Sunday, August 11, 2024

NCERT SANSKRIT BHASHVATI CLASS 11 CHAPTER-5 SHUKASHAVAKODANTAH





         मध्यदेश की शोभा बढ़ाने वाली धरती की मेखला सदृश (विन्ध्य पर्वत पर लगा) विशाल 'विन्ध्य अरण्य'  है। और उसमें पम्पा नामक कमल का सरोवर है। उस (सरोवर) के पश्चिम तट पर बहुत पुराना शमी बृक्ष है। वहाँ एक कोटर में किसी भी तरह (या किसी प्रकार से) रहने वाले  पिता का मैं पुत्र के रूप में जन्म लिया। मेरे ही जन्म लेने की पीडा से मेरी माता की मृत्यु हो गई। किन्तु पिता पुत्र स्नेह के कारण शोक रोक कर मेरा रक्षणावेक्षण (या देखभाल) में लगगए। दूसरों के घोंसलों से गिरी हुई धानपौधों से चावलटुकडों को और तोतों के झूण्ड द्वारा  कतरे हुए फलों के टुकड़े लाकर मुझे दिए।  मेरा खाद्यावशेष को ही भोजन करते थे।
         परन्तु एकदिन सूर्योदय से पहले अचानक उस वन में शिकार सम्बन्धी कोलाहल ध्वनि उत्पन्न हुआ।
और उस ध्वनि को सुन कर शावक होने से काँपता हुआ मैं भय व्याकुल होकर पिता के पंखों के पुटक के भीतर चलागया । शिकार की ध्वनि से व्याकुल उस वन में शान्ति होने पर शीघ्र ही पिता के गोद से थोड़ा बाहर निकल कर कोटर में रह कर ही शिरवस्त्र फैला कर "यह क्या है" देखने का इच्छुक मैं गर्दन आगे बढ़ाते ही निकट में आते हुए शबरसैन्य को देखा। और उस(शवरसैन्य) के मध्य(बिच) में युवावस्था में उपस्थित शबरसेनापति को देखा।              मेरे मन में यह आया - "अरे इनका जीवन मोह से ग्रस्त है। शराव मांस आदि इनका आहार, शिकार इनका श्रम है, शास्त्र  सियारिनों का गरजना, पक्षीविषयक ज्ञान इनका प्रज्ञा(बुद्धि) है। जिस जंगल में रहते हैं उसका पूर्णरूप से जड़ सहित विनाश कर देते हैं। मैं ऐसा सोचते समय ही वो शबरसेनापति आकर उसी वृक्ष के नीचे छाया में सेवकों द्वारा लाए गये पत्तों के आसन पर बैठ गया। पानी पी कर और कमल का डंठल या रेशा खा कर श्रम दूर होने पर उठकर सभी सेनाओं केे साथ इच्छित दिशा को चलागया।

             परन्तु उनमें से एक बृद्धशबर उसी पेड़ के नीचे ही एक पल के लिए रुक गया । सेनापति के चले जाने पर जल्द ही चढ़ने की इच्छा से उस वृक्ष को जड से देखा। उस समय उसका उपस्थिति  भयभीत शुकदम्पतियों का प्राण से उडने जैसा ही था। निर्दयीजनों के लिए क्या ही दुष्कर है। क्योंकि वह उस वृक्ष को असावधानी से चढ़कर फल सदृश शुकशावकों को कोटरों से निकाल लिया। और प्राणहीन कर भूमि पर फेंक दिया।

               पिता भी विषादशून्य तथा आँसू के जल से भीगी हुई उस दृश्य को देखकर इधर उधर विखरे हुए पंखों को इकट्ठे कर मुझे ढक कर स्नेह परवश होते हुए मेरे रक्षा के लिए आकुल हो उठे। यह पाप भी क्रमशः अन्य शाखाओं से चलता  हुआ  मेरे कोटर द्वार में प्राप्त(पहुंचा) हुआ सर्प जैसे भयानक प्रसारित बाहु को वारवार चोंच से प्रहार करने से तथा कूजन करने से क्रुद्ध होकर पिता को प्राणहीन करदिया परन्तु मुझे छोटे होने पर किसी प्रकार से देख नहीं पाया। और मृत उनको धरती पर छोड़ दिया। मैं भी उनके पाँवों के मध्य गर्दन रखकर गोद के नीचेे निश्चल  रहकर हवा से एकत्रित सुखे पत्तों के ऊपर गिरा हुआ स्वयं को देखा। जब तक यह वृक्ष के अग्र भाग से अवतरण करता है, तब तक मैं मृत पिता के ऊपर से उठकर क्रूर जैसा स्नेहरस से अंजान भय से ही केवल आक्रान्त होता हुआ इधर उधर गिरता पडता निकटवर्ती तमालवृक्ष के मूलदेश में प्रवेश किया।

             पक्ष उत्पन्न न होने से वारवार मुख से गिरता हुआ मुस्किल से साँस लेता हुआ धूलिधूसरित होनेवाला घिसटता हुआ मेरे मन में उत्पन्न हुआ - इस जगत में सभी प्राणियों का जीवन से प्रियतर और कुछ नहीं है । पिता के इस प्रकार मृत्यु होने पर भी मैं जीना चाहता हूँ। मुझ जैसा अकरुण , अतिनिष्ठुर तथा अकृतज्ञ को धिक्। मेरा अन्तर(हृदय) निश्चत रूप से खराव है। पिता के द्वारा मेरे लिए जो किया गया वह मैं एकपद में भूल गया। (सभी प्रकार से/ )निस्सन्देह जीवन का आशा दुःखदायी हैैै। क्योंकि इस अवस्था में भी मुझे जल की अभिलाष(/ईच्छा) कष्ट देता है। दिवस का यह अवस्था अतिकष्ट दिखाई पडता है। धूप से तपी भूमि धूलवाली हो गई है।

            प्यास से शुखे हुए/ मुरझे हुए मेरे सभी अङ्ग थोडा चलने में भी समर्थ नहीं  हैं।( मैं) स्वयं शक्तिशाली नहीं हूँ। मेरे हृदय को कष्ट हो रहा हे। मेरे नेत्र अन्धकारता को प्राप्त हो रहे हैं॥ भाग्य निश्चय ही दुष्ट है,  मेरे  न चाहते हुए भी  मृत्यु आज हि संपन्न हो जाएगा। 

            मेरा ऐसे चिन्ता करते समय नहाने की इच्छा रखनेवाला हारित नामक जाबालि मुनि के पुत्र, मित्र और अन्य मुनिकुमारों के साथ उस रस्ते से उस पद्मसरोवर में पहुँचा। सज्जनों के मन(/ चित्त) प्रायशः स्वतःस्फूर्त मित्रतायुक्त तथा अतिदयालु(/ संवेदनशील) होते हैं। क्योंकि मेरे उस अवस्था/ दशा को देखकर वह मुझे सरोवर के किनारे ले गया। और स्वयं जलबिन्दु लाकर पिलाया। प्राणोदय होनेपर मुझे छाया में रखकर स्नानविधि किया। स्नानाभिषेक समाप्त होनेपर सभी मुनिकुमारों के समूह  से पीछा किया जाता हुआ मुझे लेकर (हारित ने) तपोवन चलागया।


         अभ्यासः

१.
   क)  मध्यदेशस्य अलङ्कारस्वरूपा भुवः मेखला इ़व विन्धयाटव्यां पम्पाभिधानं पद्मसरः आसीत्।
   ख) महाजीर्ण शाल्मलीबृक्षस्य एकस्मिन्कटोरे शुकः निवसति स्म।
   ग)  शबराणां जीवनं मोहप्रायम् वर्तते । 
   घ)   हारीतः जाबालिमुनेः सुतः आसीत्। 
   ङ) जीवनाशा सर्वथा खलीकरोति। 
   च) शुकस्य पिता शुककुलावदलितानि फलशकलानि तस्मै अदात्।
   छ) मृगयाध्वनिमाकर्ण्य शुकः पितुः पक्षपुटान्तरमविशत्।
   ज) शवरसेनापतिः प्रथमे  वयसि वर्त्तमानः आसीत्। 
   झ) अकरुणानाम्   दुष्करम्।
   ञ)  जरच्छवरः शुकस्य तातम् अपगतासुमकरोत्।

२.  पाठमाधृत्य बाणभट्टस्य गद्यशैल्याः वैशिष्ट्यानि लिखत।
उत्तरम्  -
                  बाणभट्ट अलङ्कृत-गद्यकाव्य युग के नायक हैं। उनके मत से विकट अक्षर बन्ध तथा अक्लिष्ट समास ही गद्य का आदर्श है  -
                
क) विकटाक्षरबन्धस्योदाहरणम्  -

                'शालिवल्लरीभ्यस्तण्डूलकणान्', 'मदुपभुक्तशेषमेवाकरोदशनम्', 'तमहमुपजातवेपथुरर्भकतया', 
'दिदृक्षुरभिमुखमापतच्छबरसैन्यमद्राक्षम्','भुक्तमृणालिकश्चोत्थायापगतश्रमः','मुहुर्मुहुर्दत्तचञ्चुप्रहारमुत्कूजन्तमाकृष्य','नातिदूरवर्तिनस्तमालपादपस्य',  'धिङ्मामकरुणमतिनिष्ठुरमकृतज्ञम्'।

ख)  अक्लिष्ट समासो कवेः गद्यशैल्याः अपरं वैशिष्ट्यं वर्तते । उदाहरणस्वरूपम् - 
             मध्यदेशालङ्कारभूता - मध्यश्च असौ देशः च - कर्मधारय समास
                                        तस्य अलङ्कारभूता   -  षष्ठी तत्पुरुष समास
            उपजातवेपथुः  -  उपजातः वेपथुः यस्य सः  -  बहुव्रीहि समासः

४.   अधोलिखितानां भावार्थं लिखत  -
   क)  'किमिव हि दुष्करमकरुणानाम्' । अर्थात् दयाहीन व्यक्ति के लिए क्या दुष्कर है। उक्त सूक्ति कवि  बाणभट्टविरचित "शुकशावकोदन्तः" पाठ से उद्धृत है।  पाठ में  एक बुद्ध शवर के द्वारा शुककुलों के प्रति किया गया अत्याचार के  सन्दर्भ में यह कथन है ।
       एकदिन सूर्योदय से पहले विन्ध्याटवी में शिकार करने के लिए शवरसैन्यों के साथ सेनापति पहुँचे।शिकार करने के बाद शाल्मली वृक्ष के नीचे श्रम/ क्लान्त(/थकावट) दूरकर उचित दिशा में चलेगए।परन्तु उनमें से एक
बृद्धशवर ने सेनापति के चले जाने पर उस वनस्पति को चढ़ने की इच्छा से पेड़ को नीचे से देखा। उस समय उसका उपस्थिति  भयभीत शुकदम्पतियों का प्राण से उडने जैसा ही था। निर्दयीजनों के लिए क्या ही दुष्कर है। क्योंकि वृद्धशवर ने असावधानी /लापरवाही से उस शाल्मलीवृक्ष को चढकर वृक्षकोटर से शुकशावकों को फलसदृश निर्दयतापूर्वक निकाला। और प्राणहीन कर भूमि पर  फेंक दिया। इसलिए कवि बाणभट्ट ने शुक के माध्यम से यह कहा है की निर्दयीजन के लिए क्या हि दुष्कर है। 
   ख)   नास्ति जीवितादन्यदभिमततरमिह जगति सर्वजन्तूनाम्।
   अर्थात् इस संसार में सभी प्राणिओं के जीवन से भिन्न प्रियतर और कुछ नहीं हैै। उपरोक्त उक्ति 
कविकुलशिरोमणि॑ महाकवि वाणभट्ट विरचित अद्वितीय कथात्मक रचना "कादम्वरी" के कथामुख भाग का एक अंश "शुकशावकोदन्तः" से उद्धृत है। शुकशावक कि यह आपवीती है। विन्ध्याटवि में स्थित पम्पा सरोवर के पास विशाल शाल्मली वृक्ष के एक कोटर में रहनेवाले पिता के पुत्र स्वरूप शुकशावक ने जन्म लिया। प्रसवबेदना से माता की मृत्यु हो गई। पिता शोक छोडकर  शुकशावक के पालनपोषण में जुटगए।
एकदिन सूर्योदय से पहले विन्ध्याटवी में शिकार करने के लिए शवरसैन्यों के साथ सेनापति पहुँचे।शिकार करने के बाद शाल्मली वृक्ष के नीचे श्रम/ क्लान्त(/थकावट) दूरकर उचित दिशा में चलेगए। परन्तु उनमें से एक
बृद्धशवर ने सेनापति के चले जाने पर असावधानी /लापरवाही से उस शाल्मलीवृक्ष को चढकर वृक्षकोटर से शुकशावकों को फलसदृश निर्दयतापूर्वक निकाला। और प्राणहीन कर भूमि पर  फेंक दिया  पिता भी विषादशून्य तथा आँसू के जल से भीगी हुई उस दृश्य को देखकर इधर उधर विखरे हुए पंखों को इकट्ठे कर मुझे ढक कर स्नेह परवश होते हुए उस के रक्षा के लिए आकुल हो उठे। यह पाप भी क्रमशः अन्य शाखाओं से चलता  हुआ शुकशावक के कोटर द्वार में प्राप्त(पहुंचा) हुआ सर्प जैसे भयानक प्रसारित बाहु को वारवार चोंच से प्रहार करने से तथा कूजन करने से क्रुद्ध होकर पिता को प्राणहीन करदिया परन्तु मुझे छोटे होने पर किसी प्रकार से देख नहीं पाया। और मृत उनको धरती पर छोड़ दिया। वह भी उनके पाँवों के मध्य गर्दन रखकर गोद के नीचेे निश्चल  रहकर हवा से एकत्रित सुखे पत्तों के ऊपर गिरा हुआ स्वयं को देखा। जब तक यह वृक्ष के अग्र भाग से अवतरण करता है, तब तक शुकशावक  मृत पिता के ऊपर से उठकर क्रूर जैसा स्नेहरस से अंजान भय से ही केवल आक्रान्त होता हुआ इधर उधर गिरता पडता निकटवर्ती तमालवृक्ष के मूलदेश में प्रवेश किया।
             पक्ष उत्पन्न न होने से वारवार मुख से गिरता हुआ मुस्किल से साँस लेता हुआ धूलिधूसरित होनेवाला घिसटता हुआ शुकशावक के मन में इसलिए यह उत्पन्न हुआ की - इस जगत में सभी प्राणियों का 'जीवन' से प्रियतर और कुछ नहीं है ।  



  
घ)   सज्जनों का चित्त   प्रायशः कारणरहित मित्रता  और अत्यधिक करुणा से पूर्ण होता है। क्योंकि मुनिकुमार हारीत ने शुकशावक के उस अवस्था को देखकर वह उस को सरोवर के किनारे ले गया। और स्वयं जलबिन्दु लाकर पिलाया। प्राणोदय होनेपर उस को छाया में रखकर स्नानविधि किया। स्नानाभिषेक समाप्त होनेपर सभी मुनिकुमारों के समूह  से पीछा किया जाता हुआ उसे लेकर (हारित ने) तपोवन चलागया। 



६. 
      १) समाहृत्य  -   सम्+आ+हृ+ल्यप्
      २) आकर्ण्य -  आ+कर्ण्+ ल्यप्
      ३) निष्क्रम्य -  निः + क्रम् + ल्यप्
      ४) विक्षिपन् -  वि + क्षिप् + शतृन्
       ५.   उपरतम्  -  उप +रम् + क्त 

        ६.   गृहीत्वा - ग्रह्+ क्त्वाच्

        ७.  अभिलाषः - अभि + लष् + स्यञ्

          ८.  संचरमाणः  -  सम् + चर् + शानच्


७.

   क) अस्ति भुवो मेखलेव विन्ध्याटवी नाम।

       ख)  ममैव जायमानस्य प्रसववेदनया मे जननी  मृता।

     ग)  अहो मोहप्रायम एतेषां जीवितम्।

     घ)  तातः तद विषादशून्यां अश्रुजलप्लुतां दृशमवलोक्य इतस्ततो विक्षिपन पक्षसंपुटेन मां आच्छाद्य स्नेहपरवशो  मद्रक्षणे आकुलः अभवत्।




समाप्तम्

     


Friday, August 9, 2024

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)



                                                        नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः। 

                                                                    आमृत्योः श्रियमन्विच्छेत् नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥

अर्थात्  -  

                 पितृपुरुषों के उपार्जित धन न होने के कारण स्वयं को अनादर नहीं करना चाहीए। और भी मृत्यु तक अपनी समृद्धि के लिए प्रयास करना चाहीए; क्योंकि धनसंपदा दुर्लभ नहीं है(अर्थात् सुलभ है) ऐसा मानना उचित है। 

Meaning  -  One should not disrespect himself/herself, not because of having ancestors' property. And one should try for ones own prosperity till death. As wealth is not inaccessible - should believe/accept this.

Wednesday, July 31, 2024

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)



 अत्यम्वुपानान्न विपच्यतेऽन्न

मनम्वुपानाच्च स एव दोषः।

तस्मान्नरो वन्हिविवर्धनार्थं

मुहुर्मुहुुर्वारि पिवेदभूरि॥


अर्थात् - 

          अधिक जल पिने से भोजन नहीं पचता है। पानी बिलकुल न पीने पर भी वही दोष होता है। इसलिए व्यक्ति भोजन पचाने के क्षमता की(/उदराग्नि के) वृद्धि के लिए बार बार थोडा थोडा पानी पीना चाहीये।

Meaning   -

          By drinking more water food does not get digested. Similar situation arises when you don't drink water . So one should drink water little by little every now and then to improve the digestive capacity.


Tuesday, July 30, 2024

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)



पातितोऽपि कराघातैरुत्पतत्येव कन्दुकः।

प्रायेण हि सुवृतानामस्थायिन्यो विपत्तयः॥

अर्थात् - 

                    भूमिस्थ होने पर भी हाथ के आघात से गेन्द पुनः उपर उठ जाता है। उसी प्रकार उत्तम चरित्रवान् व्यक्तियों के विपत्तियां प्रायशः अस्थायी होते हैं॥

Meaning -

        As being on the ground, the ball goes up again by the striking of hands.  Similarly adversities/misfortunes of the well-behaved/virtuous persons are mostly not long lasting. 





Thursday, July 18, 2024

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)



*            किमत्र चित्रं यत् सन्तः परानुग्रह तत्पराः।                                                                                                                         न ही स्वदेहशैत्याय जायन्ते चन्दनद्रुमाः॥

अर्थात्  -

          सज्जन व्यक्ति दुसरों को दया दिखाने ने के लिए(अथवा अनुग्रह करने के लिए) सर्वदा तत्पर(प्रस्तुत) रहते हैं, इसमें आश्चर्य क्या है! चन्दन वृक्ष अपने शरीर(स्वयं)को ही शीतल(ठंडा)करने के लिए उत्पन्न नहीं होते हैं॥

 Meaning -

         Learned persons always eager/ready to be kind to others, what is surprising in this! All the sandalwood trees are not produced / generated to cold themselves.

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)



 *    दिनान्ते च पिवेत् दुग्धं निशान्ते च पिवेत् पयः।

           भोजनान्ते पिवेत्तक्रं किं वैद्येन प्रयोजनम्॥

अर्थात्  - 

 दिन के अन्त(रात) में दुध पीना चाहीए, रात्रि के अवसान(सुबह) में पानी पीना चाहीए और भोजन के बाद छाछ पीना चाहीए। एसे करने से व्यक्ति का वैद्य का आवश्यक नहीं होता है।

Wednesday, July 17, 2024

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

                                                               


यो यत्र कुशलः कार्ये तं तत्र विनियोजयेत्।

कर्मस्वदृष्टकर्मा यः शास्त्रज्ञोऽपि विमुह्यति॥

अर्थात् - 

               जो जिस कार्य में प्रवीण/ निपुण है, उसको उसी कार्य में नियुक्त करना चाहीए। कर्त्तव्य कार्य में जो अनुभवी नहीं है, शास्त्र पढकर ज्ञानी होने पर भी उसको उस कार्य में नियुक्त नहीं करना चाहीए। 

Meaning -

                A skilled person in a particular activity, should be engaged in that work only. Inexperienced person in any activity should not be engaged in that work, being knowledgeous/wise by reading books.

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 उद्योगे नास्ति दारिद्रयं जपतो नास्ति पातकम्।  मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ।। अर्थात्,          उद्योगी /परिश्रमी का दारिद्रय नह...