाहिए। 
२.  किसी रोग से पीड़ित होने पर, दुख आने पर, अकाल पड़ने पर , शत्रृ  की ओर से संकट आने पर, राजसभा में, श्मशान अथवा किसी की मृत्यु के समय जो व्यक्ति साथ नहीं छोड़ता, वास्तव में वही प्रकृत बन्धु है। 
३. बलवानोंको अधिक बोझ क्या है? और उद्योग करने वालों को क्या दूर है? विद्यावानोंको विदेश क्या है? और मीठे बोलने वालों का शत्रु कौन है? 
४.  सुवर्ण के साथ होने से जैसे कांच की मरकत मणि सदृश शोभा हो जाती है वैसे ही सज्जनों के संगति से मूर्ख भी चतुर  वन जाता है। 
५.  पुष्प के गुच्छे के समान उदार मनुष्य की दो तरह की प्रकृति होती है कि या तो सबके शिर पर रहे अथवा वन में नष्ट हो जाए। 
 ६.  पण्डित को परोपकार के लिए धन और प्राण छोड़ देने चाहिये। विनाश निश्चय है अतः उत्तम कार्य के लिए प्राणों का त्याग श्रेष्ठ है। 
७.     इस संसार में अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष को नींद, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता ये छः अवगुण छोड़ देनी चाहिए। 
८.  हे राजा! नित्य धन की प्राप्ति, आरोग्यता, प्रियतमा और मधुरभाषिणी स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र और धन उत्पन्न करने वाली विद्या - संसार का ये छः सुख हैं। 



                          अभ्यासः

१.  
  क)  अयं पाठः चाणक्यनीति-हितोपदेशाभ्यां ग्रन्थाभ्याम् संकलितः ।
   ख)  यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न बान्धवाः न च विद्यागमः तत्र वासः न कर्तव्यः।
   ग)   आतुरे व्यसने दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे राजद्वारे श्मशाने च बान्धवः तिष्ठति। 
   घ)    काचः काञ्चनस्य संसर्गात् मारकतीं द्युतिं धत्ते। 
   ङ)   प्राज्ञः परार्थे धनानि जीवितं च उत्सृजेत्। 
   च)   मूर्खः सत्सन्निधानेन प्रवीणतां याति। 
   छ)   पुरुषेण निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रताञ्च एते षड् दोषाः हातव्या।
    ज)   नित्यं अर्थागमः अरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च वश्यश्च पुत्रः अर्थकरी च विद्या - जीवलोकस्य एतानि षट् सुखानि सन्ति। 
२.
क)  यः आतुरे व्यसने दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे राजद्वारे श्मशाने च तिष्ठति सः बान्धवः।
ख)  जीवलोकस्य नित्यं अर्थागमः अरोगिता च प्रिया भार्या च प्रियवादिनी च वश्यश्च पुत्रः अर्थकरी च विद्या षट् सुखानि भवन्ति। 
ग)   मनस्विनः कुसुमस्तवकस्य इव द्वयी वृत्तिः भवति। 
घ)   षड्दोषाः भूतिमिच्छता पुरुषेण इह हातव्याः। 
ङ)   सन्निमितं वरं त्यागो विनाशे नियते सति। 

४.   

                                  

        विद्यागमः             विद्याप्राप्तिः
       व्यसने                  विपत्तौ
        सविद्यानाम्           विदुषां
        द्युतिम्                  शोभाम् 
        कुसुमस्तवकस्य      पुष्पगुच्छस्य
        मूर्ध्नि.                     शिरसि 
        भूतिम्                   कल्याणम् 
५.
              विग्रहपदानि                          समस्तपदानि

       1.   विद्यायाः आगमः                      विद्यागमः 
       2.    राज्ञः  द्वारे                            राज द्वारे
       3.    सतां सन्निधानेन                     सत्सन्निधानेन 
       4.    काञ्चनस्य संसर्गात्                काञ्चनसंसर्गात्
       5.    अर्थस्य आगमः                      अर्थागमः
       6.    जीविताय इदम्                       जीवितार्थम्
       7.       न  रोगिता                             अरोगिता 
       8.    अर्थं करोति या सा                  अर्थकरी 
६.

      1.        प्राप्ते  -  प्र + आप् + क्त, सप्तमी एकवचन 
      2.        प्रवीणताम्  -   प्रवीण + तल्, द्वितीया एकवचन 
      3.        वृत्तिः   -  वृत्  +  क्तिन् 
      4.         नियते  -  नी + यत् , विशेषण, सप्तमी एकवचने 
      5.         हातव्या  -   हा   +  तव्य, वहुवचने

Monday, June 30, 2025

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS -11 CHAPTER - 1 कुशल प्रशासनम्



          श्रीरामचन्द्र ने जटाजुट धारण किये हुए और पेड़ के छाल के बने वस्त्र पहने हुए भरतजी को हाथ जोड़कर(नमस्कार करते हुए) , पृथिवी पर पड़ा हुआ देखा । जैसे प्रलय कालीन दुर्दर्श सूर्य तेजहीन होकर पृथिवी पर पड़ा हो।।१।।
२.  बड़ी कठिनाई से विवर्ण मुख और अत्यन्त दुवले पतले अपने भाई भरत को पहचान , श्रीरामचंद्र जी ने उन्हें दोनों हाथों से पकड कर उठाया। 
३.  रघुवंशी श्रीरामचंद्र जी ने भरत के मस्तक को सूँघ कर, उन्हें आलिङ्गन कर और उनको गोदी में विठा कर, आदर पूर्वक यह बात पूछे।
४.  हे ताज! विश्वसनीय,धीर, नीतिशास्त्रज्ञ, लालच में न फँसने वाले और प्रामाणिक कुलोत्पन्न लोगों को तुमने अपना मंत्री वनाया या नहीं? 
५.  क्योंकि हे राघव! नीतिशास्त्रनिपुण एकान्त भेद की परामर्श करने योग्य मंत्रियों द्वारा रक्षित , गुप्त परामर्श ही, राजाओं के लिये विजय का मूल है। 
६.  तुम निद्रा के वश में तो नहीं रहते? यथा समय जाग तो जाते हो? तुम पिछली रात में अर्थ की प्राप्ति के उपाय तो विचार  करते हो? 
७. अकेले तो किसी विषय पर विचार नहीं करते अथवा वहुत से लोगों के बीच बैठकर तो सलाह नहीं करते? तुम्हारा विचार कार्य रूप में परिणत होने से पहले दूसरे राजाओे को विदित तो नहीं हो जाता है?
८.  अल्प प्रयास से सिद्ध होने वाले और बड़ा फल देने वाले कार्य को करने का निश्चय कर , शीघ्र ही उसको करना तुम आरम्भ कर देते हो कि नहीं? उसे पूरा करने में विलम्ब तो नहीं करते। 
९.  तुम हजार मुर्खों को त्याग कर एक पण्डित को आश्रय करते हो कि नहीं? क्योंकि यदि सङ्कट के समय एक भी पण्डित पास हो, तो बड़े ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। अर्थात् बड़ा लाभ होता है। 
१०.  किन्तु यदि एक भी बुद्धिमान, स्थिरबुद्धि, विचारकुशल और नीतिशास्त्र में अभ्यस्त मन्त्री हो, तो राजा अथवा राजकुमार को बड़ी लक्ष्मी प्राप्त करा देता है। 
११.  हे तात! तुम उत्तम जाति के नौकरों को उत्तम कार्य में, मध्यम जाति के नौकरों को मध्यम कार्य में और छोटी जाति के नौकरों को छोटे कामों में लगाते हो न? 
१२.  तुम उन मंत्रियों को जो ईमानदार हैं , जो कुलपरंपरा से  मंत्री होते आते हैं, जो शुद्ध हृदय और श्रेष्ठ स्वभाव के हैं, श्रेष्ठ कार्यों में नियुक्त करते हो न? 
१३.  हे भरत! तुमने किसी ऐसे पुरुष को, जो व्यवहार में चतुर, शत्रु को जितने वाला , सैनिक कार्यों में (व्यूहादि रचना में) चतुर, विपत्ति के समय धैर्य धारण करने वाला , स्वामी का विश्वासपात्र, सत्कुलोद्भव, स्वामिभक्त और कार्यकुशल हो, अपना सेनापति बनाया है कि नहीं? 
१४.  तुम सेना वालों को कार्यानुरूप भोजन और वेतन यथासमय देने में विलम्ब तो नहीं करते ।
१५.  क्योंकि भोजन और वेतन समय पर न मिलने से , नौकर लोग कुपित होते हैं और मलिक की निन्दा करते हैं । नौकरों का ऐसा करना , एक बड़े भारी अनर्थ की वात है ।


                                                                      अभ्यासः

१.   संस्कृतेन उत्तरं देयम्   -
  क)  अयं पाठः आदिकाव्याद् वाल्मीकिरामायणग्रन्थात् सङ्कलितः।
ख)   जटिलः चीरवसनः भुवि पतितः भरतः आसीत् ।
ग)   रामः भरतं पाणिना परिजग्राह।
घ)   भरतं रामो अपृच्छत्।
ङ)   मन्त्रो राज्ञां विजयमूलं भवति।
च)   उपधातीतः पितृपैतामहकुलात् निर्वाहितः शुचिः श्रेष्ठात्श्रेष्ठेषु च अमात्यः राज्ञः कृते क्षेमकरः भवेत्।
छ)   धृष्टश्च शूरश्च धृतिमान् मतिमाञ्छुचिः कुलीनः अनुरक्तः दक्षश्च गुणयुक्तः सेनापतिः भवेत्।
ज)   बलेभ्यः यथाकालं यथोचितं भक्तवेतनञ्च दातव्यम्।
झ)   मन्त्रः राज्ञां विजयमूलं भवति यत्  नैकः मन्त्रितः न च बहुभिः सह विमर्षितः।
ञ)   मेधावी अमात्यः राजानं महतीं श्रियम् प्रापयेत्। 
२.  रिक्तस्थानपूर्तिः क्रियताम्  -
क)   रामः ददर्श दुर्दर्शं युगान्ते भास्करं यथा ।
ख)   अङ्के भरतं आरोप्य रामः  सादरं पर्यपृच्छत ।
ग)    कच्चित् काले अवबुध्यसे?
घ)    पण्डितः हि अर्थकृच्छ्रेषु महत् निःश्रेयसं कुर्यात्। 
ङ)    श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठेषु कच्चित् एवं कर्मसु नियोजयसि। 
५.  अधोलिखितपदानां उचितमर्थं कोष्ठकात् चित्वा लिखत -
    क)    दुर्दर्शनम्    -   कठिनाई से देखने योग्य 
    ख)    परिष्वज्य   -   आलिंगन करके 
     ग)    आघ्राय      -    सूंघकर 
     घ)     मुर्ध्नि       -     सिर में 
     ङ)    निःश्रेयसं   -     कल्याण को
     च)    विचक्षणः   -     निपुण 
     छ)    बलस्य       -     सेना का
६.   विपरीतार्थमेलनं क्रियताम् -
      क)   एकः     -       बहवः
      ख)   क्षिप्रं     -      शनैः
       ग)   पण्डितः   -    मुर्खः
       घ)   महत्     -      लघु 
७.    सन्धिविच्छेदः  क्रियताम्  -
       क)   कुलीनश्च   -   कुलीनः  +   च
       ख)   भृत्याश्च    -   भृत्याः   +   च
        ग)    धृष्टश्च     -    धृष्टः      +    च
       घ)     अनुरक्तश्च   -    अनुरक्तः   +    च
      ङ)     शूरश्च      -    शूरः      +    च
८.   अधोलिखितेषु शब्देषु प्रकृतिं प्रत्ययं च पृथक् कुरुत -
       क) पतितम्  -   पत्   +   क्त, तम् 
       ख)  आघ्राय   -   आ  +  घ्रा  +  ल्यप् 
       ग)   मन्त्रिणः   -    मन्त्र +  इन्, प्रथमा विभक्ति बहुवचने
       घ)    पण्डिताः   -  पण्डा  +  इतच्,  प्रथमा विभक्ति बहुवचने
       ङ)   मेधावी    -   मेधा   +   विनि  +  स्त्री : ईप्
       च)   दातव्यम्   -   दा  +   तव्य, तम्
       छ)   स्मृतः  -    स्मृ  +  क्त
    

                                                 समाप्तम् 

Wednesday, April 16, 2025

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS -11 CHAPTER -7 संगीतानुरागी सुब्बण्णः

             

               

              सुब्बण्ण का संगीत में जो स्वाभाविकी इच्छा थी, वो एकदिन  राजभवन में होनेवाली  संगति से और अधिक दृढ हो गई। एक दिन  पुराणिकशास्त्री पुत्र के साथ राजभवन में आ कर वहाँ अन्तःपुर की स्त्रीयों के सम्मुख पुराण की कथा आरम्भ करते हुए पहले अपने पुत्र से शुक्लाम्वरधर आदि श्लोकों को गवाया। यह देखकर वहाँ उपस्थित सभी जन प्रसन्न हुए।   कुछ समय पश्चात् वहाँ आये हुए राजा पास  वैठ कर पुराण सुनते हैं। पिता के समीप बैठा हुआ सुब्बण्ण पुराणप्रवचन आग्रह पूर्वक सुनते हुए ही मध्य में महाराजा को भी आश्चर्य सहित देख रहा था। महाराजा के सुन्दर मुख, मुख पर विशाल तिलक धारण किए हुए, उसमे भी विशाल गाल का शोभा बढ़ाने वाला दाढ़ी और मूँछ आदि सब कुछ उसका विस्मय का कारण था। राजा भी उस बालक को दो तीन बार  देख कर यह बालक चतुर है - ऐसा  सोचा। और पुराण समाप्त होने पर है शास्त्री! यह बालक क्या आपका पुत्र है? ऐसा पूछा। हाँ, महाप्रभु, ऐसा  शास्त्री ने उत्तर दिया।  फिर से विस्मयपूर्वक राजा बालक को सम्बोधित करके है वत्स! क्या आप भी पिता के जैसे पुरणप्रवचन करोगे? ऐसे पूछा। तब वह बालक - मैं पुराण प्रवचन नहीं करता हूँ। संगीत गाता हूँ यह कहा। तब राजा वोले - निश्चय । तो फिर तब तक (हम)  एक संगीत सुनते हैं  ऐसा कहा। तत्पश्चात ही सुब्बण्ण श्रीराघव दशरथात्मज इत्यादि श्लोकों को संगीत में गा कर सुनाया। उसके अन्त में वो  पुनः कस्तूरीतिलक इत्यादि श्लोक भी मुझे स्मरण है ऐसा कहा। 

          महाराजा अत्यधिक सन्तुष्ट हुए। इस प्रकार आनन्दित होकर राजा पारितोषिक के रूप में बालक को पान सहित उत्तरीय वस्त्र देकर, हे बालक! तुम बुद्धिमान हो। उत्तम रूप से संगीत शिख कर अच्छी तरह गाने के लिए आप अभ्यास करो। इसे भी अधिक पारितोषिक हम आपको देंगे  - ऐसा बालक को कहकर और पुनः शास्त्री जी को उद्देश्य कर, हे शास्त्री जी! पुत्र चतुर है , उसका  शिक्षा अच्छे से कीजीए, प्रायः महाकुशल होंगे ऐसा कहा। इसके बाद शास्त्री और पुत्र अपने घर को लौट गए। 


                                 अभ्यासः

१. संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् -

क)  सुब्बण्णस्य सहजाभिलाषः संगीते आसीत्।
ख)  पुराणिकशास्त्री पुत्रेण सह राजभवनम् अगच्छत्। 
ग)  पुराणिकशास्त्री स्वपुत्रेण शुक्लाम्बरधरमित्यादि श्लोकं गापयामास। 
घ)  पुराणप्रवचनं श्रृण्वन् सुब्बण्णः महाराजं सविस्मयं पश्यति स्म। 
ङ)  सुब्बण्णः पितृवत् पुराणप्रवचनं करिष्यति वा न इति महाराजस्य विस्मयकारणम् आसीत्।
च)  राजा बालं द्वित्रिवारम् अपश्यत्।
छ) राजा बालं अपृच्छदिदं यत् " अये वत्स! किं भवानपि पितृवत् पुराणप्रवचनं करिष्यति? '"
ज) स बालः - 'अहं पुराणप्रवचनं न करोमि। सङ्गीतं गायामिति राजानं व्याहरत्।
झ)  परितुष्टः राजा बालाय सताम्बूलमुत्तरीयवस्त्रं अयच्छत्। 
ञ) राज्ञः कथनानन्तरं शास्त्री तत्पुत्रः च ग्रामं प्रति अगच्छताम्। 

२.   
क)   सुब्बण्णस्य सङ्गीतेऽभिलाषः राजभवने संवृत्तया कया दृढीवभूव?
ख)   तच्छ्रुत्वा कुत्रत्याः सर्वे पर्यनन्दन्? 
ग)    समागतो कः पुराणम् आकर्णयति स्म? 
घ)   कः पितुः पार्श्वे महाराजं सविस्मयं पश्यति स्म?
ङ)   कस्य मुखे तिलकालङ्कारः आसीत्?
च)   राजा कस्मै सताम्बूलम् उत्तरीयवस्त्रम् अयच्छत्? 

३.  
        विशेषण                  विशेष्य 
        संवृत्तया                 सङ्गत्या 
        समागतः                  राजा
        सविस्मयं               महाराजम् 
        सुन्दरम्                    मुखम्
        विशालस्य                गण्डस्थलस्य
        कण्ठस्थः                 श्लोकः 
        शोभावहम्                श्मश्रुकूर्चम्
 ५.  
    क)   एकस्मिन् दिने पुराणिक शास्त्री पुत्रेण साकं राजभवनम् अगच्छत्। 
    ख)   पितुः पार्श्वे उपविष्टः सुब्बण्णः महाराजम् सविस्मयं पश्यति स्म। 
    ग)   राजा बालं संबोध्य पर्यपृच्छत्। 
    घ)   त्वं मेधावी असि। 
    ङ)   पारितोषिकं भवते वयं दास्यामः। 
६.
   १.  साकम्  -   सह -       भ्रात्रा साकं अहं वीपणीं गच्छामि। 
   २.   पार्श्वे -    समीपे  -   मम पार्श्वे माता उपविश्य दूरदर्शनं पश्यति। 
   ३.  तत्र -       तस्मिन्  -     तत्र उड्डीयमानान् खगान् दृष्टवा शिशुः अत्र उत्पतितुं प्रयासं करोति।
   ४.   सुष्ठु -    उत्तमरूपेण -   रघुवीरः सुष्ठु मन्त्रोच्चारणं कृत्वा प्रतिस्पर्धायां प्रथमं पुरस्कारंं प्राप्तवान्।
   ५.  सम्यक् -      कस्यचिदपि कार्यस्य प्रारम्भे तद् कार्यविषये सम्यग्ज्ञानं नीत्वा एव प्रारब्धं कुर्यात्। 
   ६.  पुनः -          ओडिशा प्रदेशस्य कोणार्क क्षेत्रस्य मनोरम चित्रकला मां  पुनः भ्रमणार्थं आकर्षयति। 


७.  विलोमपद 
    
   अत्रत्याः -  तत्रत्याः
   परागतः  -   समागतः
    दूरे   -   पार्श्वे
    उदतरत्   -   पर्यपृच्छत् 
    प्रारब्धे -   अन्ते
    कदा   -   तदा 
    मुर्खः  -   चतुरः 
    असन्तोषः  -   सन्तोषः
    अल्पम् -  अधिकम् 


सुभाषितम्( THOUGHT OF THE DAY)

दुर्लभान्यपि कार्याणि सिध्यन्ति प्रोद्यमेन ही।  शिलापि तनुतां याति प्रपातेनार्णसो मुहुः।।  अर्थात्,    कठिन से कठिनतर कार्य भी उद्यम/प्रयास ...