Sunday, December 28, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 मातृपितृकृताभ्यासो गुणितामेति बालकः।

न गर्भच्युतिमात्रेण पुत्रो भवति पण्डितः।।

अर्थात्,

    माता-पिता के अभ्यास कराने पर ही बालक विद्वान् होता है। गर्भ से निकलते ही पुत्र विद्वान् नहीं हो जाता है।

Meaning --

The child becomes intelligent because of proper guidance given by the parents. The child is never intelligent right after coming out of the womb.

Saturday, December 27, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 संहतिः श्रेयसी पुंसां स्वकुलैरल्फकैरपि।

तुषेणापि परित्यक्ता न प्ररोहन्ति तण्डुलाः।।

अर्थात्,

    अपने कुल के छोटे व्यक्तियों का समूह भी कल्याणकारी  होता है। जैसे भूसा मात्र से अलग हो जाने पर चावल फिर अंकुरित नहीं होते।

Thursday, December 25, 2025

सुभाषितम्(Noble Thoughts)

 गुणेष्वेव हि कर्तव्यः प्रयत्नः पुरुषैः सदा। 

गुणयुक्तो दरिद्रोऽपि नेश्वरैरगुणै समः।। 

अर्थात्, 

     व्यक्ति सर्वदा सद्गुणोंको ग्रहण करने में प्रयत्न करना चाहिए। दरिद्र होने पर भी व्यक्ति यदि गुण के अधिकारी है, तो गुणहीन नृपति अथवा धनाढ्य व्यक्ति से भी अधिक सम्मानित होता है। 


Meaning --

    People should always try to accept virtues. One even being poor if having virtues is mostly respected than virtueless king or richest person. 

    

Wednesday, December 24, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 यस्तु संचरते देशान् यस्तु सेवेत पण्डितान्।

तस्य विस्तारिता बुद्धि स्तैलविन्दुरिवाम्भसि।।

अर्थात्,

       जो व्यक्ति अनेक देश भ्रमण करता है और विद्वानों का सेवा करता है उसका बुद्धि पानी में तैलविन्दु सदृश विस्तारित हो जाता है।

Meaning --

The one who travels several countries and serves the intelligents, his intelligence expands just like the oil drop spreads in the water.


Tuesday, December 23, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 ग्रीष्मबर्जेषु कालेषु दिवा स्वापो निषिद्ध्यते।

उचितो हि दिवा स्वापो यतोनित्यः शरीरिणाम्।।

अर्थात्, 

     मनुष्यों का निद्रा दैनन्दिन कर्तव्य है। परन्तु ग्रीष्मकाल को छोड़कर अन्य समय में दिन में सोना निषिद्ध है।

Meaning --

     Sleeping is the daily routine of human beings. But sleeping in the day time is forbidden except in the days of Summer.


Monday, December 22, 2025

Comparative and Superlative Degrees

 Words.            Comparative.        Superlative 

१.पृथु(wide)        प्रथीयस्                   प्रथिष्ठ

२.प्रिय (dear )      प्रेयस्                  प्रेष्ठ

३.बाढ(firm, strong)  साधीयस्          साधीष्ठ

४.बहु/बह्वी (much)    भूयस्               भूयिष्ठ 

५. बहुल (thick)        बहीयस्            बहिष्ठ

६. महत्                   महीयस्           महिष्ठ 

७. मृदु(soft)            म्रदीयस्             म्रदिष्ठ

८. स्वल्प(very small)     स्वल्पीयस्      स्वल्पिष्ठ 

९. स्वादु(taste)            स्वादीयस्          स्वादिष्ठ 

१०. वृंदार (beautiful)       वृंदीयस्            वृंदिष्ठ

११. प्रशस्य(praiseworthy,    श्रेयस्/ज्यायस्    श्रेष्ठ/ज्येष्ठ 

                   excellent)

१२. भृश(strong,mighty,       भ्रशीयश्            भ्रशिष्ठ

                very much)


Saturday, December 20, 2025

लोकानां/ भुवनानां नामानि(Divisions of the Universe)

 साधारणतः लोकत्रयः अथवा भुवनत्रयः इति कथ्यन्ते :-

   स्वर्गलोकः,  पृथ्वीलोकः पाताललोकश्च। 

परन्तु मुख्यतः चतुर्दशलोकाः भुवनानि वा सन्ति। ते भवन्ति :-

१. व्रह्मलोकः सत्यलोकः वा

२.  तपर्लोकः

३.  जनर्लोकः

४.  महर्लोकः

५.  स्वर्लोकः 

६.  भुवर्लोकः

७.  भूर्लोकः.

८.   अतल 

९.   वितल 

१०.   सुतल 

११.  रसातल

१२.   तलातल 


 १३. महातल 


१४.  पाताल

Friday, December 19, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 यस्य मित्रेण सम्भाषो यस्य मित्रेण संस्थितिः।

यस्य मित्रेण संलपस्ततो नास्तीह पुण्यवान्।।

अर्थात्,

       जिस व्यक्ति का मित्र के साथ वार्तालाप है, जिस का मित्रों के साथ वास है और जिसका मित्र के साथ अच्छे से गोष्ठी/मेल-मिलाप होता है, उससे बढ़कर पुण्यवान् इस संसार में दूसरा कोई नहीं है।

Wednesday, December 17, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रितयं हितम्।

कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः।।

अर्थात्,

माता, पिता और मित्र ये तीनों स्वभाव से ही हितकारी होते हैं और अन्य लोग प्रयोजनवश या किसी कारण - विशेष से हितकारी होते हैं।

Meaning -

Mother, father and friend these three are beneficial by nature and others are beneficial to any purpose or for some reason .

Tuesday, December 16, 2025

विपरीतार्थक पदानि(Opposite Words)

 पदानि            विपरीतार्थकपदानि 

अपधर्मः           परधर्मः 

अनुलोमः           प्रतिलोमः 

अनुरागः             अपरागः 

पुरतः            पृष्ठतः 

स्वकीयम्           परकीयम् 

भीतिः              साहसः 

अनुरक्तिः          विरक्तिः 

गमनम्          आगमनम् 

आरोहणम्        अवरोहणम् 

उष्णम्            शीतम् 

सीदति            प्रसीदति 

तप्तानाम्         शीतानाम् 

गुरु                  लघु 

अल्पम्              अधिकम् 

Monday, December 15, 2025

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 ऋतुचर्या तृतीयःपाठः

 


हेमन्तः 

        दूध,दही,मावा आदि एवं गन्ने के रस से वनी खीर, राब, शर्करा आदि से वनी वस्तुएँ, वसा, तैल और नये चावल खाने चाहिये। हेमन्त काल में स्नान आदि में गरम पानी का व्यवहार करने वाले की आयु कम् नहीं होती।


लघु गुणवाले एवं वायुप्रकोपक आहार विहार हेमन्त ऋतु में छोड़ देनी चाहिए। एवं सामने की वायु, थोड़ा खाना और जौ के पानी से निर्मित पदार्थ को छोड़ देना चाहिए। 


शिशिरः


           हेमन्त और शिशिर ऋतुएँ प्रायः समान हैं। परन्तु शिशिर काल में हेमन्त से थोड़ा विशेषता यह है कि शिशिर का आदान काल होने से वायु रुखा होता है एवं बादल,वायु और वरसात अधिक होने से इस ऋतु में शीत अधिक होता है। 


इसलिए शिशिर ऋतु में हेमन्त की सम्पूर्ण बिधि पालन करनी चाहिए। परन्तु शिशिर में हेमन्त से अधिक गरम और वायुरहित घरों में रहें। 


शिशिर काल में कड़ुवे, तिक्त , कसैले, वायुकारक और लघु तथा ठण्डे खानपान को छोड़ दे। 


वसन्त ऋतु  -

वसन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से पिघल कर अर्थात् द्रव वन कर शरीर की अग्नि को कम् करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है।

 इसलिए कफ को निकालने के लिए वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन आदि क्रियाएँ करनी चाहिए। 

ग्रीष्म ऋतु


ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता है। इसलिए इस समय मीठा, ठंडा द्रव पदार्थ, चिकने खानपान हितकारी है। 


घी और दूध के साथ चावल खाने से ग्रीष्म ऋतु में कष्ट नहीं होता। नमकीन, खट्टे, कडुवे और गरम रस पदार्थ तथा व्यायाम इस ऋतु में छोड़ देना चाहिए। 


वर्षा ऋतु 


ग्रीष्म ऋतु में   सूर्य की प्रचण्ड  गर्मी से भूमि के तप जाने से , वर्षा में वरसात पड़ने से पानी के स्पर्ष से भूमि से गरम भाप निकलने से तीनों दोष कुपित हो जाते हैं। इसी प्रकार वादलों के वरसने से वात, कफ कुपित होते हैं, जल अम्लपाक होने से पित्त कुपित होता है। वर्षाऋतु में अग्नि-बल के क्षीण होने से वात, पित्त, कफ तीनों दोष कुपित होते हैं। 

वरसात के दिनों में जिस दिन वायु और वरसात जोर का पड़ रहा हो और सर्दी बहुत हो ,उस दिन वायु को शांत करने के लिये अम्ल, लवण रस तथा स्नेह घी जिस अन्न में स्पष्ट दिखता हो उसे बिशेष करके खाना चाहिये। 


शरद् ऋतु


वर्षा ऋतु में काल स्वभाव में सञ्चित हुआ पित्त शरद् काल में बादलों के हट जाने से  सूर्य की किरणों के ताप से सहसा कुपित होता है। 

इसलिए इस ऋतु में मधुर, लघु, शीत और तिक्त आदि पित्तशामक खानपान परिमाण में खाना चाहिये ।

शरत्काल में रात्रि के प्रथम प्रहर में चन्द्रमा की किरणों का सेवन करना तथा शरत्कालीन मालाएँ और निर्मल वस्त्र प्रशंसनीय है। 


अभ्यासः

१.

    क) अयं पाठः 'चरकसंहिता'इति ग्रन्थात् संकलितः महर्षि चरकश्च तस्य प्रणेता।

ख)  षड्ऋतवः सन्ति ‌। ग्रीष्मश्च वर्षाशरद्हेमन्तशिशिरो बसन्तश्च एतानि भवन्ति तेषां नामानि।

ग)  कटुतिक्तकषायाणि वातलानि लघूनि शीतलानि च अन्नपानानि शिशिरे वर्जनीयम्।

च) वसन्ते कायाग्निं निचितः श्लेष्मा बाथते।

ङ) ग्रीष्मे  स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धञ्च अन्नपानं हितम् भवति।

च)  वर्षा ऋतौ पवनादयः कुप्यन्ति।

छ) शरदृतौ पित्तप्रशमनाय मधुरं लघु शीतं सतिक्तकञ्च अन्नपानं मात्रया सेव्यमस्ति।

ज) हिमागमे वातलानि लघूनि च अन्नपानानि वर्जयेत्।

झ) शिशिरे निवातं अधिकमुष्णं गृहम् आश्रयेत्।

ञ) वसन्ते वमनादीनि कर्माणि कारयेत्।

ट) ग्रीष्मे व्यायामं वर्जयेत्।

ठ) शरत्काले प्रदोषे इन्दुरश्मयः प्रशस्यन्ते।

क) हिमागमे वातलानि लघूनि च अन्नपानानि वर्जयेत्।

ख) शिशिरे निवातं अधिकमुष्णं च गृहमाश्रयेत्।

ग) वसन्ते दिवास्वप्नं वर्जयेत्।

घ) ग्रीष्मे घृतं पयः सशाल्यन्नं भजन् नरः न सीदति।

ङ) शरत्काले विमलानि वासांसि प्रशस्यन्ते।

५.

           विग्रह पदानि         समस्तपदानि 

क)    अन्नानि च पानानि च  -   अन्नपानानि 

ख) हेमन्तः च शिशिरः च  - हेमन्तशिशिरौ 

ग)  हिमस्य आगमे -     हिमागमे

घ) कायस्य अग्निम् - कायाग्निम्

ङ) अर्कस्य रश्मिभिः  - अर्करश्मिभिः

६. अर्थमेलनं क्रियताम् -

               पदानि            अर्थाः

क)      श्लेष्मा                कफ 

ख)।     रौक्षम्                    रूखापन

ग)        निवातम्              हवारहित

घ)         निचितः                 बढ़ा हुआ 

ङ)।       पवनः                  वात

च)।        गुरुः                    भारी

छ)         लघुः                   हल्का 

ज)         वासांसि               वस्त्र 

७.

           पदानि            विपरीतार्थकपदानि

           उष्णम्                शीतम् 

           सीदति             प्रसीदति

           तप्तानाम्            शीतानाम्

           गुरु                    लघु 

           अल्पम्              अधिकम् 

८.

        हेमन्त+ठक् = हेमन्तः

       स्निह् + क्त  = स्निग्ध 

       भुज्  + तव्यत् =  भोक्तव्यम् 

        सेव् + यत्   =   सेव्यम्

       शरद् + अण्  =  शरदः

Sunday, December 14, 2025

सुभाषितम्( NOBLE THOUGHTS)

 नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम्।

आपत्स्वपि न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः।।

अर्थात्, 

    विद्वानों के सदृश बुद्धिवाले अर्थात् चतुर मनुष्य दुर्लभ वस्तु की इच्छा नहीं रखते और नष्ट हुए का चिन्ता नहीं करते एवं आपत्ति आने पर घवराते नहीं हैं।

Wednesday, December 10, 2025

सुभाषितम्(Noble Thoughts)

 अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।

तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्वध्यन्ते मत्तदन्तिनः।।

अर्थात्,

छोटी और तुच्छ वस्तु के समुदाय से भी एक बड़े कार्य की सिद्धि हो जाती है। जैसे घासों के समूह से बनी रस्सियों से मदोन्मत्त गजराज भी बांधे जाते हैं।

Meaning -

The accomplishment of a great work happens even through gathering of small things. Just like an intoxicated elephant who is controlled by the thread which is made from the collection of grass.

Tuesday, December 9, 2025

सुभाषितम्(Noble Thought)

 शरीरस्य गुणानाञ्च दूरमत्यन्तमन्तरम्‌‌।

शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः।।

अर्थात्,

शरीर और दयादाक्षिण्यादि गुणों में बहुत दूर का अन्तर है। क्योंकि शरीर क्षणमात्रमें नष्ट हो जाता है और दयादाक्षिण्यादि गुण महाप्रलयतक स्थिर रहनेवाले हैं। अतः यश की रक्षा सर्वथा योग्य और उचित है।

Meaning -

     There is large difference between body and qualities of mercy and kindness etc. As body demolished in Just a while whereas the qualities like mercy, kindness etc. will sustain till great dissolution or deluge.

Monday, December 8, 2025

सुभाषितम् (Noble Thought)

 



सुमहान्त्यपि शास्त्राणि धारयन्तो बहुश्रुताः।

छेतारः संशयानाञ्च क्लिश्यन्ते लोभमोहिताः।।


अर्थात्, 

     अनेक शास्त्रों को पढ़ने तथा सुननेवाले और दूसरे के सन्देहों को दूर करनेवाले विद्वान् भी लोभवश नष्टज्ञान होकर  दुःखी होते हैं।

ध्वनिः (Noise )

 


पिंजोला  - Rustling noise of leaves 

भंभारवः  -the lowing /mooing of a cow

स्फूर्जः  -  the crashing sound of a thunder-clap

घुर्घुरी -  the grunting of a hog 

हक्कः  -  the calling of elephants 

Saturday, December 6, 2025

व्यावहारिक दृश्यावली(SHORT STORY)

 

सायं कालः। तुङ्ग प्रासादानां सम्मुखे एकः क्रीडाप्रान्तरः अस्ति। तत्र क्रीडतां बालकानां शिशूनां च कोलाहलथ्वनिः श्रुयते। जनाः अपि तत्र भ्रमन्ति स्म। तस्मिन्  समये एका बालिका महाविद्यालयतः प्रतियानं/ प्रतिवर्तनं करोति स्म। यदा तस्याः प्रासादस्य समीपे उपसर्पणं भवति तदा प्रान्तरे क्रीडन्तं तस्य भ्रातरं  दृष्टवा तं आह्वयति सा। 

बालिका - अये भ्रात! विलंबं अभवत्। गृहं चलावः। 

   कतिवारं आह्वयति सा। तथापि  तेन न श्रुतम्। 

 तत्र विचरतः/भ्राम्यमाणेकस्य प्रतिवेशीमहोदयस्य कर्कराटुः भगिनीभ्रातरयोः उपरि अपतत्। सः बालां अवदत् , 'तव भ्राता संप्रति न गमिष्यति तया साकम्। त्वं एकाकी भवनं गच्छ'। 

बालिका - पितृव्य महोदय! तस्य मनोभावं कथं भवता दृढतया ज्ञातम् ? 

प्रतिवेशी महोदयः  - अहसन् , आह्वय तं पुनरेकवारम्।

 ( उच्चैः सा आह्वयति) 

बालिका -- भो भ्रात! विलम्बं अभवत्। आगच्छ त्वं मया साकम्। 

भ्राता --  (भ्रुकुञ्चनं कृत्वा शरीरं च आन्दोलयित्वा) नहि नहि। अहं न आगमिष्यामि अधुना इत्युक्तवा सः क्रीडायाम् व्यस्तः अभवत्।

बालिका - पितृव्य महाशय! भवता सत्यमुक्तम्। एषः नागच्छति। भ्रातरि विषये भवतः एतावत् दृढविश्वासः कथमस्ति? कृपया कथयतु।

प्रतिवेशीमहोदयः - (स्मितहासं कृत्वा) 

                  अनुभूत्यारेव कथयामि। एषः बालसुलभ व्यवहारः। मया अपि बाल्यकाले एतादृशं कार्यं कृतं वहुवारम्। उभयोः क्रियया मया आनन्दं अनुभूतम् इत्युक्त्वा भ्रमणरतोऽभवत्। 

बाला अपि हर्षोऽनुभवत्यैव भवनमगच्छत्।

Friday, November 28, 2025

Spices

  


औषरं   -  Rock salt 

वसिरं   -   Sea salt 

द्राविडकं  -  Black salt 

अजाजिः  -  Cumin seed 

कृष्णिका  -  Black mustard 

हरिद्रा  -   Turmeric 


Tuesday, November 25, 2025

Noble thought

 

उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम्।
शूरं कृतज्ञं दृढ़सौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः‍‌‌।।

अर्थात् :
    जो उत्साही, आलस्यरहित, कार्य करने के उपायों को जानने वाले तथा बुरे विषयों में अनासक्त , वीर, कृतज्ञ और सच्ची मित्रता वाले हैं, ऐसे मनुष्य के घर स्थिर रहने के लिए लक्ष्मी स्वयं ‌ही जाती हैं।

Meaning -

         One who is enthusiastic, active or diligent , known to the method or solution of deed or action , uninterested to bad things , brave, grateful or thankful and indeed friends - Goddess Lakshmi automatically goes to those persons house to be stable.

Sunday, November 23, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 

परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।

वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्।।


  परोक्ष में काम बिगाड़ने वाले और सामने प्रिय बोलने वाले मित्र को मुखपर  दूधवाले विष(जहर) से भरे घड़े के समान छोड़ देना चाहिए।


Thursday, November 20, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 

अनाहूतो विशेद् यस्तु अपृष्टो वहुभाषते।

आत्मानं मन्यते प्रीतं भूपालस्य स दुर्मतिः॥

अर्थात्  -

          विना बुलाए जो पास आता है, विना पुछे जो वहुत कुछ कहता है, जो स्वयं को शासक का अतिप्रिय मानता है, वो निर्वोध है।

Meaning : -

         One who comes without calling, the one who speaks more without being asked and the one who feels that he is favored by the ruler is a fool.

Tuesday, November 18, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 वचस्तत्रैव वक्तव्यं यत्रोक्तं सफलं भवेत्। 

स्थायी भवति चात्यन्तं रंगः शुक्लपट्टे यथा।। 

अर्थात्, 
           जहाँ बोलने पर वचन सफल होगा, उस स्थान में अपनी वात रखनी चाहीये। जैसे सफेद वस्त्र में रंग अत्यधिक  स्थायी होता है ।।

Meaning :

          One should put their words in that place where the purpose of sayings would be successful. Just like colors are more visible and permanent on white clothes rather on any other. 

Monday, November 17, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 मृगा मृगैः संगमनु्व्रजन्ति

गावश्च गोभिस्तुरगास्तुरंगैः।

मूर्खाश्च मूर्खैः सुधियः सुधीभिः

समानशील व्यसनेषु सख्यम्।।


अर्थात्,  

        हिरण हिरणों के साथ, गाय गायों के साथ, अश्व अश्वों के साथ, मुर्ख मुर्खों के साथ और पण्डित पण्डितों के साथ मिलकर रहना चाहते हैं। इससे ज्ञात होता है कि  समान स्वभाव और समान व्यसनवाले प्राणीयों का परस्पर मित्रता होता है। 


Meaning --


         Deer with deer, cow with cows, horse with horses, fool with fools and learned with learned people live together. This meant that the creatures of same nature and of same  conduct have friendships with each other.

Monday, November 3, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

अर्थात् -
           " यह अपना अथवा पराया" -ऐसा विचार क्षुद्र हृदय वाले व्यक्तियों का है। परंतु उदार हृदय वाले व्यक्तियों के लिए " केवल पृथ्वी एक परिवार है"।

Meaning -

             "This is mine or others" - this consideration or thought is of narrow minded people. But for noble minded/magnanimous persons "only the Earth is one family ".

Tuesday, October 28, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 जलबिन्दूनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। 

स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च।। 

अर्थात्  --  
            जल की एक एक बूंद  गिरने से जैसे धीरे धीरे घड़ा भर जाता है वही कारण सव प्रकारकी विद्याओं का, धनका और धर्मका भी है ।

Meaning  --

         Just like with every drop of water the pot gets fill slowly, the same applies on acquiring  education, richness and righteousness also.

Sunday, October 5, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 कटुतिक्तकषायाणि वातलानि लघूनि च। 

वर्जयेदन्नपानानि शिशिरे शीतलानि च।। 

   अर्थात् -
            शिशिर काल में  कड़ुवे, तिक्त, कसैले, वायुकारक और लघु तथा ठण्डे खानपानको छोड़ देना चाहिए। 
Meaning -
            In winter one should abstain from eating food like pungent, bitter, astringent, aerated food and light and cold food.

          

Saturday, August 9, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।

चत्वारि तस्य बर्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्॥(महर्षि मनुः)

 अर्थ  -    

          प्रतिदिन नियमितरूपसे गुरुजनों को प्रणामक़रनेवाले तथा वयस्कज्ञानीजनों का सेवा करनेवाले व्यक्ति का आयु, विद्या, कीर्ति और शक्ति - इन चारों का वृद्धि होती है।


Monday, August 4, 2025

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 

श्रुतिर्विभिन्नाः स्मृतयश्च भिन्ना 

नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम्।

धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां

महाजनो येन गतः स पन्थाः।।
 
अर्थः -
           वेद वाक्य अलग अलग हैं। स्मृतिवाक्य भी भिन्न हैं। कोई भी एक ही मुनि का वचन प्रमाण नहीं होता है। धर्म के तत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म है। इसलिए महान् व्यक्तियों के द्वारा प्रदर्शित चिराचरित प्रथा ही उत्कृष्ट मार्ग है। 

Meaning  -

                    There are differences in the sayings of Vedas. The statements of Smriti Shastra are also different. The truth of righteousness is very much subtle or deep. So the classical traditions and customs are the best path which shown by the great persons. 

Thursday, July 31, 2025

NCERT SANSKRIT BHASHWATI Claas 11 Chapter - 2 सूक्तिसुधा

                                     सूक्तिसुधा   


१.   जिस देश में आदर सम्मान नहीं और न ही आजीविका का कोई साधन है, जहाँ कोई बन्धु-बान्धव,रिश्तेदार भी नहीं तथा किसी प्रकार की विद्या और गुणों की प्राप्ति की संभावना नहीं, ऐसे देश को छोड़ देना चाहिए। 
२.  किसी रोग से पीड़ित होने पर, दुख आने पर, अकाल पड़ने पर , शत्रृ  की ओर से संकट आने पर, राजसभा में, श्मशान अथवा किसी की मृत्यु के समय जो व्यक्ति साथ नहीं छोड़ता, वास्तव में वही प्रकृत बन्धु है। 
३. बलवानोंको अधिक बोझ क्या है? और उद्योग करने वालों को क्या दूर है? विद्यावानोंको विदेश क्या है? और मीठे बोलने वालों का शत्रु कौन है? 
४.  सुवर्ण के साथ होने से जैसे कांच की मरकत मणि सदृश शोभा हो जाती है वैसे ही सज्जनों के संगति से मूर्ख भी चतुर  वन जाता है। 
५.  पुष्प के गुच्छे के समान उदार मनुष्य की दो तरह की प्रकृति होती है कि या तो सबके शिर पर रहे अथवा वन में नष्ट हो जाए। 
 ६.  पण्डित को परोपकार के लिए धन और प्राण छोड़ देने चाहिये। विनाश निश्चय है अतः उत्तम कार्य के लिए प्राणों का त्याग श्रेष्ठ है। 
७.     इस संसार में अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष को नींद, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता ये छः अवगुण छोड़ देनी चाहिए। 
८.  हे राजा! नित्य धन की प्राप्ति, आरोग्यता, प्रियतमा और मधुरभाषिणी स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र और धन उत्पन्न करने वाली विद्या - संसार का ये छः सुख हैं। 



                          अभ्यासः

१.  
  क)  अयं पाठः चाणक्यनीति-हितोपदेशाभ्यां ग्रन्थाभ्याम् संकलितः ।
   ख)  यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न बान्धवाः न च विद्यागमः तत्र वासः न कर्तव्यः।
   ग)   आतुरे व्यसने दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे राजद्वारे श्मशाने च बान्धवः तिष्ठति। 
   घ)    काचः काञ्चनस्य संसर्गात् मारकतीं द्युतिं धत्ते। 
   ङ)   प्राज्ञः परार्थे धनानि जीवितं च उत्सृजेत्। 
   च)   मूर्खः सत्सन्निधानेन प्रवीणतां याति। 
   छ)   पुरुषेण निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रताञ्च एते षड् दोषाः हातव्या।
    ज)   नित्यं अर्थागमः अरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च वश्यश्च पुत्रः अर्थकरी च विद्या - जीवलोकस्य एतानि षट् सुखानि सन्ति। 
२.
क)  यः आतुरे व्यसने दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे राजद्वारे श्मशाने च तिष्ठति सः बान्धवः।
ख)  जीवलोकस्य नित्यं अर्थागमः अरोगिता च प्रिया भार्या च प्रियवादिनी च वश्यश्च पुत्रः अर्थकरी च विद्या षट् सुखानि भवन्ति। 
ग)   मनस्विनः कुसुमस्तवकस्य इव द्वयी वृत्तिः भवति। 
घ)   षड्दोषाः भूतिमिच्छता पुरुषेण इह हातव्याः। 
ङ)   सन्निमितं वरं त्यागो विनाशे नियते सति। 

४.   

                                  

        विद्यागमः             विद्याप्राप्तिः
       व्यसने                  विपत्तौ
        सविद्यानाम्           विदुषां
        द्युतिम्                  शोभाम् 
        कुसुमस्तवकस्य      पुष्पगुच्छस्य
        मूर्ध्नि.                     शिरसि 
        भूतिम्                   कल्याणम् 
५.
              विग्रहपदानि                          समस्तपदानि

       1.   विद्यायाः आगमः                      विद्यागमः 
       2.    राज्ञः  द्वारे                            राज द्वारे
       3.    सतां सन्निधानेन                     सत्सन्निधानेन 
       4.    काञ्चनस्य संसर्गात्                काञ्चनसंसर्गात्
       5.    अर्थस्य आगमः                      अर्थागमः
       6.    जीविताय इदम्                       जीवितार्थम्
       7.       न  रोगिता                             अरोगिता 
       8.    अर्थं करोति या सा                  अर्थकरी 
६.

      1.        प्राप्ते  -  प्र + आप् + क्त, सप्तमी एकवचन 
      2.        प्रवीणताम्  -   प्रवीण + तल्, द्वितीया एकवचन 
      3.        वृत्तिः   -  वृत्  +  क्तिन् 
      4.         नियते  -  नी + यत् , विशेषण, सप्तमी एकवचने 
      5.         हातव्या  -   हा   +  तव्य, वहुवचने

Monday, July 21, 2025

वर्णानां नामानि (Colours Name)

 

१.   गौरवर्णः/धबलः/सित/श्वेतः    -    white 
२.    कृष्णः     -     black 
३.    रक्तः      -      red 
४.    केशरः     -     orange 
५.    हरितः     -      green 
६.     नीलवर्णः   -    blue 
७.     पीतवर्णः    -    yellow 
८.     परिधूसरं     -    quite grey 
९.      परिपाटलं    -    pale red 
१०.   पांडुरः   -      Whitish, pale-white, pale, yellowish-white colour 
१२.     पिंजरः      -    reddish yellow, tawny gold colored 
१३.    पीत-अरुण   -   yellowish red (orange) 
१४.     पीत-हरित  -    yellowish green 
१५.     सुवर्णं /स्वर्णँ  -   golden 

Friday, July 18, 2025

GUIDE TO LEARNING SANSKRIT

The Divine Nature of Language

According to the Rig Veda, language is the divine light that transforms human beings into saints, gods, or wise and intelligent individuals. Language serves as the medium that connects human beings with society. Through language alone, humans establish sovereignty in every field of knowledge and science. Therefore, when we wish to learn any new language, we must immerse ourselves deeply in that language and understand its essence.

Why Learn Sanskrit?

Sanskrit is the oldest language among all languages available in the world and is considered the mother of all languages. The treasure of ancient knowledge, wisdom, and science is well-secured and protected within it.

This language is highly scientific in nature. The literature has Vedas, Puranas, Nitishastra (science of morality), medical science, and much more. The Arthashastra, written by Kautilya (Chanakya), is renowned worldwide. In mathematics, Aryabhatta was the first to expound the concept of 'zero.' The contributions of Charaka and Sushruta in medical science are often talked about.

Other shastras such as Vastushastra, Rasayana shastra, Khagola vigyan (Astronomy), Jyotish shastra (Astrology), and Vimana shastra (Aeronautics) are also found in Sanskrit.

One must learn such a beautiful language that is filled with profound knowledge and wisdom.

How to Start Learning Sanskrit

There are four essential skills for learning the Sanskrit language:

1. Listening

This is the first skill that raises one's interest in knowing more about this language. In ancient times, the Vedas were learned by listening to the recitation of Vedic mantras from sages and saints. That is why the Vedas are called 'Shruti granthas' (heard scriptures). Pandit Vishnu Sharma's Panchatantra stories are another great example of this skill.

Listening to shlokas, mantras, stories, and dramas in Sanskrit develops one's interest in the language.

2. Speaking

Whatever we listen to, we must practice speaking. Vedic mantras were pronounced and recited by the saints, and disciples would speak and recite accordingly. This process continued each day.

We can also speak Sanskrit in our daily life, starting with one word, then two words, and so on. For example, every day when we wake up in the morning, we wish others by saying 'good morning.' The Sanskrit equivalent is 'suprabhatam.' Whenever we greet ourselves and others, we should say both "good morning" and "suprabhatam" together so that it becomes easy to remember and others can learn about this Sanskrit language.

3. Writing

For new learners of Sanskrit, writing is the third skill through which one can learn the alphabets. The script used in Sanskrit is called Devanagari script (the language of gods). This skill helps in understanding the language from its roots and makes reading in Sanskrit easier.

Once we know the alphabets perfectly, reading becomes easier, and writing reinforces what we have learned, making it well-remembered.

4. Reading

Reading books like Panchatantra stories, magazines, Shrimad Bhagavad Gita, and other texts provides vast knowledge and deeper understanding of the language.

Guidelines to Learn Sanskrit

  1. Listen to one shloka for 3 to 4 days - Focus on proper pronunciation and understanding.
  2. Learn daily-use words in Sanskrit - Practice Sanskrit words for common expressions:
    • Thank you → dhanyavadah
    • Good night → shubharatri
    • Breakfast → pratahrasam
  3. Gradual expansion - After every 3 to 4 days, add a few new words, shlokas, or anything that interests you in the language while continuing to practice the previous material.
  4. Daily reading practice - Make it a habit to read something in Sanskrit every day.
  5. Maintain a learning journal - Create a list and write down what you have accomplished each day.

Conclusion

Through consistent practice and by making it a habit, one can gradually master this divine language. The key is regular practice across all four skills: listening, speaking, writing, and reading. By following these guidelines systematically, anyone can embark on the beautiful journey of learning Sanskrit and accessing the profound wisdom contained within its vast literature.

Monday, June 30, 2025

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS -11 CHAPTER - 1 कुशल प्रशासनम्



          श्रीरामचन्द्र ने जटाजुट धारण किये हुए और पेड़ के छाल के बने वस्त्र पहने हुए भरतजी को हाथ जोड़कर(नमस्कार करते हुए) , पृथिवी पर पड़ा हुआ देखा । जैसे प्रलय कालीन दुर्दर्श सूर्य तेजहीन होकर पृथिवी पर पड़ा हो।।१।।
२.  बड़ी कठिनाई से विवर्ण मुख और अत्यन्त दुवले पतले अपने भाई भरत को पहचान , श्रीरामचंद्र जी ने उन्हें दोनों हाथों से पकड कर उठाया। 
३.  रघुवंशी श्रीरामचंद्र जी ने भरत के मस्तक को सूँघ कर, उन्हें आलिङ्गन कर और उनको गोदी में विठा कर, आदर पूर्वक यह बात पूछे।
४.  हे ताज! विश्वसनीय,धीर, नीतिशास्त्रज्ञ, लालच में न फँसने वाले और प्रामाणिक कुलोत्पन्न लोगों को तुमने अपना मंत्री वनाया या नहीं? 
५.  क्योंकि हे राघव! नीतिशास्त्रनिपुण एकान्त भेद की परामर्श करने योग्य मंत्रियों द्वारा रक्षित , गुप्त परामर्श ही, राजाओं के लिये विजय का मूल है। 
६.  तुम निद्रा के वश में तो नहीं रहते? यथा समय जाग तो जाते हो? तुम पिछली रात में अर्थ की प्राप्ति के उपाय तो विचार  करते हो? 
७. अकेले तो किसी विषय पर विचार नहीं करते अथवा वहुत से लोगों के बीच बैठकर तो सलाह नहीं करते? तुम्हारा विचार कार्य रूप में परिणत होने से पहले दूसरे राजाओे को विदित तो नहीं हो जाता है?
८.  अल्प प्रयास से सिद्ध होने वाले और बड़ा फल देने वाले कार्य को करने का निश्चय कर , शीघ्र ही उसको करना तुम आरम्भ कर देते हो कि नहीं? उसे पूरा करने में विलम्ब तो नहीं करते। 
९.  तुम हजार मुर्खों को त्याग कर एक पण्डित को आश्रय करते हो कि नहीं? क्योंकि यदि सङ्कट के समय एक भी पण्डित पास हो, तो बड़े ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। अर्थात् बड़ा लाभ होता है। 
१०.  किन्तु यदि एक भी बुद्धिमान, स्थिरबुद्धि, विचारकुशल और नीतिशास्त्र में अभ्यस्त मन्त्री हो, तो राजा अथवा राजकुमार को बड़ी लक्ष्मी प्राप्त करा देता है। 
११.  हे तात! तुम उत्तम जाति के नौकरों को उत्तम कार्य में, मध्यम जाति के नौकरों को मध्यम कार्य में और छोटी जाति के नौकरों को छोटे कामों में लगाते हो न? 
१२.  तुम उन मंत्रियों को जो ईमानदार हैं , जो कुलपरंपरा से  मंत्री होते आते हैं, जो शुद्ध हृदय और श्रेष्ठ स्वभाव के हैं, श्रेष्ठ कार्यों में नियुक्त करते हो न? 
१३.  हे भरत! तुमने किसी ऐसे पुरुष को, जो व्यवहार में चतुर, शत्रु को जितने वाला , सैनिक कार्यों में (व्यूहादि रचना में) चतुर, विपत्ति के समय धैर्य धारण करने वाला , स्वामी का विश्वासपात्र, सत्कुलोद्भव, स्वामिभक्त और कार्यकुशल हो, अपना सेनापति बनाया है कि नहीं? 
१४.  तुम सेना वालों को कार्यानुरूप भोजन और वेतन यथासमय देने में विलम्ब तो नहीं करते ।
१५.  क्योंकि भोजन और वेतन समय पर न मिलने से , नौकर लोग कुपित होते हैं और मलिक की निन्दा करते हैं । नौकरों का ऐसा करना , एक बड़े भारी अनर्थ की वात है ।


                                                                      अभ्यासः

१.   संस्कृतेन उत्तरं देयम्   -
  क)  अयं पाठः आदिकाव्याद् वाल्मीकिरामायणग्रन्थात् सङ्कलितः।
ख)   जटिलः चीरवसनः भुवि पतितः भरतः आसीत् ।
ग)   रामः भरतं पाणिना परिजग्राह।
घ)   भरतं रामो अपृच्छत्।
ङ)   मन्त्रो राज्ञां विजयमूलं भवति।
च)   उपधातीतः पितृपैतामहकुलात् निर्वाहितः शुचिः श्रेष्ठात्श्रेष्ठेषु च अमात्यः राज्ञः कृते क्षेमकरः भवेत्।
छ)   धृष्टश्च शूरश्च धृतिमान् मतिमाञ्छुचिः कुलीनः अनुरक्तः दक्षश्च गुणयुक्तः सेनापतिः भवेत्।
ज)   बलेभ्यः यथाकालं यथोचितं भक्तवेतनञ्च दातव्यम्।
झ)   मन्त्रः राज्ञां विजयमूलं भवति यत्  नैकः मन्त्रितः न च बहुभिः सह विमर्षितः।
ञ)   मेधावी अमात्यः राजानं महतीं श्रियम् प्रापयेत्। 
२.  रिक्तस्थानपूर्तिः क्रियताम्  -
क)   रामः ददर्श दुर्दर्शं युगान्ते भास्करं यथा ।
ख)   अङ्के भरतं आरोप्य रामः  सादरं पर्यपृच्छत ।
ग)    कच्चित् काले अवबुध्यसे?
घ)    पण्डितः हि अर्थकृच्छ्रेषु महत् निःश्रेयसं कुर्यात्। 
ङ)    श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठेषु कच्चित् एवं कर्मसु नियोजयसि। 
५.  अधोलिखितपदानां उचितमर्थं कोष्ठकात् चित्वा लिखत -
    क)    दुर्दर्शनम्    -   कठिनाई से देखने योग्य 
    ख)    परिष्वज्य   -   आलिंगन करके 
     ग)    आघ्राय      -    सूंघकर 
     घ)     मुर्ध्नि       -     सिर में 
     ङ)    निःश्रेयसं   -     कल्याण को
     च)    विचक्षणः   -     निपुण 
     छ)    बलस्य       -     सेना का
६.   विपरीतार्थमेलनं क्रियताम् -
      क)   एकः     -       बहवः
      ख)   क्षिप्रं     -      शनैः
       ग)   पण्डितः   -    मुर्खः
       घ)   महत्     -      लघु 
७.    सन्धिविच्छेदः  क्रियताम्  -
       क)   कुलीनश्च   -   कुलीनः  +   च
       ख)   भृत्याश्च    -   भृत्याः   +   च
        ग)    धृष्टश्च     -    धृष्टः      +    च
       घ)     अनुरक्तश्च   -    अनुरक्तः   +    च
      ङ)     शूरश्च      -    शूरः      +    च
८.   अधोलिखितेषु शब्देषु प्रकृतिं प्रत्ययं च पृथक् कुरुत -
       क) पतितम्  -   पत्   +   क्त, तम् 
       ख)  आघ्राय   -   आ  +  घ्रा  +  ल्यप् 
       ग)   मन्त्रिणः   -    मन्त्र +  इन्, प्रथमा विभक्ति बहुवचने
       घ)    पण्डिताः   -  पण्डा  +  इतच्,  प्रथमा विभक्ति बहुवचने
       ङ)   मेधावी    -   मेधा   +   विनि  +  स्त्री : ईप्
       च)   दातव्यम्   -   दा  +   तव्य, तम्
       छ)   स्मृतः  -    स्मृ  +  क्त
    

                                                 समाप्तम् 

Tuesday, June 10, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 बहूनामप्यसाराणां समवायो  हि दुर्जयः ।

अर्थात्, 

      अनेक निर्बल होने पर भी समूह /संगठन को जीतना कठिन है।

Meaning - 

It's difficult to win also a group of several weak ones. 

    

   

Sunday, June 1, 2025

ज्योतिषाचार्याणां नामानि (ASTROLOGERS NAME)

१.     लगधः -  वेदाङ्गज्योतिषः

२.    आर्यभट्टः  - आर्यभटीयम्
३.  वराहमिहिरः - बृहज्जातकम्-लघुजातकम्-पञ्चसिद्धान्तिका
४.  ब्रह्मगुप्तः  - ब्रह्मस्फुटसिद्धान्तः, खण्डखाद्यं, ध्यानग्रहः 
५.  भास्कराचार्यः - सिद्धान्तशिरोमणिः, करणकुतूहलञ्च
६.   लल्लाचार्यः - रत्नकोशः   धीत्तद्धियन्त्रञ्च
७.   उत्पलाचार्यः - तत्तद्ग्रन्थटीकाः
८.    श्रीपतिः  -  सिद्धान्तशेखरः, धीकोटिकरणं रत्नमाला जातकपद्धतिः
९.    भोजदेवः  -  राजमृगाङ्ककरणम्
१०.   केशवः   -   ग्रहकौतुकम्, मुुहूर्त्ततत्त्वंजातकपद्धतिः
११.   गणेशदैवज्ञः   -   ग्रहलाघवम्
 १२.  कमलाकरः   -    सिद्धान्ततत्त्वविवेकः

Wednesday, May 28, 2025

शास्त्राणां नामानि ( NAMES OF SHAASTRAS)

 

1.   वाङ्मयम्  -  Literature 
2.   रसायनशास्त्रम्  -  Chemistry 
3.   खगोलविज्ञानम्    -   Astronomy 
4.   अर्थशास्त्रम्   -       Economics
5.   गणितशास्त्रम्   -  Mathematics; Compromises Arithmetic, Algebra and Geometry 
6.   चिकित्साशास्त्रम्  -     Medical Science (Administering remedies or medicine) 
7.   वास्तुशास्त्रम्   -   Architecture 
8.   ज्योतिषशास्त्रम्     -   Astrology 
9.   विमानशास्त्रम्      -     Aeronautics 
10.  भूगोलशास्त्रम्     -      Geography

Thursday, April 24, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 

अनागतं यः कुरुते स शोभते 

स शोच्यते यो न करोत्यनागतम्। 

अर्थात्,
            जो अनागत विपत्ति का उपाय करता है, वह सुखी होता है; जो अनागत विपत्ति का विचार ही नहीं करता वह कष्ट पाता है।

Meaning,
                 The one who finds a solution for an unpredictable problem becomes happy. The one who doesn't think about the disaster that hasn't occurred suffers in future. 

Wednesday, April 16, 2025

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS -11 CHAPTER -7 संगीतानुरागी सुब्बण्णः

             

               

              सुब्बण्ण का संगीत में जो स्वाभाविकी इच्छा थी, वो एकदिन  राजभवन में होनेवाली  संगति से और अधिक दृढ हो गई। एक दिन  पुराणिकशास्त्री पुत्र के साथ राजभवन में आ कर वहाँ अन्तःपुर की स्त्रीयों के सम्मुख पुराण की कथा आरम्भ करते हुए पहले अपने पुत्र से शुक्लाम्वरधर आदि श्लोकों को गवाया। यह देखकर वहाँ उपस्थित सभी जन प्रसन्न हुए।   कुछ समय पश्चात् वहाँ आये हुए राजा पास  वैठ कर पुराण सुनते हैं। पिता के समीप बैठा हुआ सुब्बण्ण पुराणप्रवचन आग्रह पूर्वक सुनते हुए ही मध्य में महाराजा को भी आश्चर्य सहित देख रहा था। महाराजा के सुन्दर मुख, मुख पर विशाल तिलक धारण किए हुए, उसमे भी विशाल गाल का शोभा बढ़ाने वाला दाढ़ी और मूँछ आदि सब कुछ उसका विस्मय का कारण था। राजा भी उस बालक को दो तीन बार  देख कर यह बालक चतुर है - ऐसा  सोचा। और पुराण समाप्त होने पर है शास्त्री! यह बालक क्या आपका पुत्र है? ऐसा पूछा। हाँ, महाप्रभु, ऐसा  शास्त्री ने उत्तर दिया।  फिर से विस्मयपूर्वक राजा बालक को सम्बोधित करके है वत्स! क्या आप भी पिता के जैसे पुरणप्रवचन करोगे? ऐसे पूछा। तब वह बालक - मैं पुराण प्रवचन नहीं करता हूँ। संगीत गाता हूँ यह कहा। तब राजा वोले - निश्चय । तो फिर तब तक (हम)  एक संगीत सुनते हैं  ऐसा कहा। तत्पश्चात ही सुब्बण्ण श्रीराघव दशरथात्मज इत्यादि श्लोकों को संगीत में गा कर सुनाया। उसके अन्त में वो  पुनः कस्तूरीतिलक इत्यादि श्लोक भी मुझे स्मरण है ऐसा कहा। 

          महाराजा अत्यधिक सन्तुष्ट हुए। इस प्रकार आनन्दित होकर राजा पारितोषिक के रूप में बालक को पान सहित उत्तरीय वस्त्र देकर, हे बालक! तुम बुद्धिमान हो। उत्तम रूप से संगीत शिख कर अच्छी तरह गाने के लिए आप अभ्यास करो। इसे भी अधिक पारितोषिक हम आपको देंगे  - ऐसा बालक को कहकर और पुनः शास्त्री जी को उद्देश्य कर, हे शास्त्री जी! पुत्र चतुर है , उसका  शिक्षा अच्छे से कीजीए, प्रायः महाकुशल होंगे ऐसा कहा। इसके बाद शास्त्री और पुत्र अपने घर को लौट गए। 


                                 अभ्यासः

१. संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् -

क)  सुब्बण्णस्य सहजाभिलाषः संगीते आसीत्।
ख)  पुराणिकशास्त्री पुत्रेण सह राजभवनम् अगच्छत्। 
ग)  पुराणिकशास्त्री स्वपुत्रेण शुक्लाम्बरधरमित्यादि श्लोकं गापयामास। 
घ)  पुराणप्रवचनं श्रृण्वन् सुब्बण्णः महाराजं सविस्मयं पश्यति स्म। 
ङ)  सुब्बण्णः पितृवत् पुराणप्रवचनं करिष्यति वा न इति महाराजस्य विस्मयकारणम् आसीत्।
च)  राजा बालं द्वित्रिवारम् अपश्यत्।
छ) राजा बालं अपृच्छदिदं यत् " अये वत्स! किं भवानपि पितृवत् पुराणप्रवचनं करिष्यति? '"
ज) स बालः - 'अहं पुराणप्रवचनं न करोमि। सङ्गीतं गायामिति राजानं व्याहरत्।
झ)  परितुष्टः राजा बालाय सताम्बूलमुत्तरीयवस्त्रं अयच्छत्। 
ञ) राज्ञः कथनानन्तरं शास्त्री तत्पुत्रः च ग्रामं प्रति अगच्छताम्। 

२.   
क)   सुब्बण्णस्य सङ्गीतेऽभिलाषः राजभवने संवृत्तया कया दृढीवभूव?
ख)   तच्छ्रुत्वा कुत्रत्याः सर्वे पर्यनन्दन्? 
ग)    समागतो कः पुराणम् आकर्णयति स्म? 
घ)   कः पितुः पार्श्वे महाराजं सविस्मयं पश्यति स्म?
ङ)   कस्य मुखे तिलकालङ्कारः आसीत्?
च)   राजा कस्मै सताम्बूलम् उत्तरीयवस्त्रम् अयच्छत्? 

३.  
        विशेषण                  विशेष्य 
        संवृत्तया                 सङ्गत्या 
        समागतः                  राजा
        सविस्मयं               महाराजम् 
        सुन्दरम्                    मुखम्
        विशालस्य                गण्डस्थलस्य
        कण्ठस्थः                 श्लोकः 
        शोभावहम्                श्मश्रुकूर्चम्
 ५.  
    क)   एकस्मिन् दिने पुराणिक शास्त्री पुत्रेण साकं राजभवनम् अगच्छत्। 
    ख)   पितुः पार्श्वे उपविष्टः सुब्बण्णः महाराजम् सविस्मयं पश्यति स्म। 
    ग)   राजा बालं संबोध्य पर्यपृच्छत्। 
    घ)   त्वं मेधावी असि। 
    ङ)   पारितोषिकं भवते वयं दास्यामः। 
६.
   १.  साकम्  -   सह -       भ्रात्रा साकं अहं वीपणीं गच्छामि। 
   २.   पार्श्वे -    समीपे  -   मम पार्श्वे माता उपविश्य दूरदर्शनं पश्यति। 
   ३.  तत्र -       तस्मिन्  -     तत्र उड्डीयमानान् खगान् दृष्टवा शिशुः अत्र उत्पतितुं प्रयासं करोति।
   ४.   सुष्ठु -    उत्तमरूपेण -   रघुवीरः सुष्ठु मन्त्रोच्चारणं कृत्वा प्रतिस्पर्धायां प्रथमं पुरस्कारंं प्राप्तवान्।
   ५.  सम्यक् -      कस्यचिदपि कार्यस्य प्रारम्भे तद् कार्यविषये सम्यग्ज्ञानं नीत्वा एव प्रारब्धं कुर्यात्। 
   ६.  पुनः -          ओडिशा प्रदेशस्य कोणार्क क्षेत्रस्य मनोरम चित्रकला मां  पुनः भ्रमणार्थं आकर्षयति। 


७.  विलोमपद 
    
   अत्रत्याः -  तत्रत्याः
   परागतः  -   समागतः
    दूरे   -   पार्श्वे
    उदतरत्   -   पर्यपृच्छत् 
    प्रारब्धे -   अन्ते
    कदा   -   तदा 
    मुर्खः  -   चतुरः 
    असन्तोषः  -   सन्तोषः
    अल्पम् -  अधिकम् 


सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 उद्योगे नास्ति दारिद्रयं जपतो नास्ति पातकम्।  मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ।। अर्थात्,          उद्योगी /परिश्रमी का दारिद्रय नह...