सूक्तिसुधा
१. जिस देश में आदर सम्मान नहीं और न ही आजीविका का कोई साधन है, जहाँ कोई बन्धु-बान्धव,रिश्तेदार भी नहीं तथा किसी प्रकार की विद्या और गुणों की प्राप्ति की संभावना नहीं, ऐसे देश को छोड़ देना चाहिए।
२. किसी रोग से पीड़ित होने पर, दुख आने पर, अकाल पड़ने पर , शत्रृ की ओर से संकट आने पर, राजसभा में, श्मशान अथवा किसी की मृत्यु के समय जो व्यक्ति साथ नहीं छोड़ता, वास्तव में वही प्रकृत बन्धु है।
३. बलवानोंको अधिक बोझ क्या है? और उद्योग करने वालों को क्या दूर है? विद्यावानोंको विदेश क्या है? और मीठे बोलने वालों का शत्रु कौन है?
४. सुवर्ण के साथ होने से जैसे कांच की मरकत मणि सदृश शोभा हो जाती है वैसे ही सज्जनों के संगति से मूर्ख भी चतुर वन जाता है।
५. पुष्प के गुच्छे के समान उदार मनुष्य की दो तरह की प्रकृति होती है कि या तो सबके शिर पर रहे अथवा वन में नष्ट हो जाए।
६. पण्डित को परोपकार के लिए धन और प्राण छोड़ देने चाहिये। विनाश निश्चय है अतः उत्तम कार्य के लिए प्राणों का त्याग श्रेष्ठ है।
७. इस संसार में अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष को नींद, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता ये छः अवगुण छोड़ देनी चाहिए।
८. हे राजा! नित्य धन की प्राप्ति, आरोग्यता, प्रियतमा और मधुरभाषिणी स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र और धन उत्पन्न करने वाली विद्या - संसार का ये छः सुख हैं।
अभ्यासः
१.
क) अयं पाठः चाणक्यनीति-हितोपदेशाभ्यां ग्रन्थाभ्याम् संकलितः ।
ख) यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न बान्धवाः न च विद्यागमः तत्र वासः न कर्तव्यः।
ग) आतुरे व्यसने दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे राजद्वारे श्मशाने च बान्धवः तिष्ठति।
घ) काचः काञ्चनस्य संसर्गात् मारकतीं द्युतिं धत्ते।
ङ) प्राज्ञः परार्थे धनानि जीवितं च उत्सृजेत्।
च) मूर्खः सत्सन्निधानेन प्रवीणतां याति।
छ) पुरुषेण निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रताञ्च एते षड् दोषाः हातव्या।
ज) नित्यं अर्थागमः अरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च वश्यश्च पुत्रः अर्थकरी च विद्या - जीवलोकस्य एतानि षट् सुखानि सन्ति।
२.
क) यः आतुरे व्यसने दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे राजद्वारे श्मशाने च तिष्ठति सः बान्धवः।
ख) जीवलोकस्य नित्यं अर्थागमः अरोगिता च प्रिया भार्या च प्रियवादिनी च वश्यश्च पुत्रः अर्थकरी च विद्या षट् सुखानि भवन्ति।
ग) मनस्विनः कुसुमस्तवकस्य इव द्वयी वृत्तिः भवति।
घ) षड्दोषाः भूतिमिच्छता पुरुषेण इह हातव्याः।
ङ) सन्निमितं वरं त्यागो विनाशे नियते सति।
४.
क ख
विद्यागमः विद्याप्राप्तिः
व्यसने विपत्तौ
सविद्यानाम् विदुषां
द्युतिम् शोभाम्
कुसुमस्तवकस्य पुष्पगुच्छस्य
मूर्ध्नि. शिरसि
भूतिम् कल्याणम्
५.
विग्रहपदानि समस्तपदानि
1. विद्यायाः आगमः विद्यागमः
2. राज्ञः द्वारे राज द्वारे
3. सतां सन्निधानेन सत्सन्निधानेन
4. काञ्चनस्य संसर्गात् काञ्चनसंसर्गात्
5. अर्थस्य आगमः अर्थागमः
6. जीविताय इदम् जीवितार्थम्
7. न रोगिता अरोगिता
8. अर्थं करोति या सा अर्थकरी
६.
1. प्राप्ते - प्र + आप् + क्त, सप्तमी एकवचन
2. प्रवीणताम् - प्रवीण + तल्, द्वितीया एकवचन
3. वृत्तिः - वृत् + क्तिन्
4. नियते - नी + यत् , विशेषण, सप्तमी एकवचने
5. हातव्या - हा + तव्य, वहुवचने