संहतिः श्रेयसी पुंसां स्वकुलैरल्फकैरपि।
तुषेणापि परित्यक्ता न प्ररोहन्ति तण्डुलाः।।
अर्थात्,
अपने कुल के छोटे व्यक्तियों का समूह भी कल्याणकारी होता है। जैसे भूसा मात्र से अलग हो जाने पर चावल फिर अंकुरित नहीं होते।
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संहतिः श्रेयसी पुंसां स्वकुलैरल्फकैरपि।
तुषेणापि परित्यक्ता न प्ररोहन्ति तण्डुलाः।।
अर्थात्,
अपने कुल के छोटे व्यक्तियों का समूह भी कल्याणकारी होता है। जैसे भूसा मात्र से अलग हो जाने पर चावल फिर अंकुरित नहीं होते।
गुणेष्वेव हि कर्तव्यः प्रयत्नः पुरुषैः सदा।
गुणयुक्तो दरिद्रोऽपि नेश्वरैरगुणै समः।।
अर्थात्,
व्यक्ति सर्वदा सद्गुणोंको ग्रहण करने में प्रयत्न करना चाहिए। दरिद्र होने पर भी व्यक्ति यदि गुण के अधिकारी है, तो गुणहीन नृपति अथवा धनाढ्य व्यक्ति से भी अधिक सम्मानित होता है।
Meaning --
People should always try to accept virtues. One even being poor if having virtues is mostly respected than virtueless king or richest person.
यस्तु संचरते देशान् यस्तु सेवेत पण्डितान्।
तस्य विस्तारिता बुद्धि स्तैलविन्दुरिवाम्भसि।।
अर्थात्,
जो व्यक्ति अनेक देश भ्रमण करता है और विद्वानों का सेवा करता है उसका बुद्धि पानी में तैलविन्दु सदृश विस्तारित हो जाता है।
Meaning --
The one who travels several countries and serves the intelligents, his intelligence expands just like the oil drop spreads in the water.
ग्रीष्मबर्जेषु कालेषु दिवा स्वापो निषिद्ध्यते।
उचितो हि दिवा स्वापो यतोनित्यः शरीरिणाम्।।
अर्थात्,
मनुष्यों का निद्रा दैनन्दिन कर्तव्य है। परन्तु ग्रीष्मकाल को छोड़कर अन्य समय में दिन में सोना निषिद्ध है।
Meaning --
Sleeping is the daily routine of human beings. But sleeping in the day time is forbidden except in the days of Summer.
Words. Comparative. Superlative
१.पृथु(wide) प्रथीयस् प्रथिष्ठ
२.प्रिय (dear ) प्रेयस् प्रेष्ठ
३.बाढ(firm, strong) साधीयस् साधीष्ठ
४.बहु/बह्वी (much) भूयस् भूयिष्ठ
५. बहुल (thick) बहीयस् बहिष्ठ
६. महत् महीयस् महिष्ठ
७. मृदु(soft) म्रदीयस् म्रदिष्ठ
८. स्वल्प(very small) स्वल्पीयस् स्वल्पिष्ठ
९. स्वादु(taste) स्वादीयस् स्वादिष्ठ
१०. वृंदार (beautiful) वृंदीयस् वृंदिष्ठ
११. प्रशस्य(praiseworthy, श्रेयस्/ज्यायस् श्रेष्ठ/ज्येष्ठ
excellent)
१२. भृश(strong,mighty, भ्रशीयश् भ्रशिष्ठ
very much)
साधारणतः लोकत्रयः अथवा भुवनत्रयः इति कथ्यन्ते :-
स्वर्गलोकः, पृथ्वीलोकः पाताललोकश्च।
परन्तु मुख्यतः चतुर्दशलोकाः भुवनानि वा सन्ति। ते भवन्ति :-
१. व्रह्मलोकः सत्यलोकः वा
२. तपर्लोकः
३. जनर्लोकः
४. महर्लोकः
५. स्वर्लोकः
६. भुवर्लोकः
७. भूर्लोकः.
८. अतल
९. वितल
१०. सुतल
११. रसातल
१२. तलातल
१३. महातल
१४. पाताल
यस्य मित्रेण सम्भाषो यस्य मित्रेण संस्थितिः।
यस्य मित्रेण संलपस्ततो नास्तीह पुण्यवान्।।
अर्थात्,
जिस व्यक्ति का मित्र के साथ वार्तालाप है, जिस का मित्रों के साथ वास है और जिसका मित्र के साथ अच्छे से गोष्ठी/मेल-मिलाप होता है, उससे बढ़कर पुण्यवान् इस संसार में दूसरा कोई नहीं है।
उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं विषयेष्वसक्तम्। शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः।। अर्थात्, उत्साही...