Saturday, June 12, 2021

NCERT SANSKRIT SHEMUSHI CLASS-10 CHAPTER - 4 JANANEE TULYAVATSALA

                                          

         
           कोई एक किसान दो बैलों से खेत की जुताई करता था। उन दोनों बैल में से एक शरीर से दुर्वल था और तीव्रगति से नहीं चल पा रहा था। इसलिए किसान उस दुवले बैल को कष्ट दे कर धकेलते हुए ले रहा था। वो बैल हल ढोकर जाने में असमर्थ होकर खेत में गिर गया। क्रुद्ध किसान उसको उठाने के लिए बहुत कोशिश किया । फिर भी बैल उठा नहीं।
खेत में गिरा हुआ अपने बेटे को दुखी देखकर सभी गायों की माता सुरभि के दोनों आँखों से आँसू आने लगे। सुरभी की एसी अवस्था देखकर देवताओं के राजा उनको पूछा- " हे कल्याणकारीणि! ऐसे क्यों रो रही हैं ? कहें ।
और वह,
श्लोकः - हे इन्द्रदेव! भूमि में कोई गिरा हुआ आपको दिखाई नहीं दिया। लेकिन मैं पुत्र को याद कर रही हूँ, 
हे इन्द्र! इसलिए रो रही हूँ
"हे इन्द्र! पुत्र का दुख देख कर मैं रो रही हूँ। वो दुखी यह जानकर भी किसान उसको बहुत कष्ट देता है। वो कठिनाई से भार उठाता है। दूसरों के समान जुए को ढोने के लिए वो समर्थ नहीं है। यह आप देखे नहीं क्या?" ऐसा जवाब दिया।
" हे कल्याणकारीणि! निश्चय ही। हजार से अधिक पुत्र रहते हुए आपका इस पर ही इस प्रकार स्नेहभाव किसलिए?" ऐसा इन्द्र के द्वारा पूछेे जाने से सुरभि उत्तर दिया -
श्लोकः - यदि मेरे हजार बेटे हैं , सबके प्रति मेरा प्रेमभाव समान है। परन्तु हे इन्द्र! दुखी पुत्र पर मेरी कृपा अधिक होता है॥
" मेरे बहुत बेटे हैं यह सत्य है। तथापि इस पुत्र पर मैं विशेष कर कष्ट को अनुभव कर रही हूँ। क्योंकि यह दूसरे बेटों से दुर्बल है। सभी पुत्रों पर जननी समान रूप से प्यार करने वाली होती है। तथापि दुर्बल पुत्र पर माता का अत्यधिक कृपा अवश्यम्भावी है"। सुरभि के वाक्यों को सुनकर अत्यधिक आश्चर्य हुए इन्द्र का भी हृदय द्रवीभूत होगया। और वो सुरभि को इस प्रकार सान्त्वना दी - " जाओ बेटी! सवकुछ शुभ होगा।"
शीघ्र ही तीव्र हवा से और बादलों के गर्जन के साथ वर्षा होने लगा। देखते ही चारोंतरफ जलसंकट आगया। किसान खुसि से जोतने के काम छोड कर दोनों बैलों को ले कर घर चला गया।
श्लोकः - जननी सभी सन्तानों पर समस्नेहयुक्ता है। परन्तु दुखी पुत्र पर उस माता का हृदय कृपा से भर जाता है॥

अभ्यासः

१. अधोलिखितानां प्रश्नानामुत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-
क) कृषकः किं करोति स्म?
उत्तरम्- कृषकः बलीवर्दाभ्याम् क्षेत्रकर्षणं करोति स्म।
ख) माता सुरभिः किमर्थं अश्रूणि मुञ्चति स्म?
उत्तरम्- भूमौ पतिते स्वपुत्रं दृष्ट्वा माता सुरभिः अश्रूणि मुञ्चति स्म।
ग) सुरभिः इन्द्रस्य प्रश्नस्य किमुत्तरं ददाति?
उत्तरम्- सुरभिः इन्द्रस्य प्रश्नस्य एतदुत्तरं ददाति यत् " भो वासव! पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहं रोदिमि" ।
घ) मातुः अधिका कृपा कस्मिन् भवति?
उत्तरम्- मातुः अधिका कृपा दीनेपुत्रे भवति।
ङ) इन्द्रः दुर्बलवृषभस्य कष्टानि अपाकर्तुम् किं कृतवान्?
उत्तरम्- इन्द्रः दुर्बलवृषभस्य कष्टानि अपाकर्तुम् वृष्टिः कृतवान्।
च) जननी कीदृशी भवति?
उत्तरम्- जननी तुल्यवत्सला भवति।
छ) पाठेऽस्मिन् कयोः संवादः विद्यते?
उत्तरम्- पाठेऽस्मिन् इन्द्रसुरभ्योः संवादः विद्यते।
२. क" स्तम्भे दत्तानां पदानां मेलनं "ख" स्तम्भे दत्तैः समानार्थकपदैः कुरुत-
   क स्तम्भ      ख स्तम्भ
क) कृच्छ्रेण      ६) काठिन्येन
ख) चक्षुभ्याम्    ३) नेत्राभ्याम्
ग)  जवेन       ५) द्रुतगत्या
घ)  इन्द्रः       २)  वासवः
ङ)  पुत्राः        ७)  सुताः
च) शीघ्रम        ४) अचिरम्
छ) बलीवर्दः      १)  वृषभः
३. स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
क) सः कृच्छ्रेण भारम् उद्वहति।
प्रश्नम्- सः केन कथं वा भारम् उद्वहति?
ख) सुराधिपः ताम् अपृच्छत्।
प्रश्नम्- कः ताम् अपृच्छत्?
ग) अयम् अन्येभ्यो दुर्बलः।
प्रश्नम्- अयम् केभ्यो दुर्बलः?
घ) धेनूनाम् माता सुरभिः आसीत्।
प्रश्नम्- कासाम् माता सुरभिः आसीत्?
ङ) सहस्राधिकेषु पुत्रेषु सत्स्वपि सा दुःखी आसीत्।
प्रश्नम्- केषु पुत्रेषु सत्स्वपि सा दुःखी आसीत्?
४. रेखाङ्कितपदे यथास्थानं सन्धिं विच्छेदं वा कुरुत-
क) कृषकः क्षेत्रकर्षणं कुर्वन्+आसीत्।  -  कुुर्वन्नासीत्
ख)तयोरेकः वृषभः दुर्बलः आसीत्।    -  तयोः + एकः
ग) तथापि वृषः न+उत्थितः।        -   नोत्थितः
घ) सत्स्वपि बहुषु पुत्रेषु अस्मिन् वात्सल्यं कथं?   -  सत्सु + अपि
ङ) तथा+अपि+अहम्+एतस्मिन् स्नेहम् अनुभवामि।  -  तथाप्यहमेतस्मिन्
च) मे बहूनि+अपत्यानि सन्ति।  -  बहून्यपत्यानि
छ) सर्वत्र जलोपप्लवः संजातः।  -  जल + उपप्लवः
५. अधोलिखितेषु वाक्येेषु रेखाङ्कितसर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्-
क) सा च अवदत् भो वासव! अहं भृशं दुःखिता अस्मि। - सुरभ्यै
ख) पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहं रोदिमि। - सुरभ्यै
ग) सः दीनः इति जानन् अपि कृषकः तं पीडयति। - वृषभाय
घ) मे बहूनि अपत्यानि सन्ति। - सुरभ्यै
ङ) सः च ताम् एवम् असान्त्वयत्। - इन्द्राय
च) सहस्रेषु पुत्रेषु सत्स्वपि तव अस्मिन प्रीतिः अस्ति। - सुरभ्यै

६. उदाहरणमनुसृत्य पाठात् चित्वा प्रकृति प्रत्यय विभागं कुरुत-
यथा- सुरभिवचनं श्रुत्वा इन्द्रः विस्मितः। (श्रु+क्त्वा)
क) बलीवर्दाभ्यां क्षेत्रकर्षणं कुर्वन्नासीत्। ( कृ+शतृ+आसीत्)
ख) स्वपुत्रं दृष्ट्वा सर्वधेनूनां मातुः नेत्राभ्यां अश्रूणि आविरासन्। (दृश्+क्त्वा)
ग) सः दीनःइति जानन् अपि पीडयति। (ज्ञा+शतृ)
घ) धुरं वोढुं सः न शक्नोति। (वहः+तुमुन्)
ङ) विशिष्य आत्मवेदनामनुभवामि। (वि+शिष्+ल्यप्)
च) वृषभौ नीत्वा गृहमगात्। (नी+क्त्वा)

७. "क" स्तम्भेविशेषणपदं लिखितम्, "ख" स्तम्भे पुनः विशेष्यपदम्। तयोः मेलनं कुरुत-
         क स्तम्भ    -          ख स्तम्भ
क)     कश्चित्      -       ७)   कृषकः
ख)     दुर्बलम्       -       १)   वृषभम्
ग)       क्रुद्धः        -        ३)  कृषीवलः
घ)   सहस्राधिकेषु   -      ६)   पुत्रेषु
ङ)    अभ्यधिका     -      २)   कृपा
च)     विस्मितः     -       ४)  आखण्डलः
छ) तुल्यवत्सला    -       ५)   जननी

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