वसन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृद्भाभिरीरितः।
कायाग्निं बाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून्।।
तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत्।
गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत्।।
अर्थात् --
वसन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से पिघल कर अर्थात् द्रव वन कर शरीर की अग्नि को कम् करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है।
इसलिए कफ को निकालने के लिए वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन क्रियाएँ करनी चाहिए। गुरु, अम्ल, स्निग्ध, मधुर वस्तुओंका सेवन और दिन में सोना त्याग करना चाहिए।