Wednesday, December 17, 2025

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रितयं हितम्।

कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः।।

अर्थात्,

माता, पिता और मित्र ये तीनों स्वभाव से ही हितकारी होते हैं और अन्य लोग प्रयोजनवश या किसी कारण - विशेष से हितकारी होते हैं।

Meaning -

Mother, father and friend these three are beneficial by nature and others are beneficial to any purpose or for some reason .

Tuesday, December 16, 2025

विपरीतार्थक पदानि(Opposite Words)

 पदानि            विपरीतार्थकपदानि 

अपधर्मः           परधर्मः 

अनुलोमः           प्रतिलोमः 

अनुरागः             अपरागः 

पुरतः                 पृष्ठतः 

स्वकीयम्           परकीयम् 

भीतिः              साहसः 

अनुरक्तिः          विरक्तिः 

गमनम्          आगमनम् 

आरोहणम्        अवरोहणम् 

उष्णम्            शीतम् 

सीदति            प्रसीदति 

तप्तानाम्         शीतानाम् 

गुरु                  लघु 

अल्पम्              अधिकम् 

Monday, December 15, 2025

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 ऋतुचर्या तृतीयःपाठः

 


हेमन्तः 

        दूध,दही,मावा आदि एवं गन्ने के रस से वनी खीर, राब, शर्करा आदि से वनी वस्तुएँ, वसा, तैल और नये चावल खाने चाहिये। हेमन्त काल में स्नान आदि में गरम पानी का व्यवहार करने वाले की आयु कम् नहीं होती।


लघु गुणवाले एवं वायुप्रकोपक आहार विहार हेमन्त ऋतु में छोड़ देनी चाहिए। एवं सामने की वायु, थोड़ा खाना और जौ के पानी से निर्मित पदार्थ को छोड़ देना चाहिए। 


शिशिरः


           हेमन्त और शिशिर ऋतुएँ प्रायः समान हैं। परन्तु शिशिर काल में हेमन्त से थोड़ा विशेषता यह है कि शिशिर का आदान काल होने से वायु रुखा होता है एवं बादल,वायु और वरसात अधिक होने से इस ऋतु में शीत अधिक होता है। 


इसलिए शिशिर ऋतु में हेमन्त की सम्पूर्ण बिधि पालन करनी चाहिए। परन्तु शिशिर में हेमन्त से अधिक गरम और वायुरहित घरों में रहें। 


शिशिर काल में कड़ुवे, तिक्त , कसैले, वायुकारक और लघु तथा ठण्डे खानपान को छोड़ दे। 


वसन्त ऋतु  -

वसन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से पिघल कर अर्थात् द्रव वन कर शरीर की अग्नि को कम् करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है।

 इसलिए कफ को निकालने के लिए वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन आदि क्रियाएँ करनी चाहिए। 

ग्रीष्म ऋतु


ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता है। इसलिए इस समय मीठा, ठंडा द्रव पदार्थ, चिकने खानपान हितकारी है। 


घी और दूध के साथ चावल खाने से ग्रीष्म ऋतु में कष्ट नहीं होता। नमकीन, खट्टे, कडुवे और गरम रस पदार्थ तथा व्यायाम इस ऋतु में छोड़ देना चाहिए। 


वर्षा ऋतु 


ग्रीष्म ऋतु में   सूर्य की प्रचण्ड  गर्मी से भूमि के तप जाने से , वर्षा में वरसात पड़ने से पानी के स्पर्ष से भूमि से गरम भाप निकलने से तीनों दोष कुपित हो जाते हैं। इसी प्रकार वादलों के वरसने से वात, कफ कुपित होते हैं, जल अम्लपाक होने से पित्त कुपित होता है। वर्षाऋतु में अग्नि-बल के क्षीण होने से वात, पित्त, कफ तीनों दोष कुपित होते हैं। 

वरसात के दिनों में जिस दिन वायु और वरसात जोर का पड़ रहा हो और सर्दी बहुत हो ,उस दिन वायु को शांत करने के लिये अम्ल, लवण रस तथा स्नेह घी जिस अन्न में स्पष्ट दिखता हो उसे बिशेष करके खाना चाहिये। 


शरद् ऋतु


वर्षा ऋतु में काल स्वभाव में सञ्चित हुआ पित्त शरद् काल में बादलों के हट जाने से  सूर्य की किरणों के ताप से सहसा कुपित होता है। 

इसलिए इस ऋतु में मधुर, लघु, शीत और तिक्त आदि पित्तशामक खानपान परिमाण में खाना चाहिये ।

शरत्काल में रात्रि के प्रथम प्रहर में चन्द्रमा की किरणों का सेवन करना तथा शरत्कालीन मालाएँ और निर्मल वस्त्र प्रशंसनीय है। 


अभ्यासः

१.

    क) अयं पाठः 'चरकसंहिता'इति ग्रन्थात् संकलितः महर्षि चरकश्च तस्य प्रणेता।

ख)  षड्ऋतवः सन्ति ‌। ग्रीष्मश्च वर्षाशरद्हेमन्तशिशिरो बसन्तश्च एतानि भवन्ति तेषां नामानि।

ग)  कटुतिक्तकषायाणि वातलानि लघूनि शीतलानि च अन्नपानानि शिशिरे वर्जनीयम्।

च) वसन्ते कायाग्निं निचितः श्लेष्मा बाथते।

ङ) ग्रीष्मे  स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धञ्च अन्नपानं हितम् भवति।

च)  वर्षा ऋतौ पवनादयः कुप्यन्ति।

छ) शरदृतौ पित्तप्रशमनाय मधुरं लघु शीतं सतिक्तकञ्च अन्नपानं मात्रया सेव्यमस्ति।

ज) हिमागमे वातलानि लघूनि च अन्नपानानि वर्जयेत्।

झ) शिशिरे निवातं अधिकमुष्णं गृहम् आश्रयेत्।

ञ) वसन्ते वमनादीनि कर्माणि कारयेत्।

ट) ग्रीष्मे व्यायामं वर्जयेत्।

ठ) शरत्काले प्रदोषे इन्दुरश्मयः प्रशस्यन्ते।

क) हिमागमे वातलानि लघूनि च अन्नपानानि वर्जयेत्।

ख) शिशिरे निवातं अधिकमुष्णं च गृहमाश्रयेत्।

ग) वसन्ते दिवास्वप्नं वर्जयेत्।

घ) ग्रीष्मे घृतं पयः सशाल्यन्नं भजन् नरः न सीदति।

ङ) शरत्काले विमलानि वासांसि प्रशस्यन्ते।

५.

           विग्रह पदानि         समस्तपदानि 

क)    अन्नानि च पानानि च  -   अन्नपानानि 

ख) हेमन्तः च शिशिरः च  - हेमन्तशिशिरौ 

ग)  हिमस्य आगमे -     हिमागमे

घ) कायस्य अग्निम् - कायाग्निम्

ङ) अर्कस्य रश्मिभिः  - अर्करश्मिभिः

६. अर्थमेलनं क्रियताम् -

               पदानि            अर्थाः

क)      श्लेष्मा                कफ 

ख)।     रौक्षम्                    रूखापन

ग)        निवातम्              हवारहित

घ)         निचितः                 बढ़ा हुआ 

ङ)।       पवनः                  वात

च)।        गुरुः                    भारी

छ)         लघुः                   हल्का 

ज)         वासांसि               वस्त्र 

७.

           पदानि            विपरीतार्थकपदानि

           उष्णम्                शीतम् 

           सीदति             प्रसीदति

           तप्तानाम्            शीतानाम्

           गुरु                    लघु 

           अल्पम्              अधिकम् 

८.

        हेमन्त+ठक् = हेमन्तः

       स्निह् + क्त  = स्निग्ध 

       भुज्  + तव्यत् =  भोक्तव्यम् 

        सेव् + यत्   =   सेव्यम्

       शरद् + अण्  =  शरदः

Sunday, December 14, 2025

सुभाषितम्( THOUGHT OF YHE DAY)

 नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम्।

आपत्स्वपि न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः।।

अर्थात्, 

    विद्वानों के सदृश बुद्धिवाले अर्थात् चतुर मनुष्य दुर्लभ वस्तु की इच्छा नहीं रखते और नष्ट हुए का चिन्ता नहीं करते एवं आपत्ति आने पर घवराते नहीं हैं।

Meaning -

   Clever people neither desire rare/ precious things nor think of the destroyed and also they don't get panic when face trouble.

Wednesday, December 10, 2025

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।

तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्वध्यन्ते मत्तदन्तिनः।।

अर्थात्,

छोटी और तुच्छ वस्तु के समुदाय से भी एक बड़े कार्य की सिद्धि हो जाती है। जैसे घासों के समूह से बनी रस्सियों से मदोन्मत्त गजराज भी बांधे जाते हैं।

Meaning -

The accomplishment of a great work happens even through gathering of small things. Just like an intoxicated elephant who is controlled by the thread which is made from the collection of grass.

Tuesday, December 9, 2025

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 शरीरस्य गुणानाञ्च दूरमत्यन्तमन्तरम्‌‌।

शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः।।

अर्थात्,

शरीर और दयादाक्षिण्यादि गुणों में बहुत दूर का अन्तर है। क्योंकि शरीर क्षणमात्रमें नष्ट हो जाता है और दयादाक्षिण्यादि गुण महाप्रलयतक स्थिर रहनेवाले हैं। अतः यश की रक्षा सर्वथा योग्य और उचित है।

Meaning -

     There is large difference between body and qualities of mercy and kindness etc. As body demolished in Just a while whereas the qualities like mercy, kindness etc. will sustain till great dissolution or deluge.

Monday, December 8, 2025

सुभाषितम् (THOUGHT OF THE DAY)

 



सुमहान्त्यपि शास्त्राणि धारयन्तो बहुश्रुताः।

छेतारः संशयानाञ्च क्लिश्यन्ते लोभमोहिताः।।


अर्थात्, 

 

            अनेक शास्त्रों को पढ़ने तथा सुननेवाले और दूसरे के सन्देहों को दूर करनेवाले विद्वान् भी लोभवश नष्टज्ञान होकर  दुःखी होते हैं।

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अल्पज्ञ एव पुरुषः प्रलपत्यजस्रं पाण्डित्यसम्भृतमतिस्तु मितप्रभाषी।  कांस्यं यथा ही कुरुते अतितरां निनादं तद्वत् सुवर्णमिह नैव करोति नादम्।।...