Monday, December 15, 2025

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 ऋतुचर्या तृतीयःपाठः

 


हेमन्तः 

        दूध,दही,मावा आदि एवं गन्ने के रस से वनी खीर, राब, शर्करा आदि से वनी वस्तुएँ, वसा, तैल और नये चावल खाने चाहिये। हेमन्त काल में स्नान आदि में गरम पानी का व्यवहार करने वाले की आयु कम् नहीं होती।


लघु गुणवाले एवं वायुप्रकोपक आहार विहार हेमन्त ऋतु में छोड़ देनी चाहिए। एवं सामने की वायु, थोड़ा खाना और जौ के पानी से निर्मित पदार्थ को छोड़ देना चाहिए। 


शिशिरः


           हेमन्त और शिशिर ऋतुएँ प्रायः समान हैं। परन्तु शिशिर काल में हेमन्त से थोड़ा विशेषता यह है कि शिशिर का आदान काल होने से वायु रुखा होता है एवं बादल,वायु और वरसात अधिक होने से इस ऋतु में शीत अधिक होता है। 


इसलिए शिशिर ऋतु में हेमन्त की सम्पूर्ण बिधि पालन करनी चाहिए। परन्तु शिशिर में हेमन्त से अधिक गरम और वायुरहित घरों में रहें। 


शिशिर काल में कड़ुवे, तिक्त , कसैले, वायुकारक और लघु तथा ठण्डे खानपान को छोड़ दे। 


वसन्त ऋतु  -

वसन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से पिघल कर अर्थात् द्रव वन कर शरीर की अग्नि को कम् करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है।

 इसलिए कफ को निकालने के लिए वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन आदि क्रियाएँ करनी चाहिए। 

ग्रीष्म ऋतु


ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता है। इसलिए इस समय मीठा, ठंडा द्रव पदार्थ, चिकने खानपान हितकारी है। 


घी और दूध के साथ चावल खाने से ग्रीष्म ऋतु में कष्ट नहीं होता। नमकीन, खट्टे, कडुवे और गरम रस पदार्थ तथा व्यायाम इस ऋतु में छोड़ देना चाहिए। 


वर्षा ऋतु 


ग्रीष्म ऋतु में   सूर्य की प्रचण्ड  गर्मी से भूमि के तप जाने से , वर्षा में वरसात पड़ने से पानी के स्पर्ष से भूमि से गरम भाप निकलने से तीनों दोष कुपित हो जाते हैं। इसी प्रकार वादलों के वरसने से वात, कफ कुपित होते हैं, जल अम्लपाक होने से पित्त कुपित होता है। वर्षाऋतु में अग्नि-बल के क्षीण होने से वात, पित्त, कफ तीनों दोष कुपित होते हैं। 

वरसात के दिनों में जिस दिन वायु और वरसात जोर का पड़ रहा हो और सर्दी बहुत हो ,उस दिन वायु को शांत करने के लिये अम्ल, लवण रस तथा स्नेह घी जिस अन्न में स्पष्ट दिखता हो उसे बिशेष करके खाना चाहिये। 


शरद् ऋतु


वर्षा ऋतु में काल स्वभाव में सञ्चित हुआ पित्त शरद् काल में बादलों के हट जाने से  सूर्य की किरणों के ताप से सहसा कुपित होता है। 

इसलिए इस ऋतु में मधुर, लघु, शीत और तिक्त आदि पित्तशामक खानपान परिमाण में खाना चाहिये ।

शरत्काल में रात्रि के प्रथम प्रहर में चन्द्रमा की किरणों का सेवन करना तथा शरत्कालीन मालाएँ और निर्मल वस्त्र प्रशंसनीय है। 


अभ्यासः

१.

    क) अयं पाठः 'चरकसंहिता'इति ग्रन्थात् संकलितः महर्षि चरकश्च तस्य प्रणेता।

ख)  षड्ऋतवः सन्ति ‌। ग्रीष्मश्च वर्षाशरद्हेमन्तशिशिरो बसन्तश्च एतानि भवन्ति तेषां नामानि।

ग)  कटुतिक्तकषायाणि वातलानि लघूनि शीतलानि च अन्नपानानि शिशिरे वर्जनीयम्।

च) वसन्ते कायाग्निं निचितः श्लेष्मा बाथते।

ङ) ग्रीष्मे  स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धञ्च अन्नपानं हितम् भवति।

च)  वर्षा ऋतौ पवनादयः कुप्यन्ति।

छ) शरदृतौ पित्तप्रशमनाय मधुरं लघु शीतं सतिक्तकञ्च अन्नपानं मात्रया सेव्यमस्ति।

ज) हिमागमे वातलानि लघूनि च अन्नपानानि वर्जयेत्।

झ) शिशिरे निवातं अधिकमुष्णं गृहम् आश्रयेत्।

ञ) वसन्ते वमनादीनि कर्माणि कारयेत्।

ट) ग्रीष्मे व्यायामं वर्जयेत्।

ठ) शरत्काले प्रदोषे इन्दुरश्मयः प्रशस्यन्ते।

क) हिमागमे वातलानि लघूनि च अन्नपानानि वर्जयेत्।

ख) शिशिरे निवातं अधिकमुष्णं च गृहमाश्रयेत्।

ग) वसन्ते दिवास्वप्नं वर्जयेत्।

घ) ग्रीष्मे घृतं पयः सशाल्यन्नं भजन् नरः न सीदति।

ङ) शरत्काले विमलानि वासांसि प्रशस्यन्ते।

५.

           विग्रह पदानि         समस्तपदानि 

क)    अन्नानि च पानानि च  -   अन्नपानानि 

ख) हेमन्तः च शिशिरः च  - हेमन्तशिशिरौ 

ग)  हिमस्य आगमे -     हिमागमे

घ) कायस्य अग्निम् - कायाग्निम्

ङ) अर्कस्य रश्मिभिः  - अर्करश्मिभिः

६. अर्थमेलनं क्रियताम् -

               पदानि            अर्थाः

क)      श्लेष्मा                कफ 

ख)।     रौक्षम्                    रूखापन

ग)        निवातम्              हवारहित

घ)         निचितः                 बढ़ा हुआ 

ङ)।       पवनः                  वात

च)।        गुरुः                    भारी

छ)         लघुः                   हल्का 

ज)         वासांसि               वस्त्र 

७.

           पदानि            विपरीतार्थकपदानि

           उष्णम्                शीतम् 

           सीदति             प्रसीदति

           तप्तानाम्            शीतानाम्

           गुरु                    लघु 

           अल्पम्              अधिकम् 

८.

        हेमन्त+ठक् = हेमन्तः

       स्निह् + क्त  = स्निग्ध 

       भुज्  + तव्यत् =  भोक्तव्यम् 

        सेव् + यत्   =   सेव्यम्

       शरद् + अण्  =  शरदः

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