Thursday, September 3, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

Shloka:

मूढ़ जहीहि धनागम तृष्णां, कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्।

यल्लभसे निजकर्मोपात्तं, वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ।।

अर्थात्:

हे मुर्ख! धन विषयक प्यास को छोड़ दो, उस मन में परमात्मा विषयक विचार कर। अपने कर्मों से प्राप्त धन से ही मन को प्रसन्न कर। 

Meaning:

O fool! Give up the thirst relating to wealth and cleanse your mind with spiritual thought about almighty. You please the mind by the wealth gained from your actions. 

Sunday, August 30, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 Shloka:

यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते। 

ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि।। 

अर्थात्:

जो निश्‍चित (कार्य/वस्तु) को छोड कर अनिश्‍चित के पीछे भागता है, उसका निश्चित नष्ट हो जाता है, अनिश्चित तो अप्राप्य  ही है । 

Meaning:

One who pursues what is uncertain ignoring what is certain, loses the certain while the uncertain is lost [to him] already.



Thursday, August 27, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

Shloka:

धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्। 

सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति।।

अर्थात्:

विद्वान दूसरों के उपकार के लिए धन और जीवन उत्सर्ग करना चाहिए। क्योंकि जब सभी चीजों का विनाश निश्चित है तब परोपकार के लिए धनादि का उत्सर्ग श्रेष्ठ है। 

Meaning:

Wise people should dedicate their wealth and life for charitableness. As destruction of things is fixed, so it's great to dedicate wealth etc for the benevolence of others.

Wednesday, August 26, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

Shloka:
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।

अर्थात्:

    जगत में जो कुछ सतत परिवर्तनशील संसार है वह सव ईश्वर से व्याप्त है। उसके द्वारा निर्धारित किया गया विषयवस्तु का भोग करो। किसी के भी धन की इच्छा मत करो। 

Meaning:

    Everything, animate and inanimate which are always changing within the universe is controlled and owned by the Lord. One should therefore accept and use those things set aside (as ones quota) by Him. One must not desire things belong to others. 

Sunday, August 9, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अल्पज्ञ एव पुरुषः प्रलपत्यजस्रं

पाण्डित्यसम्भृतमतिस्तु मितप्रभाषी। 

कांस्यं यथा ही कुरुते अतितरां निनादं

तद्वत् सुवर्णमिह नैव करोति नादम्।।

अर्थात् --

     अल्प ज्ञानयुक्त पुरुष निरन्तर बोलता है परन्तु निश्चित बुद्धि वाला व्यक्ति अल्पभाषी होता है। जैसे कांसे का वर्तन अत्यधिक आवाज करता है , उसी प्रकार यहाँ स्वर्ण शब्द नहीं करता है। 



Friday, August 7, 2026

NCERT SANSKRIT BHASHWATI CLASS - 12 CHAPTER - 1 ANUSHASANAM

हिन्दी अनुवाद:

    वेद पढ़ा कर आचार्य शिष्य को उपदेश देते हैं। सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। अपने अध्ययन से आलस्य मत करो। आचार्य के लिए प्रिय धन को लाकर वंश परम्परा को मत तोड़ो। सत्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए। धर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए।कुशल (अर्थात् आत्मरक्षा में उपयोगी) कर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। ऐश्वर्य देने वाले माङ्गलिक कर्मों से प्रमाद नहीं करना चाहिए। स्वाध्याय और प्रवचन से प्रमाद नहीं करना चाहिए। देवकार्य और पितृकार्य से आलस्य नहीं करना चाहिए। माता देवता है। पिता देवता है। आचार्य देवता है। अतिथि देवता है। जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हीं का सेवन करना चाहिये - दूसरों का नहीं। जो हमारे (अर्थात् हम गुरुजनोंके) जो शुभ आचरण हैं तुम्हें उन्हीं की उपासना करनी चाहिए, दूसरे प्रकार के कर्मों की नहीं। यदि तुम्हें कर्म अथवा आचार के विषय में कोई सन्देह हो, तो वहां जो विचारशील, कर्म में नियुक्त, आयुक्त (स्वेच्छा से कर्मपरायण), अरूक्ष (सरलमति) एवं धर्माभिलाषी ब्राह्मण होते हैं,उस प्रसङ्ग में वो जैसा व्यवहार करें; तुम वैसा ही व्यवहार करो। यह आदेश (/विधि) है। यह उपदेश है। यह ज्ञान का सार है। यह शिक्षा है। इसी प्रकार तुम्हें उपासना करनी चाहिए। ऐसा ही आचरण करनी चाहिए।


अभ्यासः

१. एकपदेन उत्तरत:


क)   शिक्षावल्लीतः

ख)   प्रमदः

ग)   अन्तेवासिनम् 

घ)     प्रमदः

ङ)  सुचरितानि 


२. पूर्णवाक्येन उत्तरत:


क)    आचार्यस्य अनवद्यानि कर्माणि सेवितव्यानि।

ख)।   शिष्यः धनमाहृत्य प्रजातन्तुं न व्यवच्छिन्द्यात्।

ग)।    शिष्याः कर्मविचिकित्सा विषये ब्राह्मणानामिव वर्तेरन्।

घ)।  स्वाध्याय - प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्।

ङ)।   ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः, युक्ता आयुक्ताः, अलूक्षाः धर्मकामाश्च स्युः।


३. रिक्तस्थानपूर्तिं कुरुत:


क) वेदमनूच्याचार्यो अन्तेवासिनम् अनुशास्ति।
ख) सत्यं वद धर्मं चर।
ग) यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि।
घ) यथा ते तत्र वर्तेरन् तथा तत्र वर्तेथाः
ङ) एषा वेदोपनिषत्

४. मातृभाषया व्याख्यायेताम्:

क) "देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्" - यह वाक्य तैतिरीय उपनिषद के ग्यारहवेँ अनुवाक् (शिक्षावल्ली) से संकलित 'अनुशासनम्' पाठ से उद्धृत है। उपनिषद का अर्थ ज्ञानार्जन के लिए गुरु के समीप वैठना। गुरु - शिष्य परम्परा के अनुसार अध्ययन के उपरान्त आचार्य शिष्य को जीवनोपयोगी उपदेश देते हैं।
सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। अपने अध्ययन से आलस्य मत करो। आचार्य के लिए प्रिय धन को लाकर वंश परम्परा को मत तोड़ो। सत्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए। धर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। कुशल (अर्थात् आत्मरक्षा में उपयोगी) कर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। ऐश्वर्य देने वाले माङ्गलिक कर्मों से प्रमाद नहीं करना चाहिए। स्वाध्याय और प्रवचन से प्रमाद नहीं करना चाहिए।

तत्पश्चात उपरोक्त वाक्य में गुरु यह उपदेश देते हैं की देवकार्य और पितृकार्य से आलस्य नहीं करना चाहिए। देवता सम्बन्धीय यागयज्ञादि और पितृ सम्बन्धीय श्राद्धादि कर्म अवश्य करनी चाहिए।


ख) "यानि अनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि।" --यह वाक्य तैतिरीय उपनिषद के ग्यारहवेँ अनुवाक् (शिक्षावल्ली) से संकलित 'अनुशासनम्' पाठ से उद्धृत है। उपनिषद का अर्थ ज्ञानार्जन के लिए गुरु के समीप वैठना। गुरु - शिष्य परम्परा के अनुसार अध्ययन के उपरान्त आचार्य शिष्य को जीवनोपयोगी उपदेश देते हैं।

सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। अपने अध्ययन से आलस्य मत करो। आचार्य के लिए प्रिय धन को लाकर वंश परम्परा को मत तोड़ो। सत्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए। धर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। कुशल (अर्थात् आत्मरक्षा में उपयोगी) कर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। ऐश्वर्य देने वाले माङ्गलिक कर्मों से प्रमाद नहीं करना चाहिए। स्वाध्याय और प्रवचन से प्रमाद नहीं करना चाहिए।देवकार्य और पितृकार्य से आलस्य नहीं करना चाहिए। माता देवता है। पिता देवता है। आचार्य देवता है। अतिथि देवता है।

उपरोक्त वाक्य में गुरु यह उपदेश देते हैं की जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हीं का सेवन करना चाहिए।

५. अधोनिर्दिष्टपदानां समानार्थक पदानि कोष्ठकात् चित्वा लिखत --
क) अनूच्य - संबोध्य
ख) संविदा - सद्भावनया
ग) ह्रिया - लज्जया
घ) अलूक्षा - अरूक्षा
ङ) उपास्यम् - अनुपालनीयम्

६. विपरीतार्थकपदैः योजयत --

क) सत्यम् - असत्यम्

ख) धर्मम् - अधर्मम्

ग) श्रद्धया - अश्रद्धया

घ) अवद्यानि - अनवद्यानि

ङ) लूक्षा - अलूक्षा


७. अधोनिर्दिष्टेषु पदेषु प्रकृति-प्रत्यय विभागं कुरुत -

१) प्रमदितव्यम् - प्र + मद् + तव्य

२) अनवद्यम् - अन + वद् + यत्

३) उपास्यम् - उप + आस् + यत्

४) अनुशासनम् - अनु + शास् + ल्यूट्



Sunday, August 2, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

Shloka:

अनेकसंशयोच्छेदी परोक्षार्थस्य दर्शकम्।

सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः।।

अर्थात्:

 अनेक सन्देहों को दूर करने वाला और छिपे हुए अर्थोंको दिखानेवाला शास्त्र, सबका नेत्र है; जिसके पास ज्ञानदायक यह नेत्र स्वरूप शास्त्र नहीं है वह अन्धा जैसा ही है ।

Meaning:

 The shastra is the eye of all which  clarify many doubts and shows the meaning behind. People who don't have this eye like shastra which give knowledge are as blind.


Friday, July 31, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 आरभेत हि कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः ।

कर्माण्यारभमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते।।

अर्थात् --

    कार्यों को धीरे धीरे और वारवार कीजिये। क्योंकि कर्मों को आरम्भ करने वाले व्यक्ति को श्री अर्थात् धन सेवा करता है।

Meaning --

     Do the work slowly again and again. As the person who has started the work is served by wealth.

Thursday, July 30, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 

कर्णामृतं सूक्तिरसं विमुच्य दोषेषु यत्नः सुमहान् खलानाम्। 

निरीक्षते  केलिवनं प्रविश्य क्रमेलकः कण्टकजालमेव।। 

अर्थात् --

 कान के लिए अमृत स्वरूप सूक्ति(/उत्तम वाक्यों जैसे)  रसको छोड़कर बड़े बड़े दुर्जनों का प्रयास दोष निकालने में रहता है। आमोददायक वन में प्रवेश कर ऊँट काण्टेवाले पौधों को ही निरीक्षण करता है। 

Meaning --

          Wicked people always try to find fault leaving the essence of good sayings which are nectar for ear. Just like a camel looks only the thorny bushes entering into a sportive place .

Wednesday, July 29, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

दीर्घप्रयासेन कृतं हि वस्तु निमेषमात्रेण भजेद् विनाशम्।
कर्तुं कुलालस्य तु वर्षमेकं भेत्तुं हि दण्डस्य मुहूर्तमात्रम्।।

अर्थात् -
     बहुत प्रयास से निर्मित वस्तु क्षण मात्र से विनाश को प्राप्त होता है। कुम्हार का (मटका) बनाने के लिए एक साल, (उसको) तोड़ने के लिए दण्ड का मुहूर्त मात्र ही होता है। 
Meaning --
      A thing made after long endeavor gets vanish for just a moment. Just like one year of a potter for making pot is only one moment to destroy it. 

Friday, July 24, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 स्वायत्तमेकांतगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमनज्ञतायाः। 

 विशेषतः सर्वविदांसमाजे विभृषणं मौनमपण्डितानाम्‌ ।।

अर्थात् -

        पूर्णतया स्वाधीन रहनेवाली गुण विधाता द्वारा निर्मित मूर्खता /अज्ञानता का ढक्कन स्वरूप है। मौन विशेष रूप से विद्वत्समाज में मूर्खो के लिए आभूषण स्वरूप ही होता है ।


Meaning --

  Absolute self-dependent is the lid over ignorance made by almighty . Especially in the world of learned people silence works as ornament for foolish. 

Friday, July 3, 2026

NCERT SANSKRIT SHEMUSHI CLASS-10 CHAPTER- 9 BHUKAMPAVIBHEESIKA

 


          २००१ ख्रीष्टाब्द में गणतंत्र दिवस पर्व पर जब समग्र भारतराष्ट्र नृत्य गीत वाद्ययंत्रों के उल्लास में मग्न था तब अचानक ही गुर्जर राज्य चारों ओर से बेचैन, अस्तव्यस्त, विकलक्रन्दन और विपत्ति ग्रस्त हो गया। भूकम्प का भयानक घटणा (प्रलय) समग्र गुर्जरक्षेत्र को विशेषरूप से कच्छजनपद को विनाश के बाद बची हुई वस्तुओं में परिवर्तन किया। भूकम्प का केन्द्रस्वरूप भुजनगर तो मिट्टी के खिलौने के समान टुकडेे होगए। बहुमंजिले मकान क्षण में ही धराशायी होगए(जमीन में मिलगए)। बिजली के खम्बे उखड गये। घरों के सीढीओं के रास्ते बिखर गये। भूमि दो खण्डो में विभाजित हो गई। भूमि के गर्तों से ऊपर निकलती हुई जिनको हटाना कठिन है - ऐसी जलधाराओं से विशाल बाढ का दृश्य उपस्थित हो गया। हजारों संख्या में प्राणियाँ क्षण में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। विनष्ट मकानों में  हजारों पीडिता सहायता के लिए करुण क्रन्दन करते हैं। हे विधाता! भूख से दुर्बल कण्ठवाले मृतप्राय कुछ शिशु भगवत् कृपा से ही दो तीन दिन जीवन धारण किया था।
           यह था कच्छ भूकम्प का अतीव भयावह दृश्य। २००५ ख्रीष्टाब्द में भी कश्मीर प्रान्त में और पाकिस्तान देश में धरती का विशाल कम्पन हुआ।  जिस कारण से लाखों लोग असमय मृत्यु को प्राप्त हुए। पृथ्वी किस कारण से प्रकम्पित होता है- इस विषय में वैज्ञानिकों ने कहते हैं कि धरती के गर्भ के भीतर उपस्थित विशाल प्रस्तर जब संघर्षण(घिसने) के कारण टूटते हैँ तब अत्यधिक मात्रा में प्रस्तरों का अपने स्थान से हटना, और हटने से कम्पन होता है॥ वह भयावह कम्पन ही पृथ्वी के उपरि भाग पर भी आकर महाकम्पन उत्पन्न करती है  जिसे महाविनाश का दृश्य समुपस्थित होता है।
          ज्वालामुखपर्वतों का विस्फोट से भी भूकम्प होता है -ऐसे भूकम्पविशेषज्ञ कहते हैं। पृथ्वी के गर्भ में स्थित अग्नि जब भूमि को खोदने से प्राप्त वस्तु, मिट्टी,प्रस्तर आदि संग्रह को उबालती है तब वो सब ही लावारस को प्राप्त हो कर धरती अथवा पर्वत को फाडकर बाहर निकलता है। तब आकाश धुएँ और राख से ढक जाता है।सेल्सियश-ताप-मात्रा की एकसौ आठ(१०८) अङ्क को प्राप्त यह लावारस जब नदीवेग (नदी के धारा जैसी) से प्रवाहित होता है तब समीप के गाँव अथवा सहर उसके पेट में क्षण में ही समा जाती हैं। 
     और वेचारे (विवश) प्राणी मरते हैं। ज्वाला को प्रकट करते हुए ये पर्वत भी भीषण भूकम्प उत्पन्न करती हैं।
     यद्यपि भूकम्प भाग्य का प्रकोप है, उसको शान्त करने का कोई भी स्थिर उपाय नहीं दिखरहा है। आज भी प्रकृति के सामने विज्ञान से गर्व करने वाला मनुष्य वामन सदृश ही है तथापि भूकम्परहस्य को जानने वाले कहते हैं की बहु मंजिले मकानों का निर्माण नहीं करना चाहीए। नदी किनारे बान्ध बनाकर बृहत् मात्रा में नदी जल को भी एक जगह पर इकट्ठा नहीं करना चाहीए। अन्यथा असन्तुलन के कारण भूकम्प सम्भव है। वस्तुतः(फलस्वरूप) पृथ्वीजलअग्नीवायुआकाश इन पञ्चतत्वों का शान्त होना ही भूभाग का  योगक्षेम के  लिए उचित है॥ उन अशान्त पञ्चतत्त्व निश्चित रूप से महाविनाश को उपस्थापित करते हैं। 
अभ्यासः

१.  अधोलिखितानां प्रश्नानां उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत  -
क)    समस्तराष्ट्रं  नृत्य-गीतवादित्राणाम्  उल्लासे मग्नम् आसीत्।
ख) भूकम्पस्य केन्द्रबिन्दुः कच्छजनपदः आसीत्।
ग) पृथिव्याः स्खलनात् कम्पनं जायते।
घ) समग्रं विश्वम् विपन्नैः आतंकितः दृश्यते।
ङ) ज्वालामुखपर्वतानां विस्फोटैरपि भूकम्पो जायते।
च) बहुभूमिकानि भवनानि धराशायीनि जायन्ते।
२.  
क) भूकम्पविभीषिका विशेषेण कच्छजनपदं केषु परिवर्तितवती?
ख) के कथयन्ति यत् पृथिव्याः अन्तर्गर्भे, पाषाणशिलानां संघर्षणेन कम्पनं जायते?
ग)  विवशाः प्राणिनः कुत्र पिपीलिका इव निहन्यन्ते?
घ) किदृशी भयावहघटना गढ़वाल  क्षेत्रे घटिता?
ङ) तदिदानीं किं विचारणीयम् तिष्ठति?
४.  
क) समग्रं भारतम् उल्लासे मग्नः अस्ति। 
ख) भूकम्पविभीषिका कच्छजनपदं विनष्टं कृतवती।
ग) क्षणेनैव प्राणिनः गृहविहीनाः अभवन्।
घ) शान्तानि पञ्चतत्त्वानि भूतलस्य योगक्षेमाभ्यां भवन्ति।
ङ)  मानवाः पृच्छन्ति यत् बहुभूमिकभवननिर्माणं करणीयम्    न वा?
च) नदीवेगेन ग्रामाः तदुदरे समाविशेत्।
५.
(अ )   परसवर्णसन्धिनियमानुसारम्  -
  क)  किञ्च  -   किम्   +    च
   ख)   नगरन्तु   -   नगरम्    +   तु
   ग)   विपन्नञ्च   -    विपन्नम्   +   च
  घ)    किन्नु    -    किम्   +   नु
   ङ)   भुजनगरन्तु    -   भुजनगरम्   +   तु
   च)    सञ्चयः    -   सम्    +    चयः
(आ)  विसर्गसन्धिनियमानुसारम्   -
    क)   शिशवस्तु    -   शिशवः   +   तु
   ख)    विस्फोटैरपि     -     विस्फोटैः    +   अपि
   ग)   सहस्रशोऽन्ये   -     सहस्रशः     +   अन्ये
   घ)    विचित्रोऽयम्   -    विचित्रः   +   अयम्
   ङ)   भूकम्पो जायते   -   भूकम्पः   +   जायते
   च)    वामनकल्प एव   -   वामनकल्पः   +     एव
६.   (अ)    विलोमपदानां  संयोगं कुरुत   -
                                      क                                     ख
                             सम्पन्नम्                            विपन्नम्
                           ध्वस्तभवनेषु                         नवनिर्मितभवनेषु
                        निस्सरन्तीभिः                               प्रविशन्तीभिः
                                निर्माय                            विनाश्य
                                क्षणेनैव                          सुचिरेणैव
(आ)   समानार्थकपदानां संयोगं कुरुत  - 
                                क                                    ख
                            पर्याकुलम्                       व्याकुलम्
                       विशीर्णाः                                    नष्टाः
                                    उद्गिरन्तः                   प्रकटयन्तः
                                     विदार्य                                      संत्रोट्य
                                 प्रकुपिताम्                       क्रोधयुक्ताम्
     


 ७.  (अ)    प्रकृति-प्रत्यययोः विभागं कुरुत  -
        परिवर्तितवती   -    परि    +   वृत्    +क्तवतु   +   ङीप्  (स्त्री)
       धृतवान्            -      धृ   +    क्तवतु
                 हसन्   -   हस्  +   शतृन्
       विशीर्णा   -    वि    +   शृ  +     क्त    +टाप्
    प्रचलन्ती    -      प्र   +   चल्    +    शतृ    +   ङीप्  (स्त्री)
    हतः     -    हन्            +          क्त
    (आ)   समस्तपदानि लिखत  -
     महत् च तत्  कम्पनं  -   महत्कम्पनं
   दारुणा च सा विभीषिका   -   दारुण-विभीषिका
     ध्वस्तेषु च तेषु भवनेषु   -   ध्वस्तभवनेषु
   प्राक्तने च तस्मिन् युगे    -     प्राक्तनयुगे
    महत् च तत् राष्ट्रं  तस्मिन्   -   महद्राष्ट्रे









   

Tuesday, June 30, 2026

NCERT SANSKRIT SHARADA CLASS - 9 CHAPTER - 1 सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्

अनुवाद -

      संस्कृत-भाषा भारतीयों का एकता साधन करती है, भारतीयत्व सम्पादन करती है, ज्ञानसमूहों का प्रकाश/आलोक दिखाती है और सर्वदा आनन्द के परम्परा को उत्पन्न करती है।

     संस्कृत सभी लोगों के मन को शुद्ध करता है, सभी के वचनों को परिष्कार करता है, सन्मार्ग का प्रेरणा देता है,  सद्गुणों का समूहों को ही उत्पादन करता है।

     संस्कृत विश्वबन्धुत्व का विस्तार करता है, सभी प्राणियों के ऐक्य को समझाता है , चारों ओर शान्ति प्रतिष्ठा करता है और प्रसिद्ध पाञ्च शील/स्वभाव का रीति भी है।

    संस्कृत त्याग, हर्ष और सेवा का व्रत है , प्रपञ्च/संसार का मङ्गल ही करना चाहिए - ऐसा ज्ञान और विज्ञान से संयुक्त विचार है तथा भोग और मोक्ष का मार्ग को प्राप्त/उदय कराता है।

    धर्म के, कामनाओं का,अर्थ का और मोक्ष का भी साधन संस्कृत से मिलता है। इहलोक और परलोक में संस्कृत से उन्नति मिलती है। भक्ति आचरण करने के लिए, ज्ञान प्राप्ति के लिए और कर्म करने के लिए संस्कृत साधन है। इसलिए संस्कृत सत्य, शिव(/कल्याणकारी) और सुन्दर है।

  ललित शब्द संस्कृत रूपी वन में पेड़ सदृश हैं। यह मनोहर मधुर रस की धारागृह है। विश्व प्राणियों के मन को चमत्कार प्राप्त होता है। भारतीय पूर्वजों के कीर्ति समूहों का द्योतक है संस्कृत।


अभ्यासाद् जायते सिद्धिः -


२.  एकपदेन उत्तरं लिखत -

क)  संस्कृतं कस्याः साधकम्?             भारतीयैकतायाः

ख)  सर्वदा संस्कृतं कस्य संदोहदम्?       आनन्दस्य 

ग)   संस्कृतं कस्य प्रेरणादायकम्?          सत्पथस्य

घ)   संस्कृतं कासां परिष्कारकम्?           सर्ववाणीनाम्

च)   कस्य विस्तारकं संस्कृतम्?           विश्वबन्धुत्वस्य


३.      अधोलिखितप्रश्‍नानां उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —

(क)   सर्वतः कस्याः संस्थापकं संस्कृतम्?

उत्तरम् -  सर्वतः शान्त्त्याः  संस्थापकं संस्कृतम्।

(ख) कीदृशं व्रतं  संस्कृतम्?

उत्तरम् -  त्यागसन्तोषसेवायाः च  व्रतं  संस्कृतम्?

(ग) कयोः सम्मेलनम्  संस्कृतम्?

उत्तरम् -   ज्ञानविज्ञानयोः  सम्मेलनम्  संस्कृतम्।

(घ) संस्कृतं कस्य चमत्कारकम्?

उत्तरम् - संस्कृतं  विश्वचेतस्य चमत्कारकम्।

(ङ) केषां यशः स्मारकं संस्कृतम्?

उत्तरम् -  पूर्वजानां  यशः स्मारकं संस्कृतम्।

४.   रिक्‍तस्थानानि पूरयन्तु — 

यथा—..सर्वभूतैकता...-कारकं संस्कृतम्।

(क) ....भारतीयत्व  सम्पादकं संस्कृतम्।

(ख) ...ज्ञानपुञ्जप्रभा.... दर्शकं संस्कृतम्।

(ग) ...सर्वमस्तिष्क...संस्कारकं संस्कृतम्।

(घ) कर्मदं.....ज्ञानदं.... भक्‍तिदं संस्कृतम्।

(ङ) सत्यनिष्‍ठं ....शिवं सुन्दरं... संस्कृतम्।

(च) शब्दलालित्य ...लीलावनं... संस्कृतम्।


५.  मञ्जूषाया: पदान‍ि उपयुज्‍य षड् वाक्यानि रचयत —

क)   संस्कृत-भाषा भारतीयानां एकता साधयति।/अङगुलीनां एकता हेतोः मुष्टिः संभवति।

ख)   विश्वस्य सर्वतः संस्कृत भाषा शान्तिं संस्थापयति।/ सर्वतः प्रासादानां विस्तारेण हरितबृक्षाः क्रीडाप्रान्तराश्च नष्टाः जायन्ते।

ग)     सत्पथे प्रेरयितुं संस्कृत-भाषा शिक्षयति।/अस्मान् सत्पथे प्रेरयितुं अस्माकं परिवारस्यावदानं श्रेष्ठमस्ति।

घ)   स्वामी विवेकानन्दो तथा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आदीनां पूर्वजानां कार्याणि विश्वकल्याणाय उद्दिष्टानि।

ङ)    जीवने समृद्धिनिमित्तं त्यागस्य अत्यावश्यकमस्ति।

च)     'लौहपुरुषः' इत्युपाधिः सर्दार वल्लभभाई पटेल महोदयस्य सेवाव्रतस्य परिचायिका अस्ति।


६.   अधोलिखितानां समस्तपदानां उदाहरणानुसारं विग्रहं  कुरुत —

क)।  ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम्   -  ज्ञानपुञ्जप्रभायाः दर्शकम्

ख)   सर्ववाणीपरिष्कारकम्    -   सर्ववाण्याः परिष्कारकम् 

ग)    विश्वबन्धुत्वविस्तारकम्   -  विश्वबन्धुत्वस्य विस्तारकम्    

घ)।  सर्वभूतैकताकारकम्     -   सर्वभूतैकतायाः कारकम्

ङ)   शान्तिसंस्थापकम्         -    शान्त्याः संस्थापकम्

च)   ज्ञानविज्ञानसम्मेलनम्   -  ज्ञानविज्ञानयोः सम्मेलनम्

७.   प्रदत्तमञ्जूषातः पर्यायपदानि चित्वा रिक्‍तस्थाने लिखत

क) (क) विद्वांसः .तेजोराशयः.. भवन्ति ।

(ख) सूर्यस्य....किरणः..सर्वेषां प्राणीनां कृते हितकरः भवति ।

(ग) ईश्‍वरं स्मृत्वा ...उल्लासः..उपजायते।

(घ) विद्यायाः ...मानम्.... अजरं भवति ।

(ङ) प्रकृतेः शोभा .... अनुपमा... विद्यते।

(च) यत्र....जगत्.... एकनीडं भवति ।

८.  अधोलिखितानां मेलनं कुरुत —

(क) भारतीयैकतायाः                 -    २. साधकम्         

(ख) सत्पथे                              -    ४. प्रेरणादायकम् 

(ग) त्यागसन्तोषसेवारूपम्          -    ५. व्रतम्            

(घ) ज्ञानपुञ्जप्रभायाः                -     ३. दर्शकम् 

(ङ) विश्‍वबन्धुत्वस्य                    -    १.  विस्तारकम्



समाप्तम्               

Wednesday, June 3, 2026

सुभाषितम्( THOUGHT OF THE DAY)

दुर्लभान्यपि कार्याणि सिध्यन्ति प्रोद्यमेन ही। 

शिलापि तनुतां याति प्रपातेनार्णसो मुहुः।। 

अर्थात्,

   कठिन से कठिनतर कार्य भी उद्यम/प्रयास से निश्चितरूप से सिद्धिप्रद/सफल होते हैं। क्योंकि जल बार-बार गिरने से पत्थर भी क्षीण/छोटा हो जाता है।

Meaning -

Difficult actions certainly get success due to continuous effort. Just as regular flow of water even shorten the stone.

Monday, June 1, 2026

सुभाषितम्( THOUGHT OF THE DAY)

 

सा विद्या या मदं हन्ति सा श्रीर्यार्थिषु वर्षति।

धर्मानुसारिणी या च सा बुद्धिरभिधीयते॥

अर्थात्,

            विद्या वह है, जो अहंकार को नष्ट करे। लक्ष्मी वह है जो याचकों पर वरषे । बुद्धि वह कही जाती है जो धर्मानुसारिणी हो।

Meaning -

           Wisdom is that which keeps pride away. Lakshmi/ wealth is that which showers upon the supplicants. And intellect is said to be that which follows 'Dharma'.

Sunday, May 31, 2026

ANKA GANANAM( COUNTING OF NUMBERS)

ब्रम्हेकम् (१)  

                       पक्षद्वयम् (२) 

त्रिसन्ध्यम् (३) 

                        चतुर्वेदम् (४)

पञ्चामृतं (५)

                        षड् ऋतवः (६)

सप्त वासराः (७)

                         अष्ट प्रहराः (८)

नव रसाः (९)

                           दश अवताराः (१०) ।।



Sunday, May 24, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अनादानमदत्त स्यास्तेयव्रतमुदीदितम्। 

बाह्याः प्राणा नृणामर्थो हरता तं हता ही ते।। 

अर्थात्, 

न दी गई वस्तु को न लेना अस्तेय विद्या(/चोरी न करने का नियम) कहा गया है। धन मनुष्यों का   बाहरी प्राण है। जिसने उन धन को ले लिया उसने उन प्राणों को ही हरण कर लिया ।

Friday, May 22, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 उपायेषु स्थितस्यापि नश्यन्त्यर्थाः प्रमाद्यतः।

अर्थात्, 

           युक्तिपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्ति के कार्य भी असावधानता के कारण नष्ट हो जाते हैं। 

Saturday, May 9, 2026

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 CHAPTER -.8 VASTRA VIKRAYAH

वस्त्र विक्रयः

अष्टम पाठः

(तब अनुचर के साथ विदेशी गौरांग का प्रवेश होता है। वह राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र दिखाकर सेठ और जुलाहको डांटता है ।)
वैदेशिक गौरांगः - जुलाहा! राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र देखो। तुम विक्रेता नहीं हो।
तन्तुवायः - तब मैं इस वस्त्र का क्या करुंगा ?
वै गोराङ्गः - इस वस्त्र को मुझे देदो, मैं इसे वेचुंगा, यह पचास मुद्रा लो/ग्रहण करो।(पचास मुद्रा देता है)
तन्तुवायः - (आश्चर्य के साथ देखकर) क्या यह उचित है? इससे कैसे मेरे परिवार का पालन-पोषण होगा? छह महीने से कैसे भी रातदिन परिश्रम से यह वस्त्र वना है।
वै गोराङ्गः - यह मुद्रा लो, मैं कुछ नहीं जानता हूं। चूप रहो, जाओ। और दूसरा वस्त्र वना कर मेरे पास ही लाओ। तुम्हारे परिवार की रक्षा के लिए मुझसे कोई प्रतिज्ञा नहीं किया गया है। कैसे रक्षा होनी चाहिए यह तुम जानो अभी जाओ।
(वह मुद्रा नहीं लेता है इसलिए दूसरा जुलाहा वस्त्र बेचने के लिए प्रवेश कर वस्त्र खरीदने के लिए सेठ को दिखलाता है ।) 

तन्तुवायः -- सेठ्! वस्त्र लो। 
श्रेष्ठिन् - ( नेत्रपटल से सूचित कर) ये खरीदेगा। मैं खरीदने के लिए समर्थ नहीं हूँ। 
तन्तुवायः - कैसे?
श्रेष्ठी - इस के पास राजा के प्रमाणपत्र है ये ही खरीदेगा। दूसरा नहीं। 
वै. गौराङ्गः - इधर आओ।(जुलाहा को बुलाता है, प्रमाणपत्र दिखाता है, वस्त्र लेता है। ) ये चालीस मुद्रा लो। 
(मुद्रा देता है) 
तन्तुवायः - महाराज! क्या यह उचित है? क्या यह न्याय है? 
वै.गौराङ्गः - जाओ जाओ। मैं न्याय अथवा अन्याय जानता नहीं हूं। जो मुझसे निश्चय किया गया और दिया गया वही मूल्य ही है ।
(उभय उसके द्वारा दिए गए मूल्य को ग्रहण करते हैं।)

उभौ तन्तुवायौ - इसके बाद वस्त्र निर्माण नहीं करेंगे।(यह कहकर चले जाते हैं।)
वै.गौराङ्गः - (अनुचर को उद्देश्य कर) देखो। इनसे बहुत मुद्रा ले लेंगे। इन् वस्त्र द्वय का सौ न्दर्य अवर्णनीय है।यह वस्त्र अत्यधिक महीन है। देखो, इसके पांच छह परत ढका हुआ होने पर भी शरीर वस्त्र रहित प्रतीत होता है। आः कैसे इनके सामने हमारे देशीय वस्त्रों का विक्रय होगा, इस प्रकार हमारे देशीय व्यापार समाप्त हुआ। (फिर सोच कर)
श्लोकः -
इसी सूक्ष्म वस्त्र का निर्माण के रीति को समूल नष्ट करने में मैं समर्थ हूँ। इसलिए यहाँ उन वस्त्र वनानेवाले कारीगरों को पिटाई /अत्याचार रूप दण्ड देकर वस्त्र वनाने से मुक्त करूंगा/रोकुंगा। उस अधिक वाणिज्य योग्य अत्यधिक उन्नत कुशलता/ निपुणता नीचे जाना चाहिए। इस देश का उन्नति लोककथा माध्यम से ही समाहित होता है।
दौवारिकः - जय हो जय हो देव!
वै.गौराङ्गः - दौवारिक! शीघ्र ही तीन चार जुलाहों को लेकर आओ।
दौवारिकः - प्रभु जो आदेश करते हैं। (बाहर जा कर तीन जुलाहों को साथ लाकर प्रवेश करता है।)
वै. गौरांगः - (जुलाहों को उद्देश्य कर) तुम लोगों ने निर्माण किया हुआ वस्त्रों को मुझे देदो।
तन्तुवायाः - हम अनुचित मूल्य के कारण वस्त्र नहीं बनाते हैं।
वै.गौराङ्गः - ठीक् है सुन्दर वस्त्र बना कर मुझे दो, उचित मूल्य होगा। ये मुद्राएं लो। (पन्द्रह मुद्राएं देता है। वो नहीं लेते हैं। बलपूर्वक उनके वस्त्र में बांध कर हाथ में गर्दन पकड़ कर बाहर निकाल देता है।)
तन्तुवायाः - (द्वार पर रह कर) महाराज! हम सौ मूल्य के वस्त्र को पचास मुद्राओं से नहीं बनाएंगे।
वै.गौराङ्गः - (आक्षेप करते हुए) ये कौन शोर कर रहे हैं? (द्वार पर जाकर गुस्से से, उनको डण्डे से मारता है।) जाओ दूसरा सुन्दर वस्त्र बनाकर लाओ।(मुद्रा फेंक कर वे चले जाते हैं)
वै.गौराङ्गः - (अनुचर को लक्ष्य  कर) हे हे अन्य तीन चार जुलाहों को लाओ।(वह बाहर जा कर चार जुलाहों को लाकर )
महाराज! ये आगये।
वै.गौराङ्गः - (जुलाहों को लक्ष्य कर) बनाया गया रेशमी वस्त्रों को मुझे देदो।
तन्तुवायाः - हम वस्त्र नहीं बना रहे हैं।
वै.गौराङ्गः - यह झूठ है। तुम लोग वस्त्रों को बनाकर सेठ लोगों के पास बेचते हो।(सभी को कोड़े से मारने के लिए डांटता है।)
सर्वे - हम नहीं बना रहे हैं।(बंधे हुए जोडो हस्तोंवाले (वे सब) कांपते हैं।)
(सब निकल गये)



अभ्यासः

१. प्रश्नानामुत्तराणि संस्कृतभाषया देयानि -
क) अयं पाठः 'भारतविजयनाटकम्'इति ग्रन्थात् संकलितः पं. मथुराप्रसाद दीक्षितः च तस्य प्रणेता।
ख) वै.गौराङ्गः राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्रं संदर्श्य श्रेष्ठीनौ तन्तुवायञ्च भर्त्सयति।
ग) षड्भिर्मासैः कथमपि रात्रिन्दिवं परिश्रम्य तन्तुवायेन पटः निष्पादितः।
घ) यन्मया निश्चीयते दीयते च तदेव मूल्यं इति कथनं वै.गौराङ्गस्यास्ति।
ङ) तन्तुवायाः कोशेयपटस्य निर्माणमकुर्वन्।
च)। यूयं निर्मितान् पटान् मह्यं दत्त इति वै.गौराङ्गः तन्तुवायान् प्रति कथयति।
छ) गौराङ्गः तन्तुवायान् हठात् तेषां बसने निवध्य गलहस्तेन निष्कासयति।
ज) वैदेशिक गौरांगः तन्तुवायान् कशया ताड़यितुं भर्त्सयति।
२.
क) कथमेतेन मम कुटुम्बस्य भरणपोषणे भविष्यतः।
ख) अनिर्वचनीयं एतत् पटयोः सौन्दर्यम्।
ग) कथमेतत्समक्षमस्मद्देशीयानां पटानां विक्रयो भविष्यति।
घ) शोभनं पटं निर्माय मह्यं दत्त, योग्यं मूल्यं भविष्यति।
ङ) यूयं पटान् निर्माय श्रेष्ठिनां सविधे विक्रीणीध्वे। 
३.  सप्रसङ्गम् व्याख्यायन्ताम् -
   क) युष्मत्कुटुम्बरक्षायै  ...….......... जानीहि व्रजाधुना।
        वाक्यमेतत् महामहोपाध्याय पंडित मथुरा प्रसाद दीक्षितकृतं "भारतविजयनाटकम्" इति ग्रन्थात् संकलितो 'वस्त्रविक्रयः' इति पाठादानीतम्। अस्मिन् वाक्ये वै. गौराङ्गः तन्तुवायान् प्रति कथयति यत् युष्मत् परिवाररक्षार्थं अहं काऽपि प्रतिज्ञा न कृतवान्। तेषां रक्षा कथं भवेत् तत् त्वमेव ज्ञास्यसि। संप्रति गच्छ। 
भारतवर्षे वेदेशिक शासनसमये वस्त्रक्रयविक्रयश्च कथं अचलत् तेन च तन्तूवायानां कुटुम्बरक्षा कथं अभवत् तस्मिन् विषये अत्र वर्णितमस्ति। यदा तन्तुवायः वस्त्रविक्रयार्थं श्रेष्ठिनौ पटं दर्शयति स्म तौ अपि च तं एकशतमुद्रा दातुं निश्चितवन्तौ तदा वै.गौराङ्गः अनुचरेण सह तत्र संप्राप्तः। सः तान् राजमुद्राङ्कितप्रमाणपत्रं प्रदर्शयति येन तन्तुवायः स्वयं मूल्य निर्धारणं कृत्वा कुत्रचिदपि पटं विक्रेतुम् असमर्थः।  पटं निर्माय सः वै.गौराङ्गमेव समर्पयिष्यति। वै.गौराङ्गः तस्य पटं नीत्वा तं पञ्चाशत् मुद्राः अददात् । परन्तु तत् मूल्यं  अनुचितम् अथ च ताभिः मुद्राभिः तस्य परिवारस्य पालनपोषणञ्च कथं भविष्यति इति एतत् कारणात् सः अस्वीकृतवान्। अपि च षड्भिर्मासैः कथमपि रात्रिन्दिवं परिश्रम्य तत्पटः निष्पादितः।
परन्तु वै.गौराङ्गः तस्य वचः अश्रुत्वा बाध्यतापूर्वकं तं उपरोक्तवाक्यमकथयत् यत् इमा मुद्रा गृह्णीष्व। अहं किमपि न जानामि। मौनम् तिष्ठ,गच्छ। अपरं पटं निर्माय मत् समीप एव आनय। युष्मत् कुटुम्बरक्षायै अहं प्रतिज्ञा न कृतवान्। कथं रक्षा भवेत् तत् त्वम् जानीहि, अधुना गच्छ।

ख)  अनिर्वचनीयमेतत्पटयोः......................अङ्गम्। 
        एषा उक्तिः महामहोपाध्याय पं मथुरा प्रसाद दीक्षितेन कृतं "महाविजयनाटकम्" इति ग्रन्थात् संकलितो 'वस्त्रविक्रयः' इति पाठादानीता। अत्र वै. गौराङ्गः अनुचरमुद्दिश्य  वस्त्रस्य प्रशंसा करोति।
 ग)। न वयमयोग्यमूल्यत्वात् पटं निर्मामः।

४.  सन्धि विच्छेदं कुरुत -
      क)  विंशत्यधिकम्  - विंशति + अधिकम्
      ख)  मुद्राङ्कितम्    - मुद्रा।   + अङ्कितम् 
      ग)।  विधेरुन्मूलनम्।  -  विधेः  +। उन्मूलनम् 
      घ)।  मोचयिष्याम्यतः। -  मोचयिष्यामि + अतः 
      ङ)   सामर्षम्   -   स+।  आमर्षम् 
५.  श्लोकस्य स्वमातृभाषया अनुवादः -
    
      इसी सूक्ष्म वस्त्र का निर्माण के रीति को समूल नष्ट करने में मैं समर्थ हूँ। इसलिए यहाँ उन वस्त्र वनानेवाले कारीगरों को पिटाई /अत्याचार रूप दण्ड देकर  वस्त्र वनाने से मुक्त करूंगा/रोकुंगा। उस अधिक वाणिज्य योग्य अत्यधिक उन्नत कुशलता/ निपुणता नीचे जाना चाहिए। इस देश का उन्नति लोककथा माध्यम से ही समाहित होता है।
६.  प्रकृति प्रत्यय
 क)  विक्रेतुम्  -  वि + क्री + तुमुन् 
 ख)  अनिर्वचनीयम् -  नञ् + निर् + वच् + अनीयर्
 ग)।  विचिन्त्य।   वि + चिन्त् + ल्यप् 
 घ)   गत्वा   -  गम्  + क्त्वाच्
 ङ)। निवध्य -  नि + हन् + यत्
 च)  निर्माय।  -  निर् + मा + ल्यप् 
 छ)   अभिलक्ष्य-  अभि + लक्ष्+  ल्यप् 





Thursday, May 7, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रिया।

चित्ते वाचि क्रियायां च साधूनामेकरूपता।।

अर्थात्,

   जैसा मन वैसे ही वाणी, जैसी वाणी वैसे ही कार्य होता है। सज्जनों के मन, वाणी और कार्य में समानता होती है।

Meaning --

As the mind so is the speech and as the speech so is the action. There is equality in thought, speech and actions of noble people. 

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

Shloka: मूढ़ जहीहि धनागम तृष्णां, कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्। यल्लभसे निजकर्मोपात्तं, वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ।। अर्थात्: हे मुर्ख! ध...