यस्य मित्रेण सम्भाषो यस्य मित्रेण संस्थितिः।
यस्य मित्रेण संलपस्ततो नास्तीह पुण्यवान्।।
अर्थात्,
जिस व्यक्ति का मित्र के साथ वार्तालाप है, जिस का मित्रों के साथ वास है और जिसका मित्र के साथ अच्छे से गोष्ठी/मेल-मिलाप होता है, उससे बढ़कर पुण्यवान् इस संसार में दूसरा कोई नहीं है।
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