Friday, May 1, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS

 सुजनो न कुप्यत्येव अथ कुप्यति विप्रियं न चिन्तयति।

अथ चिन्तयति न जल्पति अथ जल्पति लज्जितो भवति।।

अर्थात्,

   सज्जन क्रोध नहीं करता है यदि कभी क्रोध करता है तब अनिष्ट नहीं सोचता है और यदि सोचता है तब अप्रिय नहीं बोलता है और यदि बोलता है तब लज्जित होता है।

Meaning --

A wise man doesn't get angry and if ever he would do so then he won't think about to blame. If he thinks to do so then he would not talk unpleasant. And if he tells so then he would be  ashamed. 

  

Thursday, April 30, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 उक्त्वानृतं भवेद्यत्र प्राणीनां प्राणरक्षणम्।

अनृतं तत्र सत्यं स्यात्सत्यमप्यनृतं भवेत्।।

अर्थात्, 

  झूठ बोलने से जहाँ प्राणियों की प्राणरक्षा हो सकती हो वहाँ झूठ भी सच है और सच भी झूठ होता है। 

Meaning --

Where telling a lie can save the life of people, there the lie would be true and true becomes lie. 

Wednesday, April 29, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 अपि शाकं पचानस्य सुखं वै मघवन् गृहे।

अर्जितं स्वेन वीर्येण न व्यपाश्रित्य कश्चन।।

अर्थात्,

  हे इन्द्र! किसी दूसरे का सहारा न लेकर वरं अपने पराक्रम से ही अर्जित शाक को पकाने वाले के घर में सुख होता है।

O lndra! Happiness remains there in the house of one who consumes food earned through his own valour without taking any other's help.


Tuesday, April 28, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 आनन्दवाष्परोमाञ्चौ यस्य स्वेच्छावशंबदौ।

किं तस्य साथनैरनैः किङ्कराः सर्वपार्थिवाः।।

अर्थात्,

आनन्द के अश्रु तथा रोमाञ्च जिसके इच्छा के अधीन है ,उसे अन्य साधनों की क्या प्रयोजन? सभी राजा उसके नौकर हैं।

   Meaning -

  When the tears of joy and horripilation/goosebumps are subject to/obedient to one's own  wish/desire, then what other means/instruments does he require? Thus all kings are his slaves/servants.

Monday, April 27, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 न गणस्याग्रतो गच्छेत्सिद्धे कार्ये समम्फलम्।

यदि कार्य विपत्तिः स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते।। 

अर्थात्, 

जनसमूह का मुखिया वनकर न जाएं , क्योंकी कार्य सिद्ध होने पर सव बराबर के फल के हिस्सेदार होंगे। यदि काम विगड़ गया तब मुखिया ही मार खाते हैं।

Meaning -

  One should not lead the gathering.as a chief Because the fruit of the action will be shared equally amongst all if the succeeds. But the leader is beaten up if it fails.

   

Sunday, April 26, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 पित्रा पुत्रो वयःस्थोपि सततं वाच्य एव तु।

यथा स्याद् गुणसंयुक्तः प्राप्नुयात् च महद् यशः।।

अर्थात्,

    पुत्र वयस्क होने पर भी पिता सर्वदा कहता/समझाता रहना चाहिए जिससे वह गुणी बने और अधिक यश प्राप्त  कर सकें।

Meaning -

   The father should keep advising the son even after growing up so that the latter can become moral and more famous.


Saturday, April 25, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 असत्यवचनं प्राज्ञः प्रमादेनापि न वदेत्।

श्रेयांसि येन भज्यन्ते वात्ययेव महाद्रुमाः।।

अर्थात्,

 बुद्धिमान् व्यक्ति कभी गलती से भी असत्य भाषण नहीं वोलना चाहिये क्योंकि उससे कल्याण वैसे टूट जाते हैं (/नष्ट हो जाते हैं) जैसे आंधी से महावृक्ष।

Meaning -

      A wise man should never tell a lie even by mistake. Because this breaks the good fortune just like the storm uproots the big trees.

Thursday, April 23, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 पीत्वा रसं तु कटुकं मधुरं समानं 

माधुर्यमेव जनयेन्मधुमक्षिकासौ।

सन्तस्तथैव समसज्जनदुर्जनानां

श्रुत्वा वचः मधुरसूक्तरसं सृजन्ति।।

अर्थात्,

  मधुर रस के साथ कड़ुवे रस को भी पान कर यह मधुमक्खी मधुर रस को ही निष्पन्न करती है; वेसे ही विद्वान व्यक्ति सज्जनों के साथ दुर्जनों का भी वचन सुनकर मधुर तथा उत्तम वचन रूपी रस का निर्माण करते हैं।

Meaning -

    The honey bee consumes sweet juices as well as bitter one but produce only honey which is sweet in nature . Like that, wise people create only sweet and noble talks, what type of talks they listen from good and bad persons .

Wednesday, April 22, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 संपदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च भीरूत्वम्।

तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम्।।

अर्थात्,

    जिसे संपत्ति आने पर अधिक प्रसन्नता और संकट आने पर दुःख न हो तथा युद्ध में जिसे भय न हो, त्रिभुवन में श्रेष्ठ ऐसे पुत्र को विरल ही कोई माता जन्म देती है।

Meaning -

It's rare for any mother to  give birth to a child who is best amongst the three worlds  who neither becomes happy when  wealth arrives nor is frustrated in difficult times and is not afraid of war .


     

Wednesday, April 1, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 घृष्टं घृष्टं पुनरपि पुनश्चन्दनं चारुगन्धं,

छिन्नः छिन्नः पुनरपि पुनः स्वादुमानिक्षुदण्डः।

दग्धं दग्धं पुनरपि पुनः काञ्चनं कान्तवर्णं,

प्राणान्तेऽपि प्रकृति विकृतिर्जायते नोत्तमानाम्।।

अर्थात्,

      चन्दन काष्ठ को वारवार घिसने से उसमें से सुमधुर वास उत्पन्न होता है। गन्ना वारवार चर्वित होने पर स्वादुयुक्त होता है। सुवर्ण आग में जलने से कमनीय वर्ण धारण करता है। उसी प्रकार प्राण जाते समय सज्जनों के स्वभाव परिवर्तित नहीं होते हैं। 

Tuesday, March 31, 2026

सुभाषितम(NOBLE THOUGHTS)

 यथा कालकृतोद्योगात् कृषिः फलवती भवेत्।

तद्वन्नीतिरीयं देव चिरात् फलति न क्षणात्।।

अर्थात्,

   समय के अनुसार परिश्रम करने से जैसे कृषि कार्य भविष्यत में/कुछ समय बाद सफल होता है; वैसे ही नीतिवाक्यों को उचित समय में पालन करने से उसका लाभ उसी समय नहीं वरं भविष्यत में मिलता है।

Meaning -

    As farming would be fruitful after some days if working hard according to the nature/time. In the same way if one follows the noble thoughts in one's life will get success one day but not all of a sudden.

Saturday, March 28, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते।

आचारः प्रथमो धर्मों धर्मस्य प्रभुरच्युतः।।

अर्थात्,

      सभी शास्त्रों में सदाचार मुख्यतः वर्णित हुआ है। सदाचार ही उत्तम धर्म है। धर्म का प्रभु स्वयं भगवान् नारायण हैं।


Friday, March 27, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 

धर्मेण हन्यते व्याधिर्हन्यते वै तथा ग्रहाः।

धर्मेण हन्यते शत्रुर्यतो धर्मस्ततो जयः॥

अर्थात्,

      धर्म के बल पर व्याधि, ग्रहदोष और शत्रु नष्ट हो जाते हैं। इसलिए धर्म ही जय का कारण है॥

Meaning -

      Dharma is the only reason of victory. Because of Dharma, all diseases, the karmic influences of planets and the enemies get destroyed.

Sunday, March 22, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 इदमेव ही पाण्डित्यं चातुर्यमिदमेव ही।

इदमेव सुबुद्धित्वं आयादल्पतरो व्ययः।।

अर्थात्,

   अपने आय से भी कम् खर्च करना ही मनुष्य का पाण्डित्य,चतुरता और बुद्धिमता का परिचायक है।

Meaning -

    One's income should be more than what he spends and that indicates his knowledge, cleverness and intelligence.

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्। 

मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ।।

अर्थात्, 

        उद्योगी /परिश्रमी का दारिद्र्य नहीं रहता है। जप करने से पाप दूर होता है। शान्त व्यक्ति का किसी के साथ झगड़ा नहीं होता है। सर्वदा सतर्क रहने वाले व्यक्ति को कभी भय नहीं रहता है। 

Meaning -

 The rich never face poverty. Recitation of prayer or mantras keep sins away. People who choose peace do not get into fights. And those who always stay prepared never get scared .

Thursday, March 19, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 यथा देशस्तथा भाषा यथा राजा तथा प्रजाः। 

यथा भूमिस्तथा तोयं यथा बीजं तथाऽङ्कुरः।।

अर्थात्, 

      देश के अनुसार भाषा, जैसे राजा वेसे ही प्रजा, मिट्टी के अनुरूप जल और बीज के अनुरूप अङ्कुर निकलता है। 

Meaning -

     One should speak the language according to the country, the citizen should behave  as per the king, the water follows the soil's nature and sprouts emerge according to the seed's nature. 

Wednesday, March 18, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं विषयेष्वसक्तम्।

शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः।।

अर्थात्,

        उत्साही, आलस्यरहित, कार्य करने के उपायों को जाननेवाले तथा वुरे विषयों से अनासक्त, वीर उपकार को जाननेवाले और उत्तम मित्रता रखने वाले  मनुष्य के घर लक्ष्मी स्वयं जाती हैं स्थिर रहने के लिए।



Tuesday, February 3, 2026

सुभाषितम्( NOBLE THOUGHTS)

 सुखार्थी च त्यजेद् विद्या विद्यार्थी च त्यजेत् सुखम्।

सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः  सुखम्।।

अर्थात्,

       सुख के ईच्छा‌ रखने वाले को विद्या छोडना पडता है और विद्या के अभिलाषि को सुख त्याग करना पडता है। सुखाभिलाषी का विद्या कहां होता है और विद्यार्थिओं का सुख कहां?

Meaning --

         Education is difficult for those who are tempted by happiness and the one who desires knowledge would sacrifice happiness. There is no knowledge for those who desire pleasure no pleasure for pupils who seek knowledge.

Monday, February 2, 2026

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्त स्वप्नाववोधस्य योगो भवति दुःखहा।।

अर्थात्,

           जो नियमित आहार विहार करता है, जो कार्य में नियत चेष्टा करता है, जिसका निद्रा और जागरण नियत हो, उसका दुःख निवारण कारक योग सिद्ध होता है।

Meaning --

     One who maintains proper diet and healthy lifestyle, who practices regularly in the work, whose sleep and wakefulness is in control, his trial of getting relieved from suffering would be a success.

Wednesday, January 28, 2026

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 CHAPTER-4 VEERAH SARVADAMANAH




दुष्यन्तः - (शुभ शकुन का अभिनय करते हुए) 
शकुन्तलाप्राप्ति रूप अपनी अभिलाषा केलिये तो मैं आशा ही नहीं करता हूँ, है बाहु! तब तू व्यर्थ ही क्यों  फडक रहे हो, क्योंकि जिस कल्याणकारी वस्तु का पहले तिरस्कार कर दिया जाता है वह पुनः दुःख में ही परिवर्तित हो जाती है । अर्थात्‌ वह पुनः बडी कठिनाई से प्राप्त होती है ।
(नेपथ्य से)
 चञ्चलता मत करो। अपना स्वभाव ही कहाँ जाता है।
दुष्यन्तः -- (कान लगाकर) यह स्थान अविनय (उदण्डता) के योग्य नहीं है । तो फिर किसके द्वारा कौन मना किया जा रहा है? (आवाज की ओर देखकर)
(विस्मय के साथ)
 अरे, दो तपस्वि के द्वारा पीछा किया जाता हुआ असाधारण शक्तिसम्पन्न यह बालक कौन है ।
      जिसने अभी माताके आधे ही स्तन का दूध पी पाया है और (खींचने में) रगड से जिसके कन्धों पर के बाल इधर-उधर बिखर गये हैं, एसे सिंह शिशु को खेलने के लिये बलपूर्वक खींच रहा है॥२॥
बालः -   हे सिंह! अपना मुँह खोलो, मैं तुम्हारा दान्त गिनुंगा।
प्रथम तापसी--अरे नटखट! हमारी सन्तान के तुल्य (पले हुये) प्राणियों को तुम क्यों तंग कर रहा है। ओः! तुम्हारा क्रोध तो बढता जा रहा है। ऋषियोंने ठीक् ही तुम्हारा नाम सर्वदमन रखा है ।
राजा- मेरा हृदय इस बालक पर निजी पुत्रके समान क्यों स्नेह कर रहा है ? अवश्य ही पुत्र न होनेके कारण मेरे मन में इसके प्रति यह वात्सल्य प्रेम जाग रहा है।)
दूसरी तापसी-- यह सिंहनी अवश्य तुझ पर आक्रमण कर देगी यदि तुम इसके बच्चे को नहीं छोडता है।
बालं-- (मुस्कराकर) ओह, तब तो मैं बडा डर गया हूं ।
(उसे चिढने के लिये अपना अधरोष्ठ दिखाता है)
प्रथमा - वत्स! इस सिंह शावक को छोड दो, मैं तुम्हें दूसरा खिलौना दूँगी।
बालः - कहाँ है? वह खिलौना मुझे दो।( कहकर हाथ फैलाता है)
द्वितीया - सुव्रते! इसको कहने मात्र से रोकने के लिए समर्थ नहीं होगी। तुम जाओ। मेरे कुटीर में मिट्टी की मयूर है। वह इसको दे दो।
बालः -  तब तक मैं इस्से ही खेलूँगा।(तपस्वी को देख कर हँसता है)
तपस्वी - ठीक् है। यह मुझको नहीं मान रहा हैैै।(राजा को देखकर) महाशय! इसके द्वारा वाध्य किया जाता हुआ सिंहशिशु को मुक्त करो।
दुष्यन्तः - आकार के समान इसकी चेष्टा ही कहता है। (मन ही मन)
  किसी भी बंश की अंकुर स्वरूप इसके द्वारा स्पर्ष किए गए मेरे अंगप्रत्यङ्गों में एसा सुख अनुभूत हो रहा है; जिस भाग्यवान् की गोद से यह उत्पन्न हुआ है, उसके मन में किस प्रकार का आनन्द उत्पन्न न करता होगा। 
राजा - (बालक को प्यार करते हुए) इसका वंश क्या है?  
तपस्वी - पुरुवंश।
राजा -  (मन में ) कैसे इसका और मेरा एक ही वंश है?(प्रवेश कर के)
तपस्वी - वत्स! पक्षी की सुन्दरता को देखो।
बालः - मेरी माता कहाँ है? 
राजा  -  (मन में) क्या इसके माता के नाम शकुन्तला है? 
बालः -  यह मोर मुझे अच्छा लग रहा है। (खिलौना लेता है) 

                अभ्यासः

१.  संस्कृतभाषया उतरत --
  क)  कवेः कालिदासस्य "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" इति पुस्तकाद् गृहीतोऽयं पाठः।
  ख) बालः मातुः अर्धपीतस्तनं आमर्दक्लिष्टकेशरं च सिंहशिशुं कर्षति स्म। 
 ग)  तापसी बालाय क्रीडार्थं शकुन्तक्रीडनकं दत्तवती। 
घ)   क्रीडापरस्य बालस्य मातुः शकुन्तला नामधेयम्। 
ङ)  बालाय मयूरः रोचते।
२.  रिक्तस्थानानां पूर्तीः करणीया --
  क) अपत्यनिर्विशेषाणि सत्त्वानि विप्रकरोषि।
  ख)। पुत्रे स्निह्यति मे मनः।
   ग) यद्यस्याः पुत्रकं न मुञ्चसि।
   घ) अपरं क्रीडनकं ते दास्यामि।
ङ)। आकारसदृशं चेष्टितमेवास्य कथयति।

३. निम्नाङ्कितेषु सन्धिच्छेदो विधेयः -
     क) गत एवात्मनः -- गतः+ एव+ आत्मनः
    ख) औरस इव   -- औरसः+इव
    ग) दन्तांस्ते    -- दन्तान्+ ते
    घ) यद्यस्याः - यदि + अस्याः 
    ङ) शकुन्तलेत्यस्य - शकुन्तला + इति + अस्य 
    च) खल्वयम् - खलु + अयम्
    छ) बालेऽस्मिन् - बाले + अस्मिन् 
    ज) भीतोऽस्मि - भीतः + अस्मि
    झ) कस्यापि - कस्य + अपि 
    ञ) एकान्वयः - एकः + अन्वयः 
     ट) एवास्य - एव + अस्य
     ठ) तमस्योपहर - तम् + अस्य + उपहर
     ड) मैवम् - मा + एवम् 
     ढ) इत्यधरम् - इति + अधरम्
     ण) ममाम्वा - मम + अम्वा 
     त) अनेनैव - अनेन + एव 
४.  अधोलिखितेषु विग्रहं कृत्वा समासनाम लिखत -
 

सविस्मयम् - विस्मयेन सह , तम् - बहुव्रीहिः 
अबालसत्वः - बालस्य सत्त्वं  -  षष्ठी तत् पुरुषः 
                   बालसत्त्वं इव सत्त्वं यस्य सः बहुव्रीहिः 
                   न बालसत्त्वं - नञ् तत्पुरुषः 
 सिंहशिशुम् - सिंहस्य शिशुः, तम् - षष्ठी तत्पुरुषः 
अनपत्यता - अविद्यमानं अपत्यं यस्य सः - बहुव्रीहिः 
सस्मितम् - स्मितेन सह  -  बहुव्रीहिः 
मृत्तिकामयूरः - मृत्तिका मयूरः - कर्मधारयः 
बालमृगेन्द्रम्  - बालः मृगेन्द्रः,तम् - कर्मधारयः 
एकान्वयः -  एकः अन्वयः - कर्मधारयः 
आकारसदृशम् - आकारेण सदृशं - तृतीया तत्पुरुषः ऐ
बालस्पर्शं - बालस्य स्पर्शं - षष्ठी तत्पुरुषः 

५. अधोलिखितानां पदानां संस्कृतवाक्येषु प्रयोगः करणीयः -
     सबिस्मयम्  --कोणार्कमन्दिरस्य कलाकृतिं जना सबिस्मयं दर्शनम् कुर्वन्ति। 
कर्षति - कुठारः वृहत् काष्ठखण्डं रस्सिमाध्यमेन कर्षति।
स्निह्यति - पिता पुत्रं स्निह्यति।
केसरिणी - सखा रविवासरे केसरिणीं द्रष्टुम् नगरस्थं कृत्रिमकाननं गमिष्यति।
उटजे -  वनवासिनः उटजे तिष्ठन्ति।
व्यपदेशः - भगवतः श्रीरामचन्द्रस्य व्यपदेशः रघुः इत्यस्ति।
प्रेक्षस्व - सखि! तब कृते आनीयतां एतदुपहारम् प्रेक्षस्व। 
ममाम्वा - ममाम्वा स्वादिष्टं अवलेहं( pickle) निर्माति। 
६  प्रकृतिप्रत्ययपरिचयो देयः -
  सूचयित्वा -  सूच् + णिच्+ क्त्वाच्
प्रक्रीडितुम् - प्र + क्रीड् + तुमुन्
अवलोक्य - अव + लुक् + ल्यप्
अनुबध्यमानः - अनु + बध्+ शानच्
निष्क्रान्ता - निस् + क्रम् + क्त, स्त्रीयां टाप् 
उपलभ्यः - उप+ लभ् + ल्यप्
उपलालयन् - उप + लल् + शतृन् 








सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS

 सुजनो न कुप्यत्येव अथ कुप्यति विप्रियं न चिन्तयति। अथ चिन्तयति न जल्पति अथ जल्पति लज्जितो भवति।। अर्थात्,    सज्जन क्रोध नहीं करता है यदि क...