Wednesday, March 18, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं विषयेष्वसक्तम्।

शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः।।

अर्थात्,

        उत्साही, आलस्यरहित, कार्य करने के उपायों को जाननेवाले तथा वुरे विषयों से अनासक्त, वीर उपकार को जाननेवाले और उत्तम मित्रता रखने वाले  मनुष्य के घर लक्ष्मी स्वयं जाती हैं स्थिर रहने के लिए।



Tuesday, February 3, 2026

सुभाषितम्( NOBLE THOUGHTS)

 सुखार्थी च त्यजेद् विद्या विद्यार्थी च त्यजेत् सुखम्।

सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः  सुखम्।।

अर्थात्,

       सुख के ईच्छा‌ रखने वाले को विद्या छोडना पडता है और विद्या के अभिलाषि को सुख त्याग करना पडता है। सुखाभिलाषी का विद्या कहां होता है और विद्यार्थिओं का सुख कहां?

Meaning --

         Education is difficult for those who are tempted by happiness and the one who desires knowledge would sacrifice happiness. There is no knowledge for those who desire pleasure no pleasure for pupils who seek knowledge.

Monday, February 2, 2026

सुभाषितम् (NOBLE THOUGHTS)

 युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्त स्वप्नाववोधस्य योगो भवति दुःखहा।।

अर्थात्,

           जो नियमित आहार विहार करता है, जो कार्य में नियत चेष्टा करता है, जिसका निद्रा और जागरण नियत हो, उसका दुःख निवारण कारक योग सिद्ध होता है।

Meaning --

     One who maintains proper diet and healthy lifestyle, who practices regularly in the work, whose sleep and wakefulness is in control, his trial of getting relieved from suffering would be a success.

Wednesday, January 28, 2026

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 CHAPTER-4 VEERAH SARVADAMANAH




दुष्यन्तः - (शुभ शकुन का अभिनय करते हुए) 
शकुन्तलाप्राप्ति रूप अपनी अभिलाषा केलिये तो मैं आशा ही नहीं करता हूँ, है बाहु! तब तू व्यर्थ ही क्यों  फडक रहे हो, क्योंकि जिस कल्याणकारी वस्तु का पहले तिरस्कार कर दिया जाता है वह पुनः दुःख में ही परिवर्तित हो जाती है । अर्थात्‌ वह पुनः बडी कठिनाई से प्राप्त होती है ।
(नेपथ्य से)
 चञ्चलता मत करो। अपना स्वभाव ही कहाँ जाता है।
दुष्यन्तः -- (कान लगाकर) यह स्थान अविनय (उदण्डता) के योग्य नहीं है । तो फिर किसके द्वारा कौन मना किया जा रहा है? (आवाज की ओर देखकर)
(विस्मय के साथ)
 अरे, दो तपस्वि के द्वारा पीछा किया जाता हुआ असाधारण शक्तिसम्पन्न यह बालक कौन है ।
      जिसने अभी माताके आधे ही स्तन का दूध पी पाया है और (खींचने में) रगड से जिसके कन्धों पर के बाल इधर-उधर बिखर गये हैं, एसे सिंह शिशु को खेलने के लिये बलपूर्वक खींच रहा है॥२॥
बालः -   हे सिंह! अपना मुँह खोलो, मैं तुम्हारा दान्त गिनुंगा।
प्रथम तापसी--अरे नटखट! हमारी सन्तान के तुल्य (पले हुये) प्राणियों को तुम क्यों तंग कर रहा है। ओः! तुम्हारा क्रोध तो बढता जा रहा है। ऋषियोंने ठीक् ही तुम्हारा नाम सर्वदमन रखा है ।
राजा- मेरा हृदय इस बालक पर निजी पुत्रके समान क्यों स्नेह कर रहा है ? अवश्य ही पुत्र न होनेके कारण मेरे मन में इसके प्रति यह वात्सल्य प्रेम जाग रहा है।)
दूसरी तापसी-- यह सिंहनी अवश्य तुझ पर आक्रमण कर देगी यदि तुम इसके बच्चे को नहीं छोडता है।
बालं-- (मुस्कराकर) ओह, तब तो मैं बडा डर गया हूं ।
(उसे चिढने के लिये अपना अधरोष्ठ दिखाता है)
प्रथमा - वत्स! इस सिंह शावक को छोड दो, मैं तुम्हें दूसरा खिलौना दूँगी।
बालः - कहाँ है? वह खिलौना मुझे दो।( कहकर हाथ फैलाता है)
द्वितीया - सुव्रते! इसको कहने मात्र से रोकने के लिए समर्थ नहीं होगी। तुम जाओ। मेरे कुटीर में मिट्टी की मयूर है। वह इसको दे दो।
बालः -  तब तक मैं इस्से ही खेलूँगा।(तपस्वी को देख कर हँसता है)
तपस्वी - ठीक् है। यह मुझको नहीं मान रहा हैैै।(राजा को देखकर) महाशय! इसके द्वारा वाध्य किया जाता हुआ सिंहशिशु को मुक्त करो।
दुष्यन्तः - आकार के समान इसकी चेष्टा ही कहता है। (मन ही मन)
  किसी भी बंश की अंकुर स्वरूप इसके द्वारा स्पर्ष किए गए मेरे अंगप्रत्यङ्गों में एसा सुख अनुभूत हो रहा है; जिस भाग्यवान् की गोद से यह उत्पन्न हुआ है, उसके मन में किस प्रकार का आनन्द उत्पन्न न करता होगा। 
राजा - (बालक को प्यार करते हुए) इसका वंश क्या है?  
तपस्वी - पुरुवंश।
राजा -  (मन में ) कैसे इसका और मेरा एक ही वंश है?(प्रवेश कर के)
तपस्वी - वत्स! पक्षी की सुन्दरता को देखो।
बालः - मेरी माता कहाँ है? 
राजा  -  (मन में) क्या इसके माता के नाम शकुन्तला है? 
बालः -  यह मोर मुझे अच्छा लग रहा है। (खिलौना लेता है) 

                अभ्यासः

१.  संस्कृतभाषया उतरत --
  क)  कवेः कालिदासस्य "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" इति पुस्तकाद् गृहीतोऽयं पाठः।
  ख) बालः मातुः अर्धपीतस्तनं आमर्दक्लिष्टकेशरं च सिंहशिशुं कर्षति स्म। 
 ग)  तापसी बालाय क्रीडार्थं शकुन्तक्रीडनकं दत्तवती। 
घ)   क्रीडापरस्य बालस्य मातुः शकुन्तला नामधेयम्। 
ङ)  बालाय मयूरः रोचते।
२.  रिक्तस्थानानां पूर्तीः करणीया --
  क) अपत्यनिर्विशेषाणि सत्त्वानि विप्रकरोषि।
  ख)। पुत्रे स्निह्यति मे मनः।
   ग) यद्यस्याः पुत्रकं न मुञ्चसि।
   घ) अपरं क्रीडनकं ते दास्यामि।
ङ)। आकारसदृशं चेष्टितमेवास्य कथयति।

३. निम्नाङ्कितेषु सन्धिच्छेदो विधेयः -
     क) गत एवात्मनः -- गतः+ एव+ आत्मनः
    ख) औरस इव   -- औरसः+इव
    ग) दन्तांस्ते    -- दन्तान्+ ते
    घ) यद्यस्याः - यदि + अस्याः 
    ङ) शकुन्तलेत्यस्य - शकुन्तला + इति + अस्य 
    च) खल्वयम् - खलु + अयम्
    छ) बालेऽस्मिन् - बाले + अस्मिन् 
    ज) भीतोऽस्मि - भीतः + अस्मि
    झ) कस्यापि - कस्य + अपि 
    ञ) एकान्वयः - एकः + अन्वयः 
     ट) एवास्य - एव + अस्य
     ठ) तमस्योपहर - तम् + अस्य + उपहर
     ड) मैवम् - मा + एवम् 
     ढ) इत्यधरम् - इति + अधरम्
     ण) ममाम्वा - मम + अम्वा 
     त) अनेनैव - अनेन + एव 
४.  अधोलिखितेषु विग्रहं कृत्वा समासनाम लिखत -
 

सविस्मयम् - विस्मयेन सह , तम् - बहुव्रीहिः 
अबालसत्वः - बालस्य सत्त्वं  -  षष्ठी तत् पुरुषः 
                   बालसत्त्वं इव सत्त्वं यस्य सः बहुव्रीहिः 
                   न बालसत्त्वं - नञ् तत्पुरुषः 
 सिंहशिशुम् - सिंहस्य शिशुः, तम् - षष्ठी तत्पुरुषः 
अनपत्यता - अविद्यमानं अपत्यं यस्य सः - बहुव्रीहिः 
सस्मितम् - स्मितेन सह  -  बहुव्रीहिः 
मृत्तिकामयूरः - मृत्तिका मयूरः - कर्मधारयः 
बालमृगेन्द्रम्  - बालः मृगेन्द्रः,तम् - कर्मधारयः 
एकान्वयः -  एकः अन्वयः - कर्मधारयः 
आकारसदृशम् - आकारेण सदृशं - तृतीया तत्पुरुषः ऐ
बालस्पर्शं - बालस्य स्पर्शं - षष्ठी तत्पुरुषः 

५. अधोलिखितानां पदानां संस्कृतवाक्येषु प्रयोगः करणीयः -
     सबिस्मयम्  --कोणार्कमन्दिरस्य कलाकृतिं जना सबिस्मयं दर्शनम् कुर्वन्ति। 
कर्षति - कुठारः वृहत् काष्ठखण्डं रस्सिमाध्यमेन कर्षति।
स्निह्यति - पिता पुत्रं स्निह्यति।
केसरिणी - सखा रविवासरे केसरिणीं द्रष्टुम् नगरस्थं कृत्रिमकाननं गमिष्यति।
उटजे -  वनवासिनः उटजे तिष्ठन्ति।
व्यपदेशः - भगवतः श्रीरामचन्द्रस्य व्यपदेशः रघुः इत्यस्ति।
प्रेक्षस्व - सखि! तब कृते आनीयतां एतदुपहारम् प्रेक्षस्व। 
ममाम्वा - ममाम्वा स्वादिष्टं अवलेहं( pickle) निर्माति। 
६  प्रकृतिप्रत्ययपरिचयो देयः -
  सूचयित्वा -  सूच् + णिच्+ क्त्वाच्
प्रक्रीडितुम् - प्र + क्रीड् + तुमुन्
अवलोक्य - अव + लुक् + ल्यप्
अनुबध्यमानः - अनु + बध्+ शानच्
निष्क्रान्ता - निस् + क्रम् + क्त, स्त्रीयां टाप् 
उपलभ्यः - उप+ लभ् + ल्यप्
उपलालयन् - उप + लल् + शतृन् 








Tuesday, January 27, 2026

सुभाषितम्(Noble Thoughts)

 मयूखैर्जगतःस्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रविः।

स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम्।।

ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता है। इसलिए इस समय मीठा, ठंडा द्रव पदार्थ, चिकने खानपान हितकारी है। 

Saturday, January 10, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 वसन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृद्भाभिरीरितः।

कायाग्निं बाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून्।।

तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत्।

गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत्।।

अर्थात् --

वसन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से पिघल कर अर्थात् द्रव वन कर शरीर की अग्नि को कम् करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है।

 इसलिए कफ को निकालने के लिए वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन  क्रियाएँ करनी चाहिए। गुरु, अम्ल, स्निग्ध, मधुर वस्तुओंका सेवन और दिन में सोना त्याग करना चाहिए। 

Sunday, December 28, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 मातृपितृकृताभ्यासो गुणितामेति बालकः।

न गर्भच्युतिमात्रेण पुत्रो भवति पण्डितः।।

अर्थात्,

    माता-पिता के अभ्यास कराने पर ही बालक विद्वान् होता है। गर्भ से निकलते ही पुत्र विद्वान् नहीं हो जाता है।

Meaning --

The child becomes intelligent because of proper guidance given by the parents. The child is never intelligent right after coming out of the womb.

Saturday, December 27, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 संहतिः श्रेयसी पुंसां स्वकुलैरल्फकैरपि।

तुषेणापि परित्यक्ता न प्ररोहन्ति तण्डुलाः।।

अर्थात्,

    अपने कुल के छोटे व्यक्तियों का समूह भी कल्याणकारी  होता है। जैसे भूसा मात्र से अलग हो जाने पर चावल फिर अंकुरित नहीं होते।

Thursday, December 25, 2025

सुभाषितम्(Noble Thoughts)

 गुणेष्वेव हि कर्तव्यः प्रयत्नः पुरुषैः सदा। 

गुणयुक्तो दरिद्रोऽपि नेश्वरैरगुणै समः।। 

अर्थात्, 

     व्यक्ति सर्वदा सद्गुणोंको ग्रहण करने में प्रयत्न करना चाहिए। दरिद्र होने पर भी व्यक्ति यदि गुण के अधिकारी है, तो गुणहीन नृपति अथवा धनाढ्य व्यक्ति से भी अधिक सम्मानित होता है। 


Meaning --

    People should always try to accept virtues. One even being poor if having virtues is mostly respected than virtueless king or richest person. 

    

Wednesday, December 24, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 यस्तु संचरते देशान् यस्तु सेवेत पण्डितान्।

तस्य विस्तारिता बुद्धि स्तैलविन्दुरिवाम्भसि।।

अर्थात्,

       जो व्यक्ति अनेक देश भ्रमण करता है और विद्वानों का सेवा करता है उसका बुद्धि पानी में तैलविन्दु सदृश विस्तारित हो जाता है।

Meaning --

The one who travels several countries and serves the intelligents, his intelligence expands just like the oil drop spreads in the water.


Tuesday, December 23, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 ग्रीष्मबर्जेषु कालेषु दिवा स्वापो निषिद्ध्यते।

उचितो हि दिवा स्वापो यतोनित्यः शरीरिणाम्।।

अर्थात्, 

     मनुष्यों का निद्रा दैनन्दिन कर्तव्य है। परन्तु ग्रीष्मकाल को छोड़कर अन्य समय में दिन में सोना निषिद्ध है।

Meaning --

     Sleeping is the daily routine of human beings. But sleeping in the day time is forbidden except in the days of Summer.


Monday, December 22, 2025

Comparative and Superlative Degrees

 Words.            Comparative.        Superlative 

१.पृथु(wide)        प्रथीयस्                   प्रथिष्ठ

२.प्रिय (dear )      प्रेयस्                  प्रेष्ठ

३.बाढ(firm, strong)  साधीयस्          साधीष्ठ

४.बहु/बह्वी (much)    भूयस्               भूयिष्ठ 

५. बहुल (thick)        बहीयस्            बहिष्ठ

६. महत्                   महीयस्           महिष्ठ 

७. मृदु(soft)            म्रदीयस्             म्रदिष्ठ

८. स्वल्प(very small)     स्वल्पीयस्      स्वल्पिष्ठ 

९. स्वादु(taste)            स्वादीयस्          स्वादिष्ठ 

१०. वृंदार (beautiful)       वृंदीयस्            वृंदिष्ठ

११. प्रशस्य(praiseworthy,    श्रेयस्/ज्यायस्    श्रेष्ठ/ज्येष्ठ 

                   excellent)

१२. भृश(strong,mighty,       भ्रशीयश्            भ्रशिष्ठ

                very much)


Saturday, December 20, 2025

लोकानां/ भुवनानां नामानि(Divisions of the Universe)

 साधारणतः लोकत्रयः अथवा भुवनत्रयः इति कथ्यन्ते :-

   स्वर्गलोकः,  पृथ्वीलोकः पाताललोकश्च। 

परन्तु मुख्यतः चतुर्दशलोकाः भुवनानि वा सन्ति। ते भवन्ति :-

१. व्रह्मलोकः सत्यलोकः वा

२.  तपर्लोकः

३.  जनर्लोकः

४.  महर्लोकः

५.  स्वर्लोकः 

६.  भुवर्लोकः

७.  भूर्लोकः.

८.   अतल 

९.   वितल 

१०.   सुतल 

११.  रसातल

१२.   तलातल 


 १३. महातल 


१४.  पाताल

Friday, December 19, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 यस्य मित्रेण सम्भाषो यस्य मित्रेण संस्थितिः।

यस्य मित्रेण संलपस्ततो नास्तीह पुण्यवान्।।

अर्थात्,

       जिस व्यक्ति का मित्र के साथ वार्तालाप है, जिस का मित्रों के साथ वास है और जिसका मित्र के साथ अच्छे से गोष्ठी/मेल-मिलाप होता है, उससे बढ़कर पुण्यवान् इस संसार में दूसरा कोई नहीं है।

Wednesday, December 17, 2025

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रितयं हितम्।

कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः।।

अर्थात्,

माता, पिता और मित्र ये तीनों स्वभाव से ही हितकारी होते हैं और अन्य लोग प्रयोजनवश या किसी कारण - विशेष से हितकारी होते हैं।

Meaning -

Mother, father and friend these three are beneficial by nature and others are beneficial to any purpose or for some reason .

Tuesday, December 16, 2025

विपरीतार्थक पदानि(Opposite Words)

 पदानि            विपरीतार्थकपदानि 

अपधर्मः           परधर्मः 

अनुलोमः           प्रतिलोमः 

अनुरागः             अपरागः 

पुरतः            पृष्ठतः 

स्वकीयम्           परकीयम् 

भीतिः              साहसः 

अनुरक्तिः          विरक्तिः 

गमनम्          आगमनम् 

आरोहणम्        अवरोहणम् 

उष्णम्            शीतम् 

सीदति            प्रसीदति 

तप्तानाम्         शीतानाम् 

गुरु                  लघु 

अल्पम्              अधिकम् 

Monday, December 15, 2025

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 ऋतुचर्या तृतीयःपाठः

 


हेमन्तः 

        दूध,दही,मावा आदि एवं गन्ने के रस से वनी खीर, राब, शर्करा आदि से वनी वस्तुएँ, वसा, तैल और नये चावल खाने चाहिये। हेमन्त काल में स्नान आदि में गरम पानी का व्यवहार करने वाले की आयु कम् नहीं होती।


लघु गुणवाले एवं वायुप्रकोपक आहार विहार हेमन्त ऋतु में छोड़ देनी चाहिए। एवं सामने की वायु, थोड़ा खाना और जौ के पानी से निर्मित पदार्थ को छोड़ देना चाहिए। 


शिशिरः


           हेमन्त और शिशिर ऋतुएँ प्रायः समान हैं। परन्तु शिशिर काल में हेमन्त से थोड़ा विशेषता यह है कि शिशिर का आदान काल होने से वायु रुखा होता है एवं बादल,वायु और वरसात अधिक होने से इस ऋतु में शीत अधिक होता है। 


इसलिए शिशिर ऋतु में हेमन्त की सम्पूर्ण बिधि पालन करनी चाहिए। परन्तु शिशिर में हेमन्त से अधिक गरम और वायुरहित घरों में रहें। 


शिशिर काल में कड़ुवे, तिक्त , कसैले, वायुकारक और लघु तथा ठण्डे खानपान को छोड़ दे। 


वसन्त ऋतु  -

वसन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से पिघल कर अर्थात् द्रव वन कर शरीर की अग्नि को कम् करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है।

 इसलिए कफ को निकालने के लिए वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन आदि क्रियाएँ करनी चाहिए। 

ग्रीष्म ऋतु


ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता है। इसलिए इस समय मीठा, ठंडा द्रव पदार्थ, चिकने खानपान हितकारी है। 


घी और दूध के साथ चावल खाने से ग्रीष्म ऋतु में कष्ट नहीं होता। नमकीन, खट्टे, कडुवे और गरम रस पदार्थ तथा व्यायाम इस ऋतु में छोड़ देना चाहिए। 


वर्षा ऋतु 


ग्रीष्म ऋतु में   सूर्य की प्रचण्ड  गर्मी से भूमि के तप जाने से , वर्षा में वरसात पड़ने से पानी के स्पर्ष से भूमि से गरम भाप निकलने से तीनों दोष कुपित हो जाते हैं। इसी प्रकार वादलों के वरसने से वात, कफ कुपित होते हैं, जल अम्लपाक होने से पित्त कुपित होता है। वर्षाऋतु में अग्नि-बल के क्षीण होने से वात, पित्त, कफ तीनों दोष कुपित होते हैं। 

वरसात के दिनों में जिस दिन वायु और वरसात जोर का पड़ रहा हो और सर्दी बहुत हो ,उस दिन वायु को शांत करने के लिये अम्ल, लवण रस तथा स्नेह घी जिस अन्न में स्पष्ट दिखता हो उसे बिशेष करके खाना चाहिये। 


शरद् ऋतु


वर्षा ऋतु में काल स्वभाव में सञ्चित हुआ पित्त शरद् काल में बादलों के हट जाने से  सूर्य की किरणों के ताप से सहसा कुपित होता है। 

इसलिए इस ऋतु में मधुर, लघु, शीत और तिक्त आदि पित्तशामक खानपान परिमाण में खाना चाहिये ।

शरत्काल में रात्रि के प्रथम प्रहर में चन्द्रमा की किरणों का सेवन करना तथा शरत्कालीन मालाएँ और निर्मल वस्त्र प्रशंसनीय है। 


अभ्यासः

१.

    क) अयं पाठः 'चरकसंहिता'इति ग्रन्थात् संकलितः महर्षि चरकश्च तस्य प्रणेता।

ख)  षड्ऋतवः सन्ति ‌। ग्रीष्मश्च वर्षाशरद्हेमन्तशिशिरो बसन्तश्च एतानि भवन्ति तेषां नामानि।

ग)  कटुतिक्तकषायाणि वातलानि लघूनि शीतलानि च अन्नपानानि शिशिरे वर्जनीयम्।

च) वसन्ते कायाग्निं निचितः श्लेष्मा बाथते।

ङ) ग्रीष्मे  स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धञ्च अन्नपानं हितम् भवति।

च)  वर्षा ऋतौ पवनादयः कुप्यन्ति।

छ) शरदृतौ पित्तप्रशमनाय मधुरं लघु शीतं सतिक्तकञ्च अन्नपानं मात्रया सेव्यमस्ति।

ज) हिमागमे वातलानि लघूनि च अन्नपानानि वर्जयेत्।

झ) शिशिरे निवातं अधिकमुष्णं गृहम् आश्रयेत्।

ञ) वसन्ते वमनादीनि कर्माणि कारयेत्।

ट) ग्रीष्मे व्यायामं वर्जयेत्।

ठ) शरत्काले प्रदोषे इन्दुरश्मयः प्रशस्यन्ते।

क) हिमागमे वातलानि लघूनि च अन्नपानानि वर्जयेत्।

ख) शिशिरे निवातं अधिकमुष्णं च गृहमाश्रयेत्।

ग) वसन्ते दिवास्वप्नं वर्जयेत्।

घ) ग्रीष्मे घृतं पयः सशाल्यन्नं भजन् नरः न सीदति।

ङ) शरत्काले विमलानि वासांसि प्रशस्यन्ते।

५.

           विग्रह पदानि         समस्तपदानि 

क)    अन्नानि च पानानि च  -   अन्नपानानि 

ख) हेमन्तः च शिशिरः च  - हेमन्तशिशिरौ 

ग)  हिमस्य आगमे -     हिमागमे

घ) कायस्य अग्निम् - कायाग्निम्

ङ) अर्कस्य रश्मिभिः  - अर्करश्मिभिः

६. अर्थमेलनं क्रियताम् -

               पदानि            अर्थाः

क)      श्लेष्मा                कफ 

ख)।     रौक्षम्                    रूखापन

ग)        निवातम्              हवारहित

घ)         निचितः                 बढ़ा हुआ 

ङ)।       पवनः                  वात

च)।        गुरुः                    भारी

छ)         लघुः                   हल्का 

ज)         वासांसि               वस्त्र 

७.

           पदानि            विपरीतार्थकपदानि

           उष्णम्                शीतम् 

           सीदति             प्रसीदति

           तप्तानाम्            शीतानाम्

           गुरु                    लघु 

           अल्पम्              अधिकम् 

८.

        हेमन्त+ठक् = हेमन्तः

       स्निह् + क्त  = स्निग्ध 

       भुज्  + तव्यत् =  भोक्तव्यम् 

        सेव् + यत्   =   सेव्यम्

       शरद् + अण्  =  शरदः

Sunday, December 14, 2025

सुभाषितम्( NOBLE THOUGHTS)

 नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम्।

आपत्स्वपि न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः।।

अर्थात्, 

    विद्वानों के सदृश बुद्धिवाले अर्थात् चतुर मनुष्य दुर्लभ वस्तु की इच्छा नहीं रखते और नष्ट हुए का चिन्ता नहीं करते एवं आपत्ति आने पर घवराते नहीं हैं।

Wednesday, December 10, 2025

सुभाषितम्(Noble Thoughts)

 अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।

तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्वध्यन्ते मत्तदन्तिनः।।

अर्थात्,

छोटी और तुच्छ वस्तु के समुदाय से भी एक बड़े कार्य की सिद्धि हो जाती है। जैसे घासों के समूह से बनी रस्सियों से मदोन्मत्त गजराज भी बांधे जाते हैं।

Meaning -

The accomplishment of a great work happens even through gathering of small things. Just like an intoxicated elephant who is controlled by the thread which is made from the collection of grass.

Tuesday, December 9, 2025

सुभाषितम्(Noble Thought)

 शरीरस्य गुणानाञ्च दूरमत्यन्तमन्तरम्‌‌।

शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः।।

अर्थात्,

शरीर और दयादाक्षिण्यादि गुणों में बहुत दूर का अन्तर है। क्योंकि शरीर क्षणमात्रमें नष्ट हो जाता है और दयादाक्षिण्यादि गुण महाप्रलयतक स्थिर रहनेवाले हैं। अतः यश की रक्षा सर्वथा योग्य और उचित है।

Meaning -

     There is large difference between body and qualities of mercy and kindness etc. As body demolished in Just a while whereas the qualities like mercy, kindness etc. will sustain till great dissolution or deluge.

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं विषयेष्वसक्तम्। शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः।। अर्थात्,         उत्साही...