Monday, February 20, 2023

पशूनां नामानि ( ANIMALS NAME)

                                 


 १.   कंठीलः, करभकः / शलाभोलिः     -     ऊँट           (A CAMEL)


  २.         ओतुः                                   -     बिल्ली       (A CAT)

   ३.  आटीकरः                                    -     बैल           (A BULL)

   ४.         उरः                                     -      भेड़           (A SHEEP)

   ५.       आखुः                                    -      चूूहा          (A MOUSE, RAT, MOLE)

   ६.     चित्रौष्ट्रः                                  -      जिराफ      ( A giraffe)


   ७.   व्याघ्रः/ चित्रकायः                       -      बाघ           (A Tiger)


सारंगः  -  A deer / spotted deer 
चित्रमृगः - A spotted antelope 
तर्क्षुः  -  A hyena
पुष्कलकः  -  A musk deer
भरुजः/शृगालः -  A jackal 
भल्लूकः  -  A bear
घोटकः/हयः -  A horse
गंडकः -   A rhinoceros 
घोटकः -  A  horse 

गर्दभः  -   A donkey / ass

महिषः -    A buffalo 

बलीवर्दः  -  A  bull  / an ox

धेनुः  -   A cow

खिंखिरः  -  A fox

गजः/हस्ती -  An elephant 

अजः -  A goat 

श्वानः  -  A dog

शूकरः - A hog






















































































































































































































७.  व्याघ्रः चित्रकायः -  बाघ

८.  -

SUBHASITAM (NOBLE THOUGHTS)

                                     

   सर्वेषामेव दानानां व्रह्मदानं विशिष्यते।

   वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाञ्चनसर्पिषाम्॥

   अर्थ  -

         जल, अन्न, गाय, भूमि,वस्त्र, तिल, सोना, घी आदि सभी प्रकार के दान में से विद्यादान उत्कृष्ट है।

Meaning  - 

         Sharing knowledge is the best one among the donations of water, grain, cow, land, clothing, sesame, gold and ghee. 


Saturday, January 28, 2023

SUBHASITAM (NOBLE THOUGHTS)

 

                                               

 गुरवो वहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः।

 दुर्लभः स गुरुर्लोके शिष्यचित्तापहारकः॥

 अनुवादः  -

      शिष्य से धन अपहरण करनेवाले गुरु अनेक हैं। परंतु शिष्य के मन को अपहरण करने वाले गुरु दुर्लभ होते हैं॥

 Meaning - 

          There are many teachers who loot money from disciples. But it is difficult to get a teacher who can loot the mind of the disciple/student.

Tuesday, January 3, 2023

SUBHASITAM (NOBLE THOUGHTS)




शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्नानमाचरेत्।
लक्षं विहाय दातव्यं कोटिं त्यक्त्वा हरिं भजेत्॥

    अर्थ - 
           सौ(शतसंख्यक) काम छोड़ कर भोजन करना चाहिए, हज़ारों काम होने पर भी छोड़ कर स्नान करना चाहिए, लाखों काम त्याग कर दान तथा करोड़ों काम छोड़ कर भगवानजी का स्मरण करना चाहिए।
Meaning  -
               One should eat leaving hundreds of work, one should take bath leaving thousands of work, leaving millions of work one should donate, and pray to god leaving crores of work. 

Monday, January 2, 2023

NCERT SANSKRIT SHEMUSHI CLASS-10 CHAPTER - 7 VICHITRAH SAAKSHEE

                    

 

                     किसी निर्धन जन ने बहुत परिश्रम कर अत्यधिक धन कमाया । उस धन से वह अपने बेटे को एक महाविद्यालय में अध्ययन के लिए प्रवेश दिलाने में सफल हुआ। वह पुत्र वहाँ छात्रावास में ही रहते हुए अध्ययन में तल्लीन हो गया। एक बार वह पिता पुत्र की बीमार होने की खबर सुन कर विचलित हो गया और पुत्र को देखने के लिए निकलगया। अत्यधिक धनाभाव के कारण वह बस यान को छोड़ कर पैदल ही चला गया।

    पैदल चलते हुए संध्या समय आगमन पर भी यह जन गन्तव्य स्थान से दूर था। रात्रि में अन्धकार फैलने पर एकान्त प्रदेश में पदयात्रा शुभ नहीं होता। यह विचार कर वह पास में स्थित गाँव में रात में निवास करने के लिए कीसि गृहस्थ के पास रह गया। करुणापूर्वक गृहस्थ ने उसे आश्रय दिया। 

      भाग्य की लीला अद्भूत है। उस रात को ही उनके घर एक चोर प्रवेश किया।।उसने घर में रखी हुई एक पेटीका को लेकर भाग गया। चोर के पैरों के ध्वनि से जागा हुआ अतिथि चोर की शङ्का से उसके पिछे भागा और पकड़लिया, लेकिन विचित्र घटना घटा। चोर ही ज़ोर ज़ोर से चिल्लाना शुरु कर दिया "यह चोर यह चोर"। उसके ऊँची आवाज़ से जगे हुए गाँव के लोग अपने घरों से निकलकर वहाँ  पर आते हुए अतिथि को ही चोर समझकर भला-बुरा कहने लगे। लेकिन गाँव का आरक्षी ही चोर था। उसी समय ही रक्षापुरुष ने उन अतिथि को "यह चोर" ऐसा स्थापितकर (ठहराकर) कारागार में डालदिया।

अगले दिन वह आरक्षी चोरी के आरोप में उसको न्यायालय ले गया। न्यायाधीश वंकिमचन्द्र दोनों से अलग अलग विवरण सुने। सभी विषय को  जानकर न्यायाधीश मेहमान को निर्दोष और सैनिक को दोषी मानाा। किन्तु सबूत न होने के कारण निर्णय लेने में असमर्थ रहे। इसलिए उन दोनों को अगले दिन उपस्थित होने के लिऐ आदेश दिए। और किसी दिन वो दोनों न्यायालय में पुनः अपना अपना पक्ष को रखा। तभी वहाँ का कोई कर्मचारी आ कर प्रार्थना की कि यहाँ से दो कोस के मध्य में किसी के द्वारा किसी व्यक्ति का हत्या हो गया है। उसका मृतशरीर राजमार्ग के पास है। क्या करना होगा आज्ञा दीजिए। न्यायाधीश आरक्षी और अतिथि को उस शव को  न्यायालय में ले कर आने के लिए आज्ञा दी।

    आदेश प्राप्त कर वे दोनों चल पड़े। वहाँ पहुँच कर लकड़ी के तख्ते पर रखे हुए और कपड़े से ढके हुए  शरीर को कन्धे पर धारण करते हुए  न्यायालय कि ओर चल पड़े। सैनिक हृष्ट-पुष्ट था और अभियुक्त बहुत कमज़ोर।भारवाही(बोझ वाले) शव को कन्धे पर वहन करना उसके लिए मुस्किल था। वह बोझ की पीड़ा से रोने लगा। उसका रोना सुन कर प्रसन्न चौकीदार उसको बोला- "हे दुष्ट! उस दिन तुमने मुझे चुराए हुए संदूक को ले जाने के लिए मना किया। अब अपने कर्म का फल भुगतो। इस चोरी के अभियोग (जुर्म)में तुम तीन साल का सज्ज़ा प्राप्त करोगे" एसा कहकर वह ज़ोर से हँसने लगा। जैसे-तैसे उन दोनों ने शव को लाकर एक चौराहे पर रख दिया। 

  न्यायाधीश के द्वारा वे दोनों पुनः घटना के वारे में बोलने के लिए आदिष्ट हुए।सैनिक के द्वारा अपना पक्ष प्रस्तुत करते समय आश्चर्यजनक घटना घटी। उस शव ने ओढ़ा हुआ वस्त्र हटा कर न्यायाधीश को अभिवादन कर निवेदन किया- मान्यवर! इस आरक्षी के द्वारा मार्ग में जो कुछ कहा गया मैं उसका वर्णन करता हूँ  "तुमने मुझे चोरी की सन्दूक ले जाने में मना किया, इसलिए अपने कर्म का फल भोगो। इस चोरी के अभियोग में तुम्हे तीन साल की सज्ज़ा मिलेगी"।

न्यायाधीश ने चौकीदार को कारादण्ड का आदेेेश दे कर उस व्यक्ति को सम्मान के साथ छोड़ दिया।

  इसलिए कहागया है- बुद्धि और वैभव से युक्त व्यक्ति नीति तथा युक्ति का सहारा लेकर कठीन  कार्यों को भी खेल-खेल में सम्पन्न कर देते हैं।

                                                                 अभ्यासः  

१.    अधोलिखितानां प्रश्नानाम उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-

     क) निर्धनः जनः कथं वित्तमुपार्जितवान्?

 उत्तरम-   निर्धनः जनः भूरि परिश्रम्य धनं उपार्जितवान्।

   ख)  जनः किमर्थं पदातिः गच्छति?

  उत्तरम्-  जनः परमर्थकार्श्येन पदातिः गच्छति।

  ग)  प्रसृते निशान्धकारे स  किम अचिन्तयत्?

   उत्तरम्-  प्रसृते निशान्धकारे स अचिन्तयत यत विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा इति।

घ)  वस्तुतः चौरः कः आसीत्?

   उत्तरम्-   वस्तुतः आरक्षी  चौरः आसीत्।

  ङ)  जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी किमुक्तवान्?

    उत्तरम्-  जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी उक्तवान्- "निजकृत्यस्य फलं भुङ्क्ष्व। यतः चोरिताया मञ्जूषाया ग्रहणाद् त्वया अहं वारितः। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे"।

 च)  मतिवैभवशालिनः दुष्कराणि कार्याणि कथं साधयन्ति?

  उत्तरम्-  मतिवैभवशालिनः दुष्कराणि कार्याणि नीतिं युक्तिं समालम्ब्य लीलयैव साधयन्ति।

२.  रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-

        क) पुुत्रं द्रष्टुं सः प्रस्थितः।

     प्रश्नम्-   कम् द्रष्टुं सः प्रस्थितः?        

     ख)  करुणापरो गृही  तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्।

  प्रश्नम्-  करुणापरो गृही कस्मै आश्रयं प्रायच्छत्?

 ग)  चौरस्य पादध्वनिना अतिथिः प्रबुद्धः।

  प्रश्नम्-  कस्य पादध्वनिना अतिथिः प्रबुद्धः?

  घ)  न्यायाधीशः बंकिमचन्द्रः आसीत्।

  प्रश्नम्-  न्यायाधीशः कः आसीत्?

ङ)  स भारवेदनया क्रन्दति स्म।

  प्रश्नम्-  स कया क्रन्दति स्म?

 च)  उभौ शवं चत्वरे स्थापितवन्तौ।

  प्रश्नम्-  उभौ शवं कुत्र स्थापितवन्तौ?

 ३.  यथानिर्देशमुत्तरत--

    क)  "आदेशं प्राप्य उभौ अचलताम्" अत्र किं कर्तृपदम्?

  उत्तरम्- "आदेशं प्राप्य उभौ अचलताम्" अत्र  "उभौ " कर्तृपदमस्ति।

    ख)  "एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तत् वर्णयामि"- अत्र "मार्गे" इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम्?

    उत्तरम्-  "एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तत् वर्णयामि"- अत्र  "मार्गे" इत्यर्थे "अध्वनि " पदं प्रयुक्तम्। 

   ग)  "करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्"- अत्र "तस्मै" इति सर्वनामपदं अतिथये प्रयुक्तम्।

  घ)   "ततोऽसौ तौ अग्रीमे दिने उपस्थातुम् आदिष्टवान्"  अस्मिन् वाक्ये किं क्रियापदम्?

  उत्तरम्-  "ततोऽसौ तौ अग्रीमे दिने उपस्थातुम् आदिष्टवान्" अस्मिन् वाक्ये "आदिष्टवान्" एव क्रियापदमस्ति।

  ङ)  "दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः"- अत्र विशेष्यपदं किम्?

  उत्तरम्- "दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः"- अत्र विशेष्यपदं "कर्माणि" अस्ति।  

४.  सन्धिं सन्धिविच्छेदं च कुरुत-

   क)  पदातिरेव             -      पदातिः   +     एव

   ख)   निशान्धकारे            -        निशा    +     अन्धकारे

   ग)   अभि  +   आगतम     -           अभ्यागतम्

   घ)  भोजन    +    अन्ते       -       भोजनान्ते

   ङ)   चौरोऽयम्       -         चौरः      +       अयम्

   च)    गृह     +     अभ्यन्तरे        -            गृृहाभ्यन्तरे

  छ)      लीलयैव     -             लीला     +     एव

  ज)  यदुक्तम्  -     यद्      +     उक्तम्

   झ)    प्रबुद्धः   +   अतिथिः      -        प्रबुद्धोऽतिथिः

 ५.  भिन्न प्रत्ययान्तानि पदानि पृथक् कृत्वा निर्दिष्टानां  प्रत्ययानामधः लिखत-

         ल्यप प्रत्यय           क्त प्रत्यय          क्तवतु प्रत्यय          तुमुन प्रत्यय

           परिश्रम्य               प्रस्थितः             उपार्जितवान्            दापयितुम्

           विहाय                   प्रविष्टः               पृष्टवान्                    द्रष्टुम्

            आदाय                 नियुक्तः              नीतवान्                   क्रोशितुम्

           समागत्य              मुदितः                 आदिष्टवान्              निर्णेतुम्

 ६.  अ)   वाक्यानि बहुवचने परिवर्तयत-

          क)  ते बसयानं विहाय पदातिरेव गन्तुं निश्चयं कृतवन्तः।

          ख)   चौराः ग्रामे नियुक्ताः राजपुरुषाः आसन्।

          ग)  केचन चौराः गृृहाभ्यन्तरं प्रविष्टाः।

          घ)  अन्येद्युः ते न्यायालये स्व-स्व-पक्षं स्थापितवन्तः।

    आ)   विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत-

          क)   सः गृहात् निष्क्रम्य बहिरगच्छत्।

          ख)  गृहस्थः अतिथये आश्रयं प्रायच्छत्।

          ग)   तौ न्यायाधिकारिनं प्रति प्रस्थितौ।

          घ)  अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे।

          ङ)  चौरस्य पादध्वनिना प्रबुद्धः अतिथिः।

  ७.  भिन्नप्रकृतिकं पदं चिनुत-

          क)  शङ्कया

          ख)  यदुक्तम्

          ग)   व्याकुलः

          घ)  जनः 

  




                                                     



Saturday, June 12, 2021

NCERT SANSKRIT - SHEMUSHI CLASS-10 CHAPTER-2 BUDDHIRBALAVATI SADA

 हिन्दी अनुवाद-

      देउलाख्यो नाम के एक गांव है। वहाँ राजसिंह नाम के राजपुत्र रहता था। एकदिन कोई जरुरी काम से उसका पत्नी बुद्धिमती दोनों बेटों के साथ मिलकर पिता के घर की ओर चली गई। रस्ते में गहरा जंगल में वो एक बाघ देखा। वो बाघ को आते हुए देखकर ढिठाई से दोनों बेटों को थप्पड़ मारकर कहा- "बाघ को खाने के लिए क्यों एक दुसरे से झगड़ा कर रहे हो? यह एक है, इसलिए दोनों बाँटकर खाना। बाद में ओर कोई दुसरा बाघ कहीं से ढूढेंगे।"

      वह सब बातें सुन कर यह कोई बाघ को मारने वाली होगी ,ये सोच कर भयभीतचित्तयुक्त बाघ भाग गया।
वो रूपवती स्त्री अपनी बुद्धि से बाघ के भय से मुक्त हो गई। अन्य बुद्धिमान मनुष्य भी संसार में महान भय से मुक्त हो जाता है॥
भय से व्याकुल बाघ को देखकर कोई दुष्ट सियार हँसते हुए कहने लगा- "बाघ, आप भय से क्यों भाग रहे हैं?"
व्याघ्रः - जाओ जाओ सियार! तुम भी किसी गुप्त स्थान में चले जाऔ। क्योंकि बाघ हत्यारन एसा शास्त्र में जो सुना जाता है, वह मुझे मारने के लिए तैयार है। परन्तु मैं उसके आगे से हथेली पर प्राण रख कर जल्दी भाग आया हूँ।

श्रृगालः - बाघ! तुमने बड़ी हैरानी की बात बताया कि तुम मनुष्य से भी डरते हो?
व्याघ्रः - आँखों के सामने ही एक एक करके मुझे खाने के लिए झगड़ा करते हुए अपने दोनों पुत्रों को वो चपेट से मारती हुई मैंने देखा।
जम्बुकः - स्वामी! जहाँ वह धूर्त स्त्री बैठी हुई है वहाँ चलो। बाघ! तुम्हारा वहाँ दोबारा पहुँचने पर यदि वह सामने भी देख लेती है, तो तुमसे मैं मारा जाऊँगा।
व्याघ्रः - सियार! यदि तुम मुझे छोड़ कर जाते हो तब वह समय ही समाप्त हो जाएगा।                              जम्बुकः - यदि इस प्रकार है तो तुम मुझे अपने गले में बाँध कर जल्दी ले चलो। वह बाघ वैसा करके जंगल की ओर चल पड़ा। सियार के साथ दोबारा दूर से आते हुए बाघ को देख कर बुद्धिमती सोचने लगी - गीदड़ के द्वारा उत्साहित किए गए बाघ से मैं कैसे बचुँ?                                                                                                       परंतु हाजिरजवाब वह स्त्री गीदड़ को अंगुली से आक्षेप करती हुई तथा डाँटती हुई कहने लगी -                                                हे धूर्त! पहले तुमने मुझे विश्वास दिलाकर तीन बाघ देने के लिए कहा था । अभी बताओ, आज एक ही बाघ लेकर क्यों आए हो ॥

एसा कहकर भयोत्पादिका बाघ हत्यारन जल्दी भाग गई ।
गले में गीदड़ बंधा हुआ बाघ भी अचानक भाग गया ॥
इस प्रकार बुद्धिमती स्त्री बाघ से उत्पन्न भय से दोबारा मुक्त हो गई । इसलिए ठीक ही कहा गया है-
हे देवी! सर्वदा सभी कार्यों में बुद्धि बलवान होती है॥


अभ्यासः

१. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत -
क) बुद्धिमती केन उपेता पितुर्गृहं प्रति चलिता?
उत्तरम्- बुद्धिमती पुत्रद्वयेन उपेता पितुर्गृहं प्रति चलिता ।
ख) व्याघ्रः किं विचार्य पलायितः ?
उत्तरम् - इयं काचित् व्याघ्रमारी इति विचार्य व्याघ्रः पलायितः ।

ग) लोके महतो भयात् कः मुच्यते ?
उत्तरम्- लोके अन्यः बुद्धिमान् मनुष्यः महतो भयात् मुच्यते ।
घ) जम्बुकः किं वदन् व्याघ्रस्य उपहासं करोति ?
उत्तरम्- मानुषादपि विभेषि इति वदन् जम्बुकः व्याघ्रस्य उपहासं करोति ।
ङ) बुद्धिमती श्रृगालं किम् उक्तवती?
उत्तरम्- बुद्धिमती श्रृगालं इदं उक्तवती यत् " त्वं व्याघ्रत्रयम् आनेतुं " प्रतिज्ञाय एकमेव आनीतवान् ।

२. स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत -
क) तत्र राजसिंहो नाम रजपुत्रः वसति स्म ।
प्रश्नम्- तत्र को नाम राजपुत्रः वसति स्म?
ख) बुद्धिमती चपेटया पुत्रौ प्रहृतवती ।

प्रश्नम्- बुद्धिमती कया पुत्रौ प्रहृतवती?
ग) व्याघ्रं दृष्ट्वा धूर्तः श्रृगालः अवदत् ।
प्रश्नम्- कं दृष्ट्वा धूर्तः श्रृगालः अवदत्?
घ) त्वं मानुषात् विभेषि ।
प्रश्नम्- त्वं कस्मात् विभेषि?
ङ) पुरा त्वया मह्यं व्याघ्रत्रयं दत्तम्।
प्रश्नम्- पुरा त्वया कस्मै व्याघ्रत्रयं दत्तम्?

३. अधोलिखितानि वाक्यानि घटनाक्रमानुसारेण योजयत-
क) व्याघ्रः व्याघ्रमारी इयमिति मत्वा पलायितः।
ख) प्रत्युत्पन्नमतिः सा श्रृगालं आक्षिपन्ती उवाच।
ग) जम्बुककृतोत्साहः व्याघ्रः पुनः काननम् आगच्छत्।
घ) मार्गे सा एकं व्याघ्रम् अपश्यत्।
ङ) व्याघ्रं दृष्ट्वा सा पुत्रौ ताड़यन्ती उवाच- अधुना एकमेव व्याघ्रं विभज्य भुज्यताम्।
च) बुद्धिमती पुत्रद्वयेन उपेता पितुर्गृहं प्रति चलिता।
छ) "त्वं व्याघ्रत्रयं आनेतुं" प्रतिज्ञाय एकमेव आनीतवान्।
ज) गलबद्धश्रृगालकः व्याघ्रः पुनः पलायितः।
घटनाक्रमाः -
च) बुद्धिमती पुत्रद्वयेन उपेता पितुर्गृहं प्रति चलिता।
घ) मार्गे सा एकं व्याघ्रम् अपश्यत्।
ङ) व्याघ्रं दृष्ट्वा सा पुत्रौ ताड़यन्ती उवाच- अधुना एकमेव व्याघ्रं विभज्य भुज्यताम्।
क) व्याघ्रः व्याघ्रमारी इयमिति मत्वा पलायितः।
ग) जम्बुककृतोत्साहः व्याघ्रः पुनः काननम् आगच्छत्।
ख) प्रत्युत्पन्नमतिः सा श्रृगालं आक्षिपन्ती उवाच।
छ) "त्वं व्याघ्रत्रयम् आनेतुं" प्रतिज्ञाय एकमेव आनीतवान्।
ज) गलबद्धश्रृगालकः व्याघ्रः पुनः पलायितः।
४. सन्धिं सन्धिविच्छेदं वा कुरुत-
क) पितुर्गृहम् - पितुः + गृहम्
ख) एकैकः - एकः + एकः
ग) अन्योऽपि - अन्यः + अपि
घ) इत्युक्त्वा - इति + उक्त्वा
ङ) यत्रास्ते - यत्र + आस्ते
५. अधोलिखितानां पदानाम् अर्थः कोष्ठकात् चित्वा लिखत-
क) ददर्श - दृष्टवान्
ख) जगाद - अकथयत्
ग) ययौ - गतवान्
घ) अत्तुम् - खादितुम्
ङ) मुच्यते - मुक्तो भवति
च) ईक्षते - पश्यति
६. ( अ) पाठात् चित्वा पर्यायपदं लिखत-
क) वनम् - काननम्
ख) श्रृगालः - जम्बुकः
ग) शीघ्रम् - सत्वरं तूर्णम् वा
घ) पत्नी - भार्या
ङ) गच्छसि - यासि
( आ) पाठात् चित्वा विपरीतार्थकं पदं लिखत-
क) प्रथमः - द्वितीयः
ख) उक्त्वा - श्रृत्वा
ग) अधुना - पश्चात्
घ) अवेला - वेला
ङ) बुद्धिहीना - बुद्धिमती
७. (अ) प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत-
क) चलितः - चल् + क्त
ख) नष्टः - नष् + क्त
ग) आवेदितः - आ + विद् + क्त
घ) दृष्टः - दृश् + क्त
ङ) गतः - गम् + क्त
च) हतः - हन् + क्त
छ) पठितः - पठ् + क्त
ज) लब्धः - लभ् + क्त
(आ) उदाहरणमनुसृत्य कर्तरि प्रथमा विभक्तेः क्रियायाञ्च क्तवतु प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा वाच्यपरिवर्तनं कुरुत-
यथा- तया अहं हन्तुम् आरब्धः - सा मां हन्तुम् आरब्धवती।
क) मया पुस्तकं पठितम्। - अहं पुस्तकं पठितवान्।
ख) रामेण भोजनं कृतम्। - रामः भोजनं कृतवान्।
ग) सीतया लेखः लिखितः। - सीता लेखं लिखितवती।
घ) अश्वेन तृणं भुक्तम्। - अश्वः तृणं भुक्तवान्।
ङ) त्वया चित्रं दृष्टम्। - त्वं चित्रं दृष्टवान्।

NCERT SANSKRIT SHEMUSHI CLASS-10 CHAPTER - 3 SHISHULALANAM



( श्रीराम सिंहासन पर विराजमान हैं। फिर विदूषक द्वारा उपदेश दिए जाते हुए तपस्वी लव और कुश का प्रवेश। )

विदूषकः - आर्य इधर!
कुशलवौ - ( राम के पास जाकर और प्रणाम करते हुए ) क्या महाराज कुशलपूर्वक हैं?
रामः - आपके दर्शन से कुशल के समान हो गया हूँ। हम यहाँ क्या आप दोनों के कुशल प्रश्न के पात्र ही हैं, फिर क्या अतिथिजनों के लिए आवश्यक गले लगाने का पात्र हम नहीं हैं।( आलिङ्गन करके) अरे! हृदय को छूनेवाला स्पर्ष है।                                                                                                                                                                   उभौ - निश्चित रूप से यह राजा का आसन है। यहाँ बैठना उचित नहीं है।                                                         रामः - रुकावट सहित चरित्र लोप के लिए नहीं है। इसलिए गोदि मात्र व्यवधानयुक्त सिंहासन पर बैठिये।

                        ( गोदि में बिठाकर )
उभौ - ( इच्छा न होने का नाटक करते हुए) हे राजन्! इतनी उदारता मत दिखाइए अथवा अधिक कुशलता नहीं करें।                                                                                                                                                                रामः - अत्यधिक शालीनता(अथवा भद्रता) बंद करो।                                                                                श्लोकः   - 

         अत्यधिक गुणी लोगों को भी छोटी उम्र के कारण बालक को लाड़ प्यार करना चाहिए। चन्द्रमा बालभाव के कारण ही भगवान शङ्कर के मस्तक का आभूूषण बनकर केतकी पुष्पों से निर्मित चूड़ा के रूप में विराजमान होते हैं।

रामः - यह आप दोनों के सौन्दर्य से उत्पन्न जिज्ञासा के कारण पुछ रहा हूँ- क्षत्रीय वंशीय पितामह सूर्य अथव चाँद में से आपके वंश का कर्त्ता कौन है?                                                                                                             लवः - भगवान सूर्य।                                                                                                                                 रामः - कैसे एक कुल में पैदा होने वाले हो गए?

विदूषकः - क्या दोनों का एक ही उत्तर है?
लवः - हम दोनों सगे भाई हैं।
रामः - शरीर की बनावट एक जैसे है। और उम्र में भी कोई अन्तर नहीं है।
लवः - हम दोनों जुड़वाँ हैं।
रामः - अभी ठीक है। क्या नाम है?
लवः - आर्य का वन्दना में लव एसा अपने आप को सुनाता हूँ। ( कुश को निर्देश कर) आर्य भी गुरु के चरण सेवा में…………………
कुशः - मैं भी आपने आप को कुश ऐसा कहता हूँ।

रामः - अरे! शिष्टाचार बहुत ही सुन्दर है। आपके गुरु के क्या नाम है?
लवः - अवश्य ही भगवान वाल्मीकि।
रामः - किस सम्बन्ध से?
लवः - उपनयन की संस्कारदीक्षा के द्वारा।
रामः - मैं आपके पिता का नाम जानना चाहता हूँ।
लवः - मैं इनका नाम नहीं जानता हूँ। इस तपोवन में उनका नाम कोई नहीं लेता है।
रामः - इतनी उदारता।                                                                                                                               कुशः - मैं उनका नाम जानता हूँ।                                                                                                               रामः - बताओ।                                                                                                                                           कुशः - दया रहित नाम….                                                                                                                               रामः - मित्र, निश्चित रूप से नाम अपूर्व है।

विदूषकः - (सोचकर) मैं पूछ रहा हूँ, दया रहित ऐसा कौन कहता है?
कुशः - माता।
विदूषकः - क्या गुस्से में वह ऐसा कहती है, अथवा स्वाभाविक रूप से?

कुशः - यदि हमारे लड़कपन के कारण किसी भी तरह के रूखा आचरण देखती है, तब इस प्रकार फटकारती है- क्रूर के पुत्रों, चंचलता मत करो।
विदूषकः - यदि इनके पिता का नाम क्रूर है और इनकी माता उनसे अपमानित है तथा घर से निकाल दिया गया हैै, इसलिए इसी वचन से पुत्रों को धमकाती है।

रामः - (मन में) एसे मुझ पर धिक्कार है। वह तपस्वी मेरे किए हुए अपराध के कारण अपनी संतान को इस प्रकार क्रोधपूर्ण अक्षरों से धमकाती है।
( आँसुओं सहित देखते हैं )
रामः - यह बहुत लम्बी और क्रूर प्रवास है। ( विदूषक को देखकर पास जा कर )
जिज्ञासा से युक्त मैं इनके माता को नाम से जानना चाहता हूँ। स्त्री के संबंध में टीका-टीप्पणी करना उचित नहीं,विशेषतः तपोवन में। तो यहाँ कौनसा उपाय है?
विदूषकः - ( पास जाकर ) मैं फिर से पुछता हूँ। क्या नाम है तुम्हारे माता का?
लवः - उनके दो नाम हैं।
विदूषकः - कैसे?
लवः - तपोवन निवासी देवी नाम से पुकारते हैं, भगवान वाल्मीकि वधू नाम से पुकारते हैं।
रामः - इधर आइए मित्र! थोड़ी देर के लिए।
विदूषकः - ( पास जाकर ) आप आदेश दीजिए।
रामः - इन दोनों कुमारों का और हमारे परिवार का वृत्तान्त एक जैसा हैै क्या ?
( परदे के पीछे )
इतना समय हो गया है रामायण गान का कार्य क्यों नहीं हुआ ?

उभौ - राजन्! गुरुजी का दूत हमको शीघ्रता कर रहा है।
रामः - मुझे भी मुनि के कार्य का सम्मान करना है।
श्लोकः - आप दोनों इस कथा का गान करने वाले हैं, तपोनिधि पुराण मुनि वाल्मीकि इस रचना के कवि हैं, धरती पर पहली बार अवतरित होनेवाला स्फुट वाणी का यह काव्य है और इसकी कथा कमलनाभि विष्णु से संबंध है और यह वो सेवकवृन्द निश्चय ही श्रोताओं को पवित्र और आनन्दित करने वाला है।
रामः - मित्र! यह मनुष्यों में सरस्वती का अपूर्व अवतार है, इसलिए मैं सुहृद लोगों में साधारण रूप से सुनना चाहता हूँ।

सभासदों को बुलाइए, लक्ष्मण को मेरे पास भेजिए, मैं भी इन दोनों के साथ बहुत समय तक बैठने के कारण हुई थकावट को विहार करके दूर करता हूँ।
( वह कहकर सभी निकल जाते हैं )

                                                          अभ्यासः


१. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-
क) रामाय कुशलवयोः कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः कीदृशः आसीत्?
उत्तरम्- रामाय कुशलवयोः कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः हृदयग्राही आसीत्।
ख) रामः लवकुशौ कुत्र उपवेशयितुम् कथयति?
उत्तरम्- रामः लवकुशौ अर्धासने उपवेशयितुम् कथयति।
ग) बालभावात् हिमकरः कुत्र विराजते?
उत्तरम्- बालभावात् हिमकरः शङ्करस्य मस्तके विराजते।
घ) कुशलवयोः वंशस्य कर्त्ता कः?
उत्तरम्- कुशलवयोः वंशस्य कर्त्ता भवति भगवन् सूर्यः।

ङ) केन सम्बन्धेन वाल्मीकिः कुशलवयोः गुरुः आसीत्?
उत्तरम्- उपनयन-संस्कारदीक्षया सम्बन्धेन वाल्मीकिः कुशलवयोः गुरुः आसीत्।
च) कुुशलवयोः मातरं वाल्मीकिः केन नाम्ना आह्वयति?
उत्तरम्- कुशलवयोः मातरं वाल्मीकिः वधूः इति नाम्ना आह्वयति।

२. रेखाङ्कितेषु पदेषु विभक्तिं तत्कारणं च उदाहरणानुसारं निर्दिशत-
                                                                   विभक्तिः                              तत्कारणम्
यथा - राजन्! अलम् अतिदाक्षिण्येन।              तृतीया                               " अलम्" योगे
क) रामः लवकुशौ आसनार्धम् उपवेशयति।      द्वितीया                          "उपवेशयति" योगे
ख) धिङ् माम् एवं भूतम्।                                द्वितीया                            " धिङ्" योगे
ग) अङ्कव्यवहितम् अध्यास्यतां सिंहासनम्।     द्वितीया                         "अध्यास्यतां" योगे
घ) अलम् अतिविस्तरेण।                                   तृतीया                            " अलम्" योगे
ङ) रामम् उपसृत्य प्रणम्य च।                            द्वितीया                         " उपसृत्य" योगे

३. यथानिर्देशम् उत्तरत -
क) " जानाम्यहं तस्य नामधेयम्" अस्मिन् वाक्ये कर्तृपदं किम्?
उत्तरम्- अस्मिन् वाक्ये "अहं " कर्तृपदम् अस्ति।
ख) " किं कुपिता एवं भणति उत प्रकृतिस्था" अस्मात् वाक्यात् " हर्षिता" इति पदस्य विपरीतार्थकपदं चित्वा लिखत।
उत्तरम्- अत्र "हर्षिता" इति पदस्य विपरीतार्थकपदं भवति "कुपिता"।

ग) विदूषकः ( उपसृत्य ) " आज्ञापयतु भवान्!" अत्र भवान् इति पदं कस्मै प्रयुक्तम्?
उत्तरम्- अत्र भवान् इति पदं श्रीरामाय प्रयुक्तम्।
घ) " तस्मादङ्क-व्यवहितम् अध्यास्याताम् सिंहासनम्" -अत्र क्रियापदं किम्?
उत्तरम्- अत्र क्रियापदं अध्यास्याताम् अस्ति।
ङ) " वयसस्तु न किञ्चदन्तरम्" - अत्र आयुषः इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम्?
उत्तरम्- अत्र " आयुषः" इत्यर्थे वयसः इति पदं प्रयुक्तम्।

४. अधोलिखितानि वाक्यानि कः कं प्रति कथयति-
                                                                         कः                              कम्
क) सव्यवधानं न चरित्रलोपाय।                         रामः                          लवकुुशौ
ख) किं कुपिता एवं भणति, उत प्रकृृतिस्था?      विदूषकः                       कुशलवौ

ग) जानाम्यहं तस्य नामधेयम्।                          कुशः                           रामम्
घ) तस्याः द्वे नाम्नी।                                        लवः                           विदूषकम् 
ङ) वयस्य! अपूर्वं खलु नामधेयम्।                       रामः                             कुशं
५. मञ्जूषातः पर्यायद्वयं चित्वा पदानां समक्षं लिखत-
क) हिमकरः      -   शशिः ,  निशाकरः
ख) सम्प्रति        -   इदानीम्,  अधुना
ग) समुदाचारः    -   शिष्टाचारः,  सदाचारः
घ) पशुपतिः       -     शिवः,   चन्द्रशेखरः
ङ) तनयः           -     सुतः,   पुत्रः
च) सहस्रदीधितिः   -    सूर्यः,  भानुः

६. अ)
           पदानि              प्रकृतिः        प्रत्ययः
यथा-  आसनम्   -       आस्      +     ल्युट् प्रत्ययः
क)      युक्तम्     -       युज्       +     क्त प्रत्ययः
ख)      भाजनम्   -       भाज्      +      ल्युट्
ग)      शालीनता  -      शालीन्    +      तल्

घ)      लालनीयः  -      लाल्      +      अनीयर्
ङ)       छदत्वम्    -       छद्       +       त्व
च)      संनिहितः   -     संनिधा    +      क्त
छ)    सम्माननीया   -   सम्मान   +     अनीयर्   +    टाप्

आ) विशेषण-विशेष्यपदानि योजयत-
            विशेषण पदानि      -         विशेष्य पदानि
 यथा-       श्लाघ्या             -                     कथा

  १)         उदात्तरम्यः         -        क)    समुदाचारः
  २)          अतिदीर्घः           -          घ)      प्रवासः
  ३)          समरूपः             -           ङ)     कुटुम्बवृत्तान्तः
  ४)          हृदयग्राही          -           ख)      स्पर्शः
  ५)          कुमारयोः           -           ग)      कुशलवयोः
७. ( क)  अधोलिखितपदेषु सन्धिं कुरुत-
क)  द्वयोः   +   अपि      -        द्वयोरपि
ख)   दौ       +    अपि       -        द्वावपि
ग)    कः     +     अत्र       -         कोऽत्र
घ)  अनभिज्ञः   +  अहम्    -      अनभिज्ञोऽहम्
ङ)   इति    +     आत्मानम्       - इत्यात्मानम्
(ख)    अधोलिखितपदेषु विच्छदं कुरुत-
क)   अहमप्येतयोः     -   अहम्   +  अपि     +      एतयोः
ख)    वयोऽनुरोधात्     -   वयोः   +      अनुरोधात्
ग)    समानाभिजनौ    -   समान    +    अभिजनौ
घ)    खल्वेतत्          -      खलु     +      एतत्


सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 उद्योगे नास्ति दारिद्रयं जपतो नास्ति पातकम्।  मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ।। अर्थात्,          उद्योगी /परिश्रमी का दारिद्रय नह...