Wednesday, June 3, 2026

सुभाषितम्( THOUGHT OF THE DAY)

दुर्लभान्यपि कार्याणि सिध्यन्ति प्रोद्यमेन ही। 

शिलापि तनुतां याति प्रपातेनार्णसो मुहुः।। 

अर्थात्,

   कठिन से कठिनतर कार्य भी उद्यम/प्रयास से निश्चितरूप से सिद्धिप्रद/सफल होते हैं। क्योंकि जल बार-बार गिरने से पत्थर भी क्षीण/छोटा हो जाता है।

Meaning -

Difficult actions certainly get success due to continuous effort. Just as regular flow of water even shorten the stone.

Monday, June 1, 2026

सुभाषितम्( THOUGHT OF THE DAY)

 

सा विद्या या मदं हन्ति सा श्रीर्यार्थिषु वर्षति।

धर्मानुसारिणी या च सा बुद्धिरभिधीयते॥

अर्थात्,

            विद्या वह है, जो अहंकार को नष्ट करे। लक्ष्मी वह है जो याचकों पर वरषे । बुद्धि वह कही जाती है जो धर्मानुसारिणी हो।

Meaning -

           Wisdom is that which keeps pride away. Lakshmi/ wealth is that which showers upon the supplicants. And intellect is said to be that which follows 'Dharma'.

Sunday, May 31, 2026

ANKA GANANAM( COUNTING OF NUMBERS)

ब्रम्हेकम् (१)  

                       पक्षद्वयम् (२) 

त्रिसन्ध्यम् (३) 

                        चतुर्वेदम् (४)

पञ्चामृतं (५)

                        षड् ऋतवः (६)

सप्त वासराः (७)

                         अष्ट प्रहराः (८)

नव रसाः (९)

                           दश अवताराः (१०) ।।



Sunday, May 24, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अनादानमदत्त स्यास्तेयव्रतमुदीदितम्। 

बाह्याः प्राणा नृणामर्थो हरता तं हता ही ते।। 

अर्थात्, 

न दी गई वस्तु को न लेना अस्तेय विद्या(/चोरी न करने का नियम) कहा गया है। धन मनुष्यों का   बाहरी प्राण है। जिसने उन धन को ले लिया उसने उन प्राणों को ही हरण कर लिया ।

Friday, May 22, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 उपायेषु स्थितस्यापि नश्यन्त्यर्थाः प्रमाद्यतः।

अर्थात्, 

           युक्तिपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्ति के कार्य भी असावधानता के कारण नष्ट हो जाते हैं। 

Saturday, May 9, 2026

NCERT SANSKRIT BHASWATI CLASS - 11 CHAPTER -.8 VASTRA VIKRAYAH

वस्त्र विक्रयः

अष्टम पाठः

(तब अनुचर के साथ विदेशी गौरांग का प्रवेश होता है। वह राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र दिखाकर सेठ और जुलाहको डांटता है ।)
वैदेशिक गौरांगः - जुलाहा! राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र देखो। तुम विक्रेता नहीं हो।
तन्तुवायः - तब मैं इस वस्त्र का क्या करुंगा ?
वै गोराङ्गः - इस वस्त्र को मुझे देदो, मैं इसे वेचुंगा, यह पचास मुद्रा लो/ग्रहण करो।(पचास मुद्रा देता है)
तन्तुवायः - (आश्चर्य के साथ देखकर) क्या यह उचित है? इससे कैसे मेरे परिवार का पालन-पोषण होगा? छह महीने से कैसे भी रातदिन परिश्रम से यह वस्त्र वना है।
वै गोराङ्गः - यह मुद्रा लो, मैं कुछ नहीं जानता हूं। चूप रहो, जाओ। और दूसरा वस्त्र वना कर मेरे पास ही लाओ। तुम्हारे परिवार की रक्षा के लिए मुझसे कोई प्रतिज्ञा नहीं किया गया है। कैसे रक्षा होनी चाहिए यह तुम जानो अभी जाओ।
(वह मुद्रा नहीं लेता है इसलिए दूसरा जुलाहा वस्त्र बेचने के लिए प्रवेश कर वस्त्र खरीदने के लिए सेठ को दिखलाता है ।) 

तन्तुवायः -- सेठ्! वस्त्र लो। 
श्रेष्ठिन् - ( नेत्रपटल से सूचित कर) ये खरीदेगा। मैं खरीदने के लिए समर्थ नहीं हूँ। 
तन्तुवायः - कैसे?
श्रेष्ठी - इस के पास राजा के प्रमाणपत्र है ये ही खरीदेगा। दूसरा नहीं। 
वै. गौराङ्गः - इधर आओ।(जुलाहा को बुलाता है, प्रमाणपत्र दिखाता है, वस्त्र लेता है। ) ये चालीस मुद्रा लो। 
(मुद्रा देता है) 
तन्तुवायः - महाराज! क्या यह उचित है? क्या यह न्याय है? 
वै.गौराङ्गः - जाओ जाओ। मैं न्याय अथवा अन्याय जानता नहीं हूं। जो मुझसे निश्चय किया गया और दिया गया वही मूल्य ही है ।
(उभय उसके द्वारा दिए गए मूल्य को ग्रहण करते हैं।)

उभौ तन्तुवायौ - इसके बाद वस्त्र निर्माण नहीं करेंगे।(यह कहकर चले जाते हैं।)
वै.गौराङ्गः - (अनुचर को उद्देश्य कर) देखो। इनसे बहुत मुद्रा ले लेंगे। इन् वस्त्र द्वय का सौ न्दर्य अवर्णनीय है।यह वस्त्र अत्यधिक महीन है। देखो, इसके पांच छह परत ढका हुआ होने पर भी शरीर वस्त्र रहित प्रतीत होता है। आः कैसे इनके सामने हमारे देशीय वस्त्रों का विक्रय होगा, इस प्रकार हमारे देशीय व्यापार समाप्त हुआ। (फिर सोच कर)
श्लोकः -
इसी सूक्ष्म वस्त्र का निर्माण के रीति को समूल नष्ट करने में मैं समर्थ हूँ। इसलिए यहाँ उन वस्त्र वनानेवाले कारीगरों को पिटाई /अत्याचार रूप दण्ड देकर वस्त्र वनाने से मुक्त करूंगा/रोकुंगा। उस अधिक वाणिज्य योग्य अत्यधिक उन्नत कुशलता/ निपुणता नीचे जाना चाहिए। इस देश का उन्नति लोककथा माध्यम से ही समाहित होता है।
दौवारिकः - जय हो जय हो देव!
वै.गौराङ्गः - दौवारिक! शीघ्र ही तीन चार जुलाहों को लेकर आओ।
दौवारिकः - प्रभु जो आदेश करते हैं। (बाहर जा कर तीन जुलाहों को साथ लाकर प्रवेश करता है।)
वै. गौरांगः - (जुलाहों को उद्देश्य कर) तुम लोगों ने निर्माण किया हुआ वस्त्रों को मुझे देदो।
तन्तुवायाः - हम अनुचित मूल्य के कारण वस्त्र नहीं बनाते हैं।
वै.गौराङ्गः - ठीक् है सुन्दर वस्त्र बना कर मुझे दो, उचित मूल्य होगा। ये मुद्राएं लो। (पन्द्रह मुद्राएं देता है। वो नहीं लेते हैं। बलपूर्वक उनके वस्त्र में बांध कर हाथ में गर्दन पकड़ कर बाहर निकाल देता है।)
तन्तुवायाः - (द्वार पर रह कर) महाराज! हम सौ मूल्य के वस्त्र को पचास मुद्राओं से नहीं बनाएंगे।
वै.गौराङ्गः - (आक्षेप करते हुए) ये कौन शोर कर रहे हैं? (द्वार पर जाकर गुस्से से, उनको डण्डे से मारता है।) जाओ दूसरा सुन्दर वस्त्र बनाकर लाओ।(मुद्रा फेंक कर वे चले जाते हैं)
वै.गौराङ्गः - (अनुचर को लक्ष्य  कर) हे हे अन्य तीन चार जुलाहों को लाओ।(वह बाहर जा कर चार जुलाहों को लाकर )
महाराज! ये आगये।
वै.गौराङ्गः - (जुलाहों को लक्ष्य कर) बनाया गया रेशमी वस्त्रों को मुझे देदो।
तन्तुवायाः - हम वस्त्र नहीं बना रहे हैं।
वै.गौराङ्गः - यह झूठ है। तुम लोग वस्त्रों को बनाकर सेठ लोगों के पास बेचते हो।(सभी को कोड़े से मारने के लिए डांटता है।)
सर्वे - हम नहीं बना रहे हैं।(बंधे हुए जोडो हस्तोंवाले (वे सब) कांपते हैं।)
(सब निकल गये)



अभ्यासः

१. प्रश्नानामुत्तराणि संस्कृतभाषया देयानि -
क) अयं पाठः 'भारतविजयनाटकम्'इति ग्रन्थात् संकलितः पं. मथुराप्रसाद दीक्षितः च तस्य प्रणेता।
ख) वै.गौराङ्गः राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्रं संदर्श्य श्रेष्ठीनौ तन्तुवायञ्च भर्त्सयति।
ग) षड्भिर्मासैः कथमपि रात्रिन्दिवं परिश्रम्य तन्तुवायेन पटः निष्पादितः।
घ) यन्मया निश्चीयते दीयते च तदेव मूल्यं इति कथनं वै.गौराङ्गस्यास्ति।
ङ) तन्तुवायाः कोशेयपटस्य निर्माणमकुर्वन्।
च)। यूयं निर्मितान् पटान् मह्यं दत्त इति वै.गौराङ्गः तन्तुवायान् प्रति कथयति।
छ) गौराङ्गः तन्तुवायान् हठात् तेषां बसने निवध्य गलहस्तेन निष्कासयति।
ज) वैदेशिक गौरांगः तन्तुवायान् कशया ताड़यितुं भर्त्सयति।
२.
क) कथमेतेन मम कुटुम्बस्य भरणपोषणे भविष्यतः।
ख) अनिर्वचनीयं एतत् पटयोः सौन्दर्यम्।
ग) कथमेतत्समक्षमस्मद्देशीयानां पटानां विक्रयो भविष्यति।
घ) शोभनं पटं निर्माय मह्यं दत्त, योग्यं मूल्यं भविष्यति।
ङ) यूयं पटान् निर्माय श्रेष्ठिनां सविधे विक्रीणीध्वे। 
३.  सप्रसङ्गम् व्याख्यायन्ताम् -
   क) युष्मत्कुटुम्बरक्षायै  ...….......... जानीहि व्रजाधुना।
        वाक्यमेतत् महामहोपाध्याय पंडित मथुरा प्रसाद दीक्षितकृतं "भारतविजयनाटकम्" इति ग्रन्थात् संकलितो 'वस्त्रविक्रयः' इति पाठादानीतम्। अस्मिन् वाक्ये वै. गौराङ्गः तन्तुवायान् प्रति कथयति यत् युष्मत् परिवाररक्षार्थं अहं काऽपि प्रतिज्ञा न कृतवान्। तेषां रक्षा कथं भवेत् तत् त्वमेव ज्ञास्यसि। संप्रति गच्छ। 
भारतवर्षे वेदेशिक शासनसमये वस्त्रक्रयविक्रयश्च कथं अचलत् तेन च तन्तूवायानां कुटुम्बरक्षा कथं अभवत् तस्मिन् विषये अत्र वर्णितमस्ति। यदा तन्तुवायः वस्त्रविक्रयार्थं श्रेष्ठिनौ पटं दर्शयति स्म तौ अपि च तं एकशतमुद्रा दातुं निश्चितवन्तौ तदा वै.गौराङ्गः अनुचरेण सह तत्र संप्राप्तः। सः तान् राजमुद्राङ्कितप्रमाणपत्रं प्रदर्शयति येन तन्तुवायः स्वयं मूल्य निर्धारणं कृत्वा कुत्रचिदपि पटं विक्रेतुम् असमर्थः।  पटं निर्माय सः वै.गौराङ्गमेव समर्पयिष्यति। वै.गौराङ्गः तस्य पटं नीत्वा तं पञ्चाशत् मुद्राः अददात् । परन्तु तत् मूल्यं  अनुचितम् अथ च ताभिः मुद्राभिः तस्य परिवारस्य पालनपोषणञ्च कथं भविष्यति इति एतत् कारणात् सः अस्वीकृतवान्। अपि च षड्भिर्मासैः कथमपि रात्रिन्दिवं परिश्रम्य तत्पटः निष्पादितः।
परन्तु वै.गौराङ्गः तस्य वचः अश्रुत्वा बाध्यतापूर्वकं तं उपरोक्तवाक्यमकथयत् यत् इमा मुद्रा गृह्णीष्व। अहं किमपि न जानामि। मौनम् तिष्ठ,गच्छ। अपरं पटं निर्माय मत् समीप एव आनय। युष्मत् कुटुम्बरक्षायै अहं प्रतिज्ञा न कृतवान्। कथं रक्षा भवेत् तत् त्वम् जानीहि, अधुना गच्छ।

ख)  अनिर्वचनीयमेतत्पटयोः......................अङ्गम्। 
        एषा उक्तिः महामहोपाध्याय पं मथुरा प्रसाद दीक्षितेन कृतं "महाविजयनाटकम्" इति ग्रन्थात् संकलितो 'वस्त्रविक्रयः' इति पाठादानीता। अत्र वै. गौराङ्गः अनुचरमुद्दिश्य  वस्त्रस्य प्रशंसा करोति।
 ग)। न वयमयोग्यमूल्यत्वात् पटं निर्मामः।

४.  सन्धि विच्छेदं कुरुत -
      क)  विंशत्यधिकम्  - विंशति + अधिकम्
      ख)  मुद्राङ्कितम्    - मुद्रा।   + अङ्कितम् 
      ग)।  विधेरुन्मूलनम्।  -  विधेः  +। उन्मूलनम् 
      घ)।  मोचयिष्याम्यतः। -  मोचयिष्यामि + अतः 
      ङ)   सामर्षम्   -   स+।  आमर्षम् 
५.  श्लोकस्य स्वमातृभाषया अनुवादः -
    
      इसी सूक्ष्म वस्त्र का निर्माण के रीति को समूल नष्ट करने में मैं समर्थ हूँ। इसलिए यहाँ उन वस्त्र वनानेवाले कारीगरों को पिटाई /अत्याचार रूप दण्ड देकर  वस्त्र वनाने से मुक्त करूंगा/रोकुंगा। उस अधिक वाणिज्य योग्य अत्यधिक उन्नत कुशलता/ निपुणता नीचे जाना चाहिए। इस देश का उन्नति लोककथा माध्यम से ही समाहित होता है।
६.  प्रकृति प्रत्यय
 क)  विक्रेतुम्  -  वि + क्री + तुमुन् 
 ख)  अनिर्वचनीयम् -  नञ् + निर् + वच् + अनीयर्
 ग)।  विचिन्त्य।   वि + चिन्त् + ल्यप् 
 घ)   गत्वा   -  गम्  + क्त्वाच्
 ङ)। निवध्य -  नि + हन् + यत्
 च)  निर्माय।  -  निर् + मा + ल्यप् 
 छ)   अभिलक्ष्य-  अभि + लक्ष्+  ल्यप् 





Thursday, May 7, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रिया।

चित्ते वाचि क्रियायां च साधूनामेकरूपता।।

अर्थात्,

   जैसा मन वैसे ही वाणी, जैसी वाणी वैसे ही कार्य होता है। सज्जनों के मन, वाणी और कार्य में समानता होती है।

Meaning --

As the mind so is the speech and as the speech so is the action. There is equality in thought, speech and actions of noble people. 

Wednesday, May 6, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 न च शत्रुरवज्ञेयो दुर्बलोऽपि बलीयसा।

अल्पोऽपि हि दहत्यग्निर्विषमल्पं हिनस्ति च।।

अर्थात्,

  बलवान व्यक्ति को  शत्रु का उपेक्षा दुर्बल होने पर भी नहीं करनी चाहिए। क्योंकि थोड़ी सी भी अग्नि जला देती है और थोड़ा-सा विष भी मार डालता है।

Meaning --

A powerful man should not ignore the enemies even the weak one. Because a little bit of fire also burns and even a small amount of poison kills.


Tuesday, May 5, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अति सर्वनाश हेतुर्ह्यतोऽत्यन्तं विवर्जयेत्। 

अर्थात्, 

 अति सर्वनाश का कारण है। इसलिए अत्यधिक का परित्याग करना चाहिए। 

Meaning --

 Excess is the cause of destruction. Hence one should forbid it in every respect.

Monday, May 4, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 उच्चासनगतो नीचो नीचः एव न चोत्तमः।

प्रासादशिखरस्थोपि काकः न गरुडायते।।

अर्थात्,

   ऊँचे पद पर आसीन होने पर भी नीच नीच ही रहता है,उत्तम नहीं बन पाता। जैसे महल के शिखर पर बैठा हुआ कौवा कभी गरूड नहीं बनता है। 

Meaning --

  A despicable /mean person remains mean even though he holds a high position ; but can't be perfect. Just like the crow sitting on the top of the  palace cannot be a vulture .


Sunday, May 3, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अक्रमेणानुपायेन कर्मारम्भो न सिध्यति।

अर्थात्,

विना क्रम के और विना युक्ति के शुरु किया गया काम सफल नहीं होता है।

Meaning --

  The work started without any arrangement and planning doesn't succeed. 

Friday, May 1, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 सुजनो न कुप्यत्येव अथ कुप्यति विप्रियं न चिन्तयति।

अथ चिन्तयति न जल्पति अथ जल्पति लज्जितो भवति।।

अर्थात्,

   सज्जन क्रोध नहीं करता है यदि कभी क्रोध करता है तब अनिष्ट नहीं सोचता है और यदि सोचता है तब अप्रिय नहीं बोलता है और यदि बोलता है तब लज्जित होता है।

Meaning --

A wise man doesn't get angry and if ever he would do so then he won't think about to blame. If he thinks to do so then he would not talk unpleasant. And if he tells so then he would be  ashamed. 

  

Thursday, April 30, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 उक्त्वानृतं भवेद्यत्र प्राणीनां प्राणरक्षणम्।

अनृतं तत्र सत्यं स्यात्सत्यमप्यनृतं भवेत्।।

अर्थात्, 

  झूठ बोलने से जहाँ प्राणियों की प्राणरक्षा हो सकती हो वहाँ झूठ भी सच है और सच भी झूठ होता है। 

Meaning --

Where telling a lie can save the life of people, there the lie would be true and true becomes lie. 

Wednesday, April 29, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 अपि शाकं पचानस्य सुखं वै मघवन् गृहे।

अर्जितं स्वेन वीर्येण न व्यपाश्रित्य कश्चन।।

अर्थात्,

  हे इन्द्र! किसी दूसरे का सहारा न लेकर वरं अपने पराक्रम से ही अर्जित शाक को पकाने वाले के घर में सुख होता है।

O lndra! Happiness remains there in the house of one who consumes food earned through his own valour without taking any other's help.


Tuesday, April 28, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 आनन्दवाष्परोमाञ्चौ यस्य स्वेच्छावशंबदौ।

किं तस्य साधनैरनैः किङ्कराः सर्वपार्थिवाः।।

अर्थात्,

आनन्द के अश्रु तथा रोमाञ्च जिसके इच्छा के अधीन है ,उसे अन्य साधनों की क्या प्रयोजन? सभी राजा उसके नौकर हैं।

   Meaning -

  When the tears of joy and horripilation/goosebumps are subject to/obedient to one's own  wish/desire, then what other means/instruments does he require? Thus all kings are his slaves/servants.

Monday, April 27, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 न गणस्याग्रतो गच्छेत्सिद्धे कार्ये समम्फलम्।

यदि कार्य विपत्तिः स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते।। 

अर्थात्, 

जनसमूह का मुखिया वनकर न जाएं , क्योंकी कार्य सिद्ध होने पर सव बराबर के फल के हिस्सेदार होंगे। यदि काम विगड़ गया तब मुखिया ही मार खाते हैं।

Meaning -

  One should not lead the gathering.as a chief Because the fruit of the action will be shared equally amongst all if the succeeds. But the leader is beaten up if it fails.

   

Sunday, April 26, 2026

सुभाषितम्(THOUGHT OF THE DAY)

 पित्रा पुत्रो वयःस्थोपि सततं वाच्य एव तु।

यथा स्याद् गुणसंयुक्तः प्राप्नुयात् च महद् यशः।।

अर्थात्,

    पुत्र वयस्क होने पर भी पिता सर्वदा कहता/समझाता रहना चाहिए जिससे वह गुणी बने और अधिक यश प्राप्त  कर सकें।

Meaning -

   The father should keep advising the son even after growing up so that the latter can become moral and more famous.


Saturday, April 25, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 असत्यवचनं प्राज्ञः प्रमादेनापि न वदेत्।

श्रेयांसि येन भज्यन्ते वात्ययेव महाद्रुमाः।।

अर्थात्,

 बुद्धिमान् व्यक्ति कभी गलती से भी असत्य भाषण नहीं वोलना चाहिये क्योंकि उससे कल्याण वैसे टूट जाते हैं (/नष्ट हो जाते हैं) जैसे आंधी से महावृक्ष।

Meaning -

      A wise man should never tell a lie even by mistake. Because this breaks the good fortune just like the storm uproots the big trees.

Thursday, April 23, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 पीत्वा रसं तु कटुकं मधुरं समानं 

माधुर्यमेव जनयेन्मधुमक्षिकासौ।

सन्तस्तथैव समसज्जनदुर्जनानां

श्रुत्वा वचः मधुरसूक्तरसं सृजन्ति।।

अर्थात्,

  मधुर रस के साथ कड़ुवे रस को भी पान कर यह मधुमक्खी मधुर रस को ही निष्पन्न करती है; वेसे ही विद्वान व्यक्ति सज्जनों के साथ दुर्जनों का भी वचन सुनकर मधुर तथा उत्तम वचन रूपी रस का निर्माण करते हैं।

Meaning -

    The honey bee consumes sweet juices as well as bitter one but produce only honey which is sweet in nature . Like that, wise people create only sweet and noble talks, what type of talks they listen from good and bad persons .

Wednesday, April 22, 2026

सुभाषितम्(NOBLE THOUGHTS)

 संपदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च भीरूत्वम्।

तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम्।।

अर्थात्,

    जिसे संपत्ति आने पर अधिक प्रसन्नता और संकट आने पर दुःख न हो तथा युद्ध में जिसे भय न हो, त्रिभुवन में श्रेष्ठ ऐसे पुत्र को विरल ही कोई माता जन्म देती है।

Meaning -

It's rare for any mother to  give birth to a child who is best amongst the three worlds  who neither becomes happy when  wealth arrives nor is frustrated in difficult times and is not afraid of war .


     

सुभाषितम्( THOUGHT OF THE DAY)

दुर्लभान्यपि कार्याणि सिध्यन्ति प्रोद्यमेन ही।  शिलापि तनुतां याति प्रपातेनार्णसो मुहुः।।  अर्थात्,    कठिन से कठिनतर कार्य भी उद्यम/प्रयास ...