प्रत्यूषः - Dawn;
प्रभातः - Morning;
प्राह्नः - Before Noon;
मध्याह्नः - Noon;
अपराह्नः - After Noon;
उत्सूरः - Evening, Twilight;
निशा - Night;मध्यरात्रिः - Midnight.
Hindi translation of Sanskrit textbooks available for Grades 9, 10, 11, and 12. Hub for jokes, essays, and miscellaneous articles written in Sanskrit.
प्रत्यूषः - Dawn;
प्रभातः - Morning;
प्राह्नः - Before Noon;
मध्याह्नः - Noon;
अपराह्नः - After Noon;
उत्सूरः - Evening, Twilight;
निशा - Night;मध्यरात्रिः - Midnight.
परन्तु उनमें से एक बृद्धशबर उसी पेड़ के नीचे ही एक पल के लिए रुक गया । सेनापति के चले जाने पर जल्द ही चढ़ने की इच्छा से उस वृक्ष को जड से देखा। उस समय उसका उपस्थिति भयभीत शुकदम्पतियों का प्राण से उडने जैसा ही था। निर्दयीजनों के लिए क्या ही दुष्कर है। क्योंकि वह उस वृक्ष को असावधानी से चढ़कर फल सदृश शुकशावकों को कोटरों से निकाल लिया। और प्राणहीन कर भूमि पर फेंक दिया।
पिता भी विषादशून्य तथा आँसू के जल से भीगी हुई उस दृश्य को देखकर इधर उधर विखरे हुए पंखों को इकट्ठे कर मुझे ढक कर स्नेह परवश होते हुए मेरे रक्षा के लिए आकुल हो उठे। यह पाप भी क्रमशः अन्य शाखाओं से चलता हुआ मेरे कोटर द्वार में प्राप्त(पहुंचा) हुआ सर्प जैसे भयानक प्रसारित बाहु को वारवार चोंच से प्रहार करने से तथा कूजन करने से क्रुद्ध होकर पिता को प्राणहीन करदिया परन्तु मुझे छोटे होने पर किसी प्रकार से देख नहीं पाया। और मृत उनको धरती पर छोड़ दिया। मैं भी उनके पाँवों के मध्य गर्दन रखकर गोद के नीचेे निश्चल रहकर हवा से एकत्रित सुखे पत्तों के ऊपर गिरा हुआ स्वयं को देखा। जब तक यह वृक्ष के अग्र भाग से अवतरण करता है, तब तक मैं मृत पिता के ऊपर से उठकर क्रूर जैसा स्नेहरस से अंजान भय से ही केवल आक्रान्त होता हुआ इधर उधर गिरता पडता निकटवर्ती तमालवृक्ष के मूलदेश में प्रवेश किया।
पक्ष उत्पन्न न होने से वारवार मुख से गिरता हुआ मुस्किल से साँस लेता हुआ धूलिधूसरित होनेवाला घिसटता हुआ मेरे मन में उत्पन्न हुआ - इस जगत में सभी प्राणियों का जीवन से प्रियतर और कुछ नहीं है । पिता के इस प्रकार मृत्यु होने पर भी मैं जीना चाहता हूँ। मुझ जैसा अकरुण , अतिनिष्ठुर तथा अकृतज्ञ को धिक्। मेरा अन्तर(हृदय) निश्चत रूप से खराव है। पिता के द्वारा मेरे लिए जो किया गया वह मैं एकपद में भूल गया। (सभी प्रकार से/ )निस्सन्देह जीवन का आशा दुःखदायी हैैै। क्योंकि इस अवस्था में भी मुझे जल की अभिलाष(/ईच्छा) कष्ट देता है। दिवस का यह अवस्था अतिकष्ट दिखाई पडता है। धूप से तपी भूमि धूलवाली हो गई है।
प्यास से शुखे हुए/ मुरझे हुए मेरे सभी अङ्ग थोडा चलने में भी समर्थ नहीं हैं।( मैं) स्वयं शक्तिशाली नहीं हूँ। मेरे हृदय को कष्ट हो रहा हे। मेरे नेत्र अन्धकारता को प्राप्त हो रहे हैं॥ भाग्य निश्चय ही दुष्ट है, मेरे न चाहते हुए भी मृत्यु आज हि संपन्न हो जाएगा।
मेरा ऐसे चिन्ता करते समय नहाने की इच्छा रखनेवाला हारित नामक जाबालि मुनि के पुत्र, मित्र और अन्य मुनिकुमारों के साथ उस रस्ते से उस पद्मसरोवर में पहुँचा। सज्जनों के मन(/ चित्त) प्रायशः स्वतःस्फूर्त मित्रतायुक्त तथा अतिदयालु(/ संवेदनशील) होते हैं। क्योंकि मेरे उस अवस्था/ दशा को देखकर वह मुझे सरोवर के किनारे ले गया। और स्वयं जलबिन्दु लाकर पिलाया। प्राणोदय होनेपर मुझे छाया में रखकर स्नानविधि किया। स्नानाभिषेक समाप्त होनेपर सभी मुनिकुमारों के समूह से पीछा किया जाता हुआ मुझे लेकर (हारित ने) तपोवन चलागया।
६. गृहीत्वा - ग्रह्+ क्त्वाच्
७. अभिलाषः - अभि + लष् + स्यञ्
८. संचरमाणः - सम् + चर् + शानच्
७.
क) अस्ति भुवो मेखलेव विन्ध्याटवी नाम।
ख) ममैव जायमानस्य प्रसववेदनया मे जननी मृता।
ग) अहो मोहप्रायम एतेषां जीवितम्।
घ) तातः तद विषादशून्यां अश्रुजलप्लुतां दृशमवलोक्य इतस्ततो विक्षिपन पक्षसंपुटेन मां आच्छाद्य स्नेहपरवशो मद्रक्षणे आकुलः अभवत्।
समाप्तम्
नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।
आमृत्योः श्रियमन्विच्छेत् नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥
अर्थात् -
पितृपुरुषों के उपार्जित धन न होने के कारण स्वयं को अनादर नहीं करना चाहीए। और भी मृत्यु तक अपनी समृद्धि के लिए प्रयास करना चाहीए; क्योंकि धनसंपदा दुर्लभ नहीं है(अर्थात् सुलभ है) ऐसा मानना उचित है।
Meaning - One should not disrespect himself/herself, not because of having ancestors' property. And one should try for ones own prosperity till death. As wealth is not inaccessible - should believe/accept this.
अत्यम्वुपानान्न विपच्यतेऽन्न
मनम्वुपानाच्च स एव दोषः।
तस्मान्नरो वन्हिविवर्धनार्थं
मुहुर्मुहुुर्वारि पिवेदभूरि॥
अर्थात् -
अधिक जल पिने से भोजन नहीं पचता है। पानी बिलकुल न पीने पर भी वही दोष होता है। इसलिए व्यक्ति भोजन पचाने के क्षमता की(/उदराग्नि के) वृद्धि के लिए बार बार थोडा थोडा पानी पीना चाहीये।
Meaning -
By drinking more water food does not get digested. Similar situation arises when you don't drink water . So one should drink water little by little every now and then to improve the digestive capacity.
पातितोऽपि कराघातैरुत्पतत्येव कन्दुकः।
प्रायेण हि सुवृतानामस्थायिन्यो विपत्तयः॥
अर्थात् -
भूमिस्थ होने पर भी हाथ के आघात से गेन्द पुनः उपर उठ जाता है। उसी प्रकार उत्तम चरित्रवान् व्यक्तियों के विपत्तियां प्रायशः अस्थायी होते हैं॥
Meaning -
As being on the ground, the ball goes up again by the striking of hands. Similarly adversities/misfortunes of the well-behaved/virtuous persons are mostly not long lasting.
* किमत्र चित्रं यत् सन्तः परानुग्रह तत्पराः। न ही स्वदेहशैत्याय जायन्ते चन्दनद्रुमाः॥
अर्थात् -
सज्जन व्यक्ति दुसरों को दया दिखाने ने के लिए(अथवा अनुग्रह करने के लिए) सर्वदा तत्पर(प्रस्तुत) रहते हैं, इसमें आश्चर्य क्या है! चन्दन वृक्ष अपने शरीर(स्वयं)को ही शीतल(ठंडा)करने के लिए उत्पन्न नहीं होते हैं॥
Meaning -
Learned persons always eager/ready to be kind to others, what is surprising in this! All the sandalwood trees are not produced / generated to cold themselves.
* दिनान्ते च पिवेत् दुग्धं निशान्ते च पिवेत् पयः।
भोजनान्ते पिवेत्तक्रं किं वैद्येन प्रयोजनम्॥
अर्थात् -
दिन के अन्त(रात) में दुध पीना चाहीए, रात्रि के अवसान(सुबह) में पानी पीना चाहीए और भोजन के बाद छाछ पीना चाहीए। एसे करने से व्यक्ति का वैद्य का आवश्यक नहीं होता है।
वस्त्र विक्रयः अष्टम पाठः (तब अनुचर के साथ विदेशी गौरांग का प्रवेश होता है। वह राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र दिखाकर सेठ और जुलाहको डांटता है ।) ...