माता -
तत् रूप्यकं किमर्थं त्वं ग्रसितवान् यत् मया दत्ता?
सुतः -
अस्तु। भवती अवदत्, एतत् मम भोजनार्थम्!
Meaning -
Mother:
Why did you just swallow the money I gave you?
Son:
Well you did say it was for my launch!
Source: 101 Nutty Jokes
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माता -
तत् रूप्यकं किमर्थं त्वं ग्रसितवान् यत् मया दत्ता?
सुतः -
अस्तु। भवती अवदत्, एतत् मम भोजनार्थम्!
Meaning -
Mother:
Why did you just swallow the money I gave you?
Son:
Well you did say it was for my launch!
Source: 101 Nutty Jokes
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मैश्रीगुरवे नमः॥
अर्थात्, -
उन् गुरु को प्रणाम, जो अज्ञानरूपी अन्धकार से अंध जनों के आँखों को ज्ञानरूपी अंजन लगाने की सलाई द्वारा खोल देते हैं।
Meaning -
Salute to those preceptors who awaken/reveal the eyes of blind people from darkness of ignorance through knowledge alike the stick used for the application of collyrium.
१. साबरमती नदी के तटपर सत्याग्रह आश्रम है। अपने अनुयायियों के साथ(मिलकर) महात्मा ने वहाँ सदन का स्थापना किया।
२. यह सत्य प्रमाण है कि मन, वाक्य, काय तथा कर्म से(द्वारा) उस पवित्र निवासस्थान में वो आश्रम है, वह यथार्थ है।
३. अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचारी, धन संचय न करने का स्वभाव, स्वदेशी वस्तुओं के प्रति निष्ठा भाव, भय रहित, रुचि-स्वाद पर नियन्त्रण रखना
४. और हरिजनों का उद्धार - यह नौ व्रत भारतवर्ष के विकाश के लिए आश्रम के महात्मा के हैं।
५. निर्मम, सर्वदा सत्त्वगुण से युक्त, कम् भोजन करने वाला, स्मितमुख, उत्तम स्त्री युक्त, शिशुप्रेमी, आश्रमवासिओं के पिता स्वरूप हैं।
६. अपने बन्धुओं के कष्ट को ध्यान कर उनके हित के लिए (उनके सम्मुख) उपस्थित होते हैं। जैसे बोधि वृक्ष के नीचे मुनिश्रेष्ठ बुद्ध विराजमान होते हैं।
७. साक्षातरूप से ये सत्य का प्रदीप हैं। स्वबन्धुओं के हृदय से मोहजनित अन्धकार दूरकर शोभायमान होते हैं।
८. सभी बलों से भी बलवान् सत्य है। क्योंकि सत्यरहित बलवान् व्यक्ति से बलहीन सत्यवान् जन अधिक कल्याणकारी होता है।
९. उस(सत्य)को जो प्रजा अथवा राज्यशासक धर्म के साथ आचरण करते हैं उनका विकाश होता है; किन्तु दूसरों का विनाश निश्चय है।
१०. यह 'गान्धीआख्याति' वहाँ स्थित अन्य अनुयायीजनों को सहवासिओं ने कहते थे।
महात्मा कहते हैं -
११. अधर्म को देखकर भी जो समावस्था (/प्रतिबन्धु) नहीं चाहता है और जो सत्य में होते हुए भी भय के कारण (वह) प्रतिपादन योग्य नहीं है।
१२. और स्वार्थ नष्ट होने के भय से जिस मिथ्या जीवनको वो रक्षा करते हैं, शक्तिहीन उन दोनों का जीवन निष्फल है।
१४. वो निश्चित रूप से भीरू है जो मन से पलायन किया गया हिंसा को करता है और स्वयं के मृत्यु के डर से आत्महिंसा करता है।
अभ्यासः
१.प्रश्नानामुत्तराणि संस्कृतभाषया देयानि -
क) अयं पाठः 'सत्याग्रहगीता' इति ग्रन्थात् सङ्कलितः।
ख) महात्मा ( गाँधी ) सत्याग्रहाश्रमं सबरमत्याः ( नद्याः ) तीरे स्थापयामास। ग) निर्ममः नित्यसत्वस्थः मिताशी सुस्मिताननः सुकलत्रः शिशुप्रेमी तथा पिता इव आश्रमवासिनाम् कृते महात्मा आसीत्।
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येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ 33 ॥
yēṣāmarthē kāṅkṣitaṃ nō rājyaṃ bhōgāḥ sukhāni cha ।
ta imē'vasthitā yuddhē prāṇāṃstyaktvā dhanāni cha ॥ 33 ॥
Meaning - For those who we desire kingdom, enjoyment and happiness, they are present in this battle field by giving up lives and wealth.
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥ 34 ॥
āchāryāḥ pitaraḥ putrāstathaiva cha pitāmahāḥ ।
mātulāḥ śvaśurāḥ pautrāḥ śyālāḥ sambandhinastathā ॥ 34 ॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ 35 ॥
ētānna hantumichChāmi ghnatō'pi madhusūdana ।
api trailōkyarājyasya hētōḥ kiṃ nu mahīkṛtē ॥ 35 ॥
Meaning -
Teachers, fathers,sons,grand-fathers, maternal uncles, father-in-laws, grand sons, brother-in-laws and relatives - O Madhusudana! Even if I get killed, (I) don't want to kill them in exchange of the countries of the three worlds, leave (to talk) about this earth.(34 & 35)
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥ 36 ॥
nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana ।
pāpamēvāśrayēdasmānhatvaitānātatāyinaḥ ॥ 36 ॥
Meaning - O Janardana! By killing the sons of Dhritarastra what happiness would we get. Killing these desperados (criminals) surely we'll commit sin.
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ 37 ॥
tasmānnārhā vayaṃ hantuṃ dhārtarāṣṭrānsvabāndhavān ।
svajanaṃ hi kathaṃ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava ॥ 37 ॥
Meaning - So we aren't fit/right to kill the sons and relatives of Dhritarashtra. O Madhava! Killing the family members how would we be happy?
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ 38 ॥
yadyapyētē na paśyanti lōbhōpahatachētasaḥ ।
kulakṣayakṛtaṃ dōṣaṃ mitradrōhē cha pātakam ॥ 38 ॥
Meaning - But still they don't see the fault which led to ruin/extinction of families and sins committed against their friends because of the greed that overpowered their mind.
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ 39 ॥
kathaṃ na jñēyamasmābhiḥ pāpādasmānnivartitum ।
kulakṣayakṛtaṃ dōṣaṃ prapaśyadbhirjanārdana ॥ 39 ॥
Meaning - O Janardana! How would be not known by us who see the fault which led to extinction of families to relief from this sin.
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ 40 ॥
kulakṣayē praṇaśyanti kuladharmāḥ sanātanāḥ ।
dharmē naṣṭē kulaṃ kṛtsnamadharmō'bhibhavatyuta ॥ 40 ॥
Meaning - The eternal customs of family is being destroyed by the extinction of family. And the entire family is being involved in the unrighteousness by the destruction of customs.
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥ 41 ॥
adharmābhibhavātkṛṣṇa praduṣyanti kulastriyaḥ ।
strīṣu duṣṭāsu vārṣṇēya jāyatē varṇasaṅkaraḥ ॥ 41 ॥
Meaning - O Krishna! The women of families become impure when unrighteousness becomes important in families. O Varsneya! Unwanted children being produced due to the downfall of womanhood.
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ 42 ॥
saṅkarō narakāyaiva kulaghnānāṃ kulasya cha ।
patanti pitarō hyēṣāṃ luptapiṇḍōdakakriyāḥ ॥ 42 ॥
Meaning - Because of the growth of unwanted children, there starts the hellish life surely for the family and also for those who destroy the familial customs. The forefathers/ancestors of these families fall as there is an end in the oblation of rice-balls and water offered to the deceased ancestors.
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ 43 ॥
dōṣairētaiḥ kulaghnānāṃ varṇasaṅkarakārakaiḥ ।
utsādyantē jātidharmāḥ kuladharmāścha śāśvatāḥ ॥ 43 ॥
Meaning - People who destroy/demolish the family customs and produce unwanted children, because of their bad act the eternal activities of caste and family customs get destroyed.
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ 44 ॥
utsannakuladharmāṇāṃ manuṣyāṇāṃ janārdana ।
narakē'niyataṃ vāsō bhavatītyanuśuśruma ॥ 44 ॥
Meaning - O Janardana! I have heard from preceptors' tradition that people who destroy the customary observances of family(kula-dharma) always live in hell.
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ 45 ॥
ahō bata mahatpāpaṃ kartuṃ vyavasitā vayam ।
yadrājyasukhalōbhēna hantuṃ svajanamudyatāḥ ॥ 45 ॥
Meaning - Oh! How it is a surprise that we are all going to do a sinful act by killing our relatives because of greed of enjoyment of kingdom.
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ 46 ॥
yadi māmapratīkāramaśastraṃ śastrapāṇayaḥ ।
dhārtarāṣṭrā raṇē hanyustanmē kṣēmataraṃ bhavēt ॥ 46 ॥
Meaning - If the armed warriors the sons of Dhritarastra killed me in the battle-field who is unarmed/weaponless and not doing any counter-action /retaliation that will be beneficial/good for me.
सञ्जय उवाच ।
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ 47 ॥
sañjaya uvācha ।
ēvamuktvārjunaḥ saṅkhyē rathōpastha upāviśat ।
visṛjya saśaraṃ chāpaṃ śōkasaṃvignamānasaḥ ॥ 47 ॥
Meaning - Sanjay said:
In the battle field saying this Arjun put his bow and arrow aside and sat on the seat of the chariot with mentally disturbed/distracted because of sorrow.
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
ōṃ tatsaditi śrīmadbhagavadgītāsūpaniṣatsu brahmavidyāyāṃ yōgaśāstrē śrīkṛṣṇārjunasaṃvādē
विद्यैव मानवसुखस्य नितान्तबीजं;
विद्यैव साधयति नष्टगतार्थभावम्।
विद्योन्नतिं नयति दुर्गतमर्त्त्यवर्गं;
विद्या ददाति विनयं धनमात्मतोषम्॥
अर्थात्,
विद्या मनुष्यों के सुख का प्रमुख कारण है। विद्या ही नष्टधन की रक्षा करता है। विपन्नजनों की उन्नति विद्या से ही होती है। इसके अतिरिक्त विद्या विनय (भाव) प्रदान करती है और सन्तोषजनक धन देती है।
Meaning -
Knowledge is the main reason of human beings' happiness. Knowledge saves the lost property. Distressed peoples' development happens only through knowledge. Knowledge teaches us humbleness and provides self satisfied wealth.
प्रत्यूषः - Dawn;
प्रभातः - Morning;
प्राह्नः - Before Noon;
मध्याह्नः - Noon;
अपराह्नः - After Noon;
उत्सूरः - Evening, Twilight;
निशा - Night;मध्यरात्रिः - Midnight.
परन्तु उनमें से एक बृद्धशबर उसी पेड़ के नीचे ही एक पल के लिए रुक गया । सेनापति के चले जाने पर जल्द ही चढ़ने की इच्छा से उस वृक्ष को जड से देखा। उस समय उसका उपस्थिति भयभीत शुकदम्पतियों का प्राण से उडने जैसा ही था। निर्दयीजनों के लिए क्या ही दुष्कर है। क्योंकि वह उस वृक्ष को असावधानी से चढ़कर फल सदृश शुकशावकों को कोटरों से निकाल लिया। और प्राणहीन कर भूमि पर फेंक दिया।
पिता भी विषादशून्य तथा आँसू के जल से भीगी हुई उस दृश्य को देखकर इधर उधर विखरे हुए पंखों को इकट्ठे कर मुझे ढक कर स्नेह परवश होते हुए मेरे रक्षा के लिए आकुल हो उठे। यह पाप भी क्रमशः अन्य शाखाओं से चलता हुआ मेरे कोटर द्वार में प्राप्त(पहुंचा) हुआ सर्प जैसे भयानक प्रसारित बाहु को वारवार चोंच से प्रहार करने से तथा कूजन करने से क्रुद्ध होकर पिता को प्राणहीन करदिया परन्तु मुझे छोटे होने पर किसी प्रकार से देख नहीं पाया। और मृत उनको धरती पर छोड़ दिया। मैं भी उनके पाँवों के मध्य गर्दन रखकर गोद के नीचेे निश्चल रहकर हवा से एकत्रित सुखे पत्तों के ऊपर गिरा हुआ स्वयं को देखा। जब तक यह वृक्ष के अग्र भाग से अवतरण करता है, तब तक मैं मृत पिता के ऊपर से उठकर क्रूर जैसा स्नेहरस से अंजान भय से ही केवल आक्रान्त होता हुआ इधर उधर गिरता पडता निकटवर्ती तमालवृक्ष के मूलदेश में प्रवेश किया।
पक्ष उत्पन्न न होने से वारवार मुख से गिरता हुआ मुस्किल से साँस लेता हुआ धूलिधूसरित होनेवाला घिसटता हुआ मेरे मन में उत्पन्न हुआ - इस जगत में सभी प्राणियों का जीवन से प्रियतर और कुछ नहीं है । पिता के इस प्रकार मृत्यु होने पर भी मैं जीना चाहता हूँ। मुझ जैसा अकरुण , अतिनिष्ठुर तथा अकृतज्ञ को धिक्। मेरा अन्तर(हृदय) निश्चत रूप से खराव है। पिता के द्वारा मेरे लिए जो किया गया वह मैं एकपद में भूल गया। (सभी प्रकार से/ )निस्सन्देह जीवन का आशा दुःखदायी हैैै। क्योंकि इस अवस्था में भी मुझे जल की अभिलाष(/ईच्छा) कष्ट देता है। दिवस का यह अवस्था अतिकष्ट दिखाई पडता है। धूप से तपी भूमि धूलवाली हो गई है।
प्यास से शुखे हुए/ मुरझे हुए मेरे सभी अङ्ग थोडा चलने में भी समर्थ नहीं हैं।( मैं) स्वयं शक्तिशाली नहीं हूँ। मेरे हृदय को कष्ट हो रहा हे। मेरे नेत्र अन्धकारता को प्राप्त हो रहे हैं॥ भाग्य निश्चय ही दुष्ट है, मेरे न चाहते हुए भी मृत्यु आज हि संपन्न हो जाएगा।
मेरा ऐसे चिन्ता करते समय नहाने की इच्छा रखनेवाला हारित नामक जाबालि मुनि के पुत्र, मित्र और अन्य मुनिकुमारों के साथ उस रस्ते से उस पद्मसरोवर में पहुँचा। सज्जनों के मन(/ चित्त) प्रायशः स्वतःस्फूर्त मित्रतायुक्त तथा अतिदयालु(/ संवेदनशील) होते हैं। क्योंकि मेरे उस अवस्था/ दशा को देखकर वह मुझे सरोवर के किनारे ले गया। और स्वयं जलबिन्दु लाकर पिलाया। प्राणोदय होनेपर मुझे छाया में रखकर स्नानविधि किया। स्नानाभिषेक समाप्त होनेपर सभी मुनिकुमारों के समूह से पीछा किया जाता हुआ मुझे लेकर (हारित ने) तपोवन चलागया।
६. गृहीत्वा - ग्रह्+ क्त्वाच्
७. अभिलाषः - अभि + लष् + स्यञ्
८. संचरमाणः - सम् + चर् + शानच्
७.
क) अस्ति भुवो मेखलेव विन्ध्याटवी नाम।
ख) ममैव जायमानस्य प्रसववेदनया मे जननी मृता।
ग) अहो मोहप्रायम एतेषां जीवितम्।
घ) तातः तद विषादशून्यां अश्रुजलप्लुतां दृशमवलोक्य इतस्ततो विक्षिपन पक्षसंपुटेन मां आच्छाद्य स्नेहपरवशो मद्रक्षणे आकुलः अभवत्।
समाप्तम्
उद्योगे नास्ति दारिद्रयं जपतो नास्ति पातकम्। मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ।। अर्थात्, उद्योगी /परिश्रमी का दारिद्रय नह...