Monday, November 17, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 मृगा मृगैः संगमनु्व्रजन्ति

गावश्च गोभिस्तुरगास्तुरंगैः।

मूर्खाश्च मूर्खैः सुधियः सुधीभिः

समानशील व्यसनेषु सख्यम्।।


अर्थात्,  

        हिरण हिरणों के साथ, गाय गायों के साथ, अश्व अश्वों के साथ, मुर्ख मुर्खों के साथ और पण्डित पण्डितों के साथ मिलकर रहना चाहते हैं। इससे ज्ञात होता है कि  समान स्वभाव और समान व्यसनवाले प्राणीयों का परस्पर मित्रता होता है। 


Meaning --


         Deer with deer, cow with cows, horse with horses, fool with fools and learned with learned people live together. This meant that the creatures of same nature and of same  conduct have friendships with each other.

Monday, November 3, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

अर्थात् -
           " यह अपना अथवा पराया" -ऐसा विचार क्षुद्र हृदय वाले व्यक्तियों का है। परंतु उदार हृदय वाले व्यक्तियों के लिए " केवल पृथ्वी एक परिवार है"।

Meaning -

             "This is mine or others" - this consideration or thought is of narrow minded people. But for noble minded/magnanimous persons "only the Earth is one family ".

Tuesday, October 28, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 जलबिन्दूनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। 

स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च।। 

अर्थात्  --  
            जल की एक एक बूंद  गिरने से जैसे धीरे धीरे घड़ा भर जाता है वही कारण सव प्रकारकी विद्याओं का, धनका और धर्मका भी है ।

Meaning  --

         Just like with every drop of water the pot gets fill slowly, the same applies on acquiring  education, richness and righteousness also.

Sunday, October 5, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 कटुतिक्तकषायाणि वातलानि लघूनि च। 

वर्जयेदन्नपानानि शिशिरे शीतलानि च।। 

   अर्थात् -
            शिशिर काल में  कड़ुवे, तिक्त, कसैले, वायुकारक और लघु तथा ठण्डे खानपानको छोड़ देना चाहिए। 
Meaning -
            In winter one should abstain from eating food like pungent, bitter, astringent, aerated food and light and cold food.

          

Saturday, August 9, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।

चत्वारि तस्य बर्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्॥(महर्षि मनुः)

 अर्थ  -    

          प्रतिदिन नियमितरूपसे गुरुजनों को प्रणामक़रनेवाले तथा वयस्कज्ञानीजनों का सेवा करनेवाले व्यक्ति का आयु, विद्या, कीर्ति और शक्ति - इन चारों का वृद्धि होती है।


Monday, August 4, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 

श्रुतिर्विभिन्नाः स्मृतयश्च भिन्ना 

नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम्।

धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां

महाजनो येन गतः स पन्थाः।।
 
अर्थः -
           वेद वाक्य अलग अलग हैं। स्मृतिवाक्य भी भिन्न हैं। कोई भी एक ही मुनि का वचन प्रमाण नहीं होता है। धर्म के तत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म है। इसलिए महान् व्यक्तियों के द्वारा प्रदर्शित चिराचरित प्रथा ही उत्कृष्ट मार्ग है। 

Meaning  -

                    There are differences in the sayings of Vedas. The statements of Smriti Shastra are also different. The truth of righteousness is very much subtle or deep. So the classical traditions and customs are the best path which shown by the great persons. 

Thursday, July 31, 2025

NCERT SANSKRIT BHASHWATI Claas 11 Chapter - 2 सूक्तिसुधा

                                     सूक्तिसुधा   


१.   जिस देश में आदर सम्मान नहीं और न ही आजीविका का कोई साधन है, जहाँ कोई बन्धु-बान्धव,रिश्तेदार भी नहीं तथा किसी प्रकार की विद्या और गुणों की प्राप्ति की संभावना नहीं, ऐसे देश को छोड़ देना चाहिए। 
२.  किसी रोग से पीड़ित होने पर, दुख आने पर, अकाल पड़ने पर , शत्रृ  की ओर से संकट आने पर, राजसभा में, श्मशान अथवा किसी की मृत्यु के समय जो व्यक्ति साथ नहीं छोड़ता, वास्तव में वही प्रकृत बन्धु है। 
३. बलवानोंको अधिक बोझ क्या है? और उद्योग करने वालों को क्या दूर है? विद्यावानोंको विदेश क्या है? और मीठे बोलने वालों का शत्रु कौन है? 
४.  सुवर्ण के साथ होने से जैसे कांच की मरकत मणि सदृश शोभा हो जाती है वैसे ही सज्जनों के संगति से मूर्ख भी चतुर  वन जाता है। 
५.  पुष्प के गुच्छे के समान उदार मनुष्य की दो तरह की प्रकृति होती है कि या तो सबके शिर पर रहे अथवा वन में नष्ट हो जाए। 
 ६.  पण्डित को परोपकार के लिए धन और प्राण छोड़ देने चाहिये। विनाश निश्चय है अतः उत्तम कार्य के लिए प्राणों का त्याग श्रेष्ठ है। 
७.     इस संसार में अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष को नींद, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता ये छः अवगुण छोड़ देनी चाहिए। 
८.  हे राजा! नित्य धन की प्राप्ति, आरोग्यता, प्रियतमा और मधुरभाषिणी स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र और धन उत्पन्न करने वाली विद्या - संसार का ये छः सुख हैं। 



                          अभ्यासः

१.  
  क)  अयं पाठः चाणक्यनीति-हितोपदेशाभ्यां ग्रन्थाभ्याम् संकलितः ।
   ख)  यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न बान्धवाः न च विद्यागमः तत्र वासः न कर्तव्यः।
   ग)   आतुरे व्यसने दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे राजद्वारे श्मशाने च बान्धवः तिष्ठति। 
   घ)    काचः काञ्चनस्य संसर्गात् मारकतीं द्युतिं धत्ते। 
   ङ)   प्राज्ञः परार्थे धनानि जीवितं च उत्सृजेत्। 
   च)   मूर्खः सत्सन्निधानेन प्रवीणतां याति। 
   छ)   पुरुषेण निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रताञ्च एते षड् दोषाः हातव्या।
    ज)   नित्यं अर्थागमः अरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च वश्यश्च पुत्रः अर्थकरी च विद्या - जीवलोकस्य एतानि षट् सुखानि सन्ति। 
२.
क)  यः आतुरे व्यसने दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे राजद्वारे श्मशाने च तिष्ठति सः बान्धवः।
ख)  जीवलोकस्य नित्यं अर्थागमः अरोगिता च प्रिया भार्या च प्रियवादिनी च वश्यश्च पुत्रः अर्थकरी च विद्या षट् सुखानि भवन्ति। 
ग)   मनस्विनः कुसुमस्तवकस्य इव द्वयी वृत्तिः भवति। 
घ)   षड्दोषाः भूतिमिच्छता पुरुषेण इह हातव्याः। 
ङ)   सन्निमितं वरं त्यागो विनाशे नियते सति। 

४.   

                                  

        विद्यागमः             विद्याप्राप्तिः
       व्यसने                  विपत्तौ
        सविद्यानाम्           विदुषां
        द्युतिम्                  शोभाम् 
        कुसुमस्तवकस्य      पुष्पगुच्छस्य
        मूर्ध्नि.                     शिरसि 
        भूतिम्                   कल्याणम् 
५.
              विग्रहपदानि                          समस्तपदानि

       1.   विद्यायाः आगमः                      विद्यागमः 
       2.    राज्ञः  द्वारे                            राज द्वारे
       3.    सतां सन्निधानेन                     सत्सन्निधानेन 
       4.    काञ्चनस्य संसर्गात्                काञ्चनसंसर्गात्
       5.    अर्थस्य आगमः                      अर्थागमः
       6.    जीविताय इदम्                       जीवितार्थम्
       7.       न  रोगिता                             अरोगिता 
       8.    अर्थं करोति या सा                  अर्थकरी 
६.

      1.        प्राप्ते  -  प्र + आप् + क्त, सप्तमी एकवचन 
      2.        प्रवीणताम्  -   प्रवीण + तल्, द्वितीया एकवचन 
      3.        वृत्तिः   -  वृत्  +  क्तिन् 
      4.         नियते  -  नी + यत् , विशेषण, सप्तमी एकवचने 
      5.         हातव्या  -   हा   +  तव्य, वहुवचने

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 CHAPTER -.8

वस्त्र विक्रयः अष्टम पाठः (तब अनुचर के साथ विदेशी गौरांग का प्रवेश होता है। वह राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र दिखाकर सेठ और जुलाहको डांटता है ।) ...